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राहुल के कदम से पार्टी के कुछ नेता परेशान

Fri, 04 Oct 2013 11:55 AM IST
विनोद अग्निहोत्री
विनोद अग्निहोत्री Updated Fri, 04 Oct 2013 11:55 AM IST
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दागी सांसदों की संसद सदस्यता बचाने वाले केंद्र सरकार के अध्यादेश को बकवास और कूड़ेदान में फेंकने लायक बताकर उसे वापस लेने केलिए केंद्र सरकार को विवश करने के बाद कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी ने पार्टी और सरकार दोनों पर अपना नेतृत्व स्थापित कर लिया है।

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राहुल की भाषा और समय को लेकर भले ही किंतु परंतु हों (हालाकि अपनी भाषा के लिए उन्होंने अपनी मां सोनिया गांधी की सलाह के बाद खेद भी जताया है) लेकिन अपने इस कदम से राहुल ने सिर्फ एक विवादित अध्यादेश और विधेयक ही वापस करवाया।
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बल्कि इसके जरिए उन्होंने पार्टी के उन यथास्थितिवादी नेताओं को भी चुनौती दी है, जिनकी वजह से पिछले कुछ सालों से नेतृत्व के स्तर पर कांग्रेस पार्टी और सरकार दोनों जड़ता के शिकार हैं और इसके प्रति अपने लोगों से राहुल कई बार अपनी नाराजगी भी जता चुके हैं।
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राहुल के इस औचक कदम से पार्टी संगठन के शीर्ष पर पिछले कई वर्षों से काबिज कुछ यथास्थितिवादी नेता परेशान हैं। राहुल के बयान से सरकार और पार्टी संगठन के बीच की वह दरार भी खुलकर सामने आ गई।

जो पिछले कई महीनों से सरकार के कामकाज को लेकर दोनों के बीच पैदा हुई है। राहुल दर असल झटके से अपना नेतृत्व स्थापित करने की उसी शैली का अनुसरण कर रहे हैं जिस तरह कभी उनकी दादी इंदिरा गांधी ने कांग्रेस में सिंडीकेट के खिलाफ बगावत की थी और उनकी मां सोनिया गांधी ने सीताराम केसरी को पार्टी अध्यक्ष पद से हटाया था।

इंदिरा गांधी को पार्टी के भीतर तमाम दिग्गजों से लडऩा पड़ा था और सोनिया को भी कालांतर में शरद पवार, पी.ए.संगमा के विद्रोह का सामना करना पड़ा था।

राजीव गांधी आकस्मिक परिस्थिति में प्रधानमंत्री तो बने थे, लेकिन तब भी प्रणव मुखर्जी ने वरिष्ठता का सवाल उठाया और बाद में उसकी कीमत चुकाई। बाद में राजीव को भी पार्टी के भीतर ही विश्वनाथ प्रताप सिंह और अपने ही भाई अरुण नेहरू की बगावत का सामना करना पड़ा।

राहुल गांधी पिछले आठ सालों से पार्टी के यथास्थितवादी नेताओं और सरकार की जड़ता को लेकर कार्यकर्ताओं की बढ़ती नाराजगी को महसूस कर रहे थे। इसे उन्होंने कई बार अपने करीबियों से साझा भी किया।

लेकिन यूपीए सरकार चलाए रखने की मजबूरी और जरूरत से ज्यादा हस्तक्षेप न करने व अपने दायरे में रहने की उनकी अपनी कार्यशैली ने कई मौकों पर उन लोगों को निराश किया जो राहुल से नाजुक मौकों पर कठोर रुख अपनाने की अपेक्षा रखते रहे हैं।

लेकिन चुनाव वर्ष में राहुल को किसी न किसी मौकेपर ऐसा कोई धमाका करना ही था, जिससे वह एकाएक खुद को पार्टी और सरकार से ऊपर स्थापित कर सकें। यह मौका दिया उन्हें दागी सांसदों और विधायकों को बचाने वाले विवादित अध्यादेश ने।

केंद्र सरकार के लगातार गिरते ग्राफ को लेकर कांग्रेस नेतृत्व और कार्यकर्ताओं में बेहद बेचैनी है। खाद्य सुरक्षा कानून, भूमि अधिग्रहण कानून और नकद सब्सिडी जैसे कदमों, आर्थिक सुधारों को तेज करने केलिए किए गए सरकार के फैसलों के बावजूद जमीन पर कांग्रेस का ग्राफ फिलहाल सुधरता नहीं दिखाई दे रहा है।

सरकार की अकर्मण्यता, दिशाहीनता, भ्रष्टाचार की कालिख और बेलगाम महंगाई की वजह से पार्टी कार्यकर्ताओं की एक बड़ी जमात प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनकी नौकरशाह टीम से बेहद खफा है। नरेंद्र मोदी की अगुआई में भाजपा की तेजी से उन्हें पार्टी का राजनीतिक भविष्य डगमगाता दिखाई दे रहा है।

इसलिए पार्टी में एक राय यह बन रही है कि संगठन को अब सरकार से दूरी बनानी चाहिए और किसी मजबूत मुद्दे पर पार्टी को सरकार से अलग खड़े हुए दिखना चाहिए।

कांग्रेस नेताओं खासकर इंदिरा राजीव युग में पले बढ़े नेताओं को लगता है कि जब तक राहुल गांधी अपनी दादी की तरह यथास्थिति को चुनौती नहीं देंगे, उनका नेतृत्व लोगों के बीच स्थापित नहीं होगा।

क्योंकि जब इंदिरा गांधी ने राष्ट्रपति चुनाव जैसे अहम मौके पर पूरी कांग्रेस पार्टी के फैसले को धता बताकर नीलम संजीव रेड्डी की जगह वीवी गिरि को समर्थन देकर जितवा दिया तब वह कांग्रेस संगठन से बड़े कद की नेता बनकर जनता के बीच गई और 1971 के चुनाव में गरीबी हटाओ, बैंक राष्ट्रीयकरण और प्रिवी पर्स के खात्मे जैसे मुद्दों को लेकर उन्होंने विरोधियों को चुनौती दी।

राहुल को भी अब उसी तरह सबसे पहले पार्टी और सरकार के यथास्थितिवाद के खिलाफ खड़ा होना पड़ेगा। रही सही कसर दागी सांसदों को लेकर सुप्रीम कोर्ट के ताजा फैसले को उलटने वाले विधेयक और अध्यादेश ने पूरी कर दी, जिसे लेकर जनता की बेहद नाराजगी का अहसास कांग्रेस नेतृत्व को हो गया।

ऐसा नहीं हैं कि जब सुप्रीम कोर्ट केफैसले को बेअसर करने वाला विधेयक सरकार ने मंजूर करके संसद में पेश किया और बाद में अध्यादेश लाया गया तो राहुल इसके प्रावधानों से अनजान थे। लेकिन तब उन्हें भी इसके दुष्प्रभाव का अंदाज नहीं था।

इसलिए जैसे ही राहुल तक जनता की नाराजगी की आंच पहुंची, तत्काल उनके रणनीतिकारों ने सबसे पहले पार्टी के भीतर ही विरोधी स्वरों को पैदा होने दिया। राहुल की कोर टीम के सदस्य मिलिंद देवड़ा का अध्यादेश के विरोध में पत्र और फिर दिग्विजय सिंह के बयान ने वह जमीन तैयार की जिस पर खड़े होकर राहुल ने अपनी सरकार के फैसले को बकवास करार दिया।

पार्टी और सरकार के यथास्थितिवादियों के खिलाफ यह राहुल का पहला कदम माना जा सकता है। भविष्य में राहुल ऐसे और भी कदम उठाएं तो आश्चर्य नहीं होना चाहिए।

क्योंकि राजनीति के कुरुक्षेत्र में राहुल अपने पिता राजीव गांधी से ज्यादा अपनी दादी इंदिरा गांधी को सफल मानते हैं।

पार्टी के भीतर यथास्थितवाद के खिलाफ राहुल के खड़े होने के की भूमिका यूपीए दो की शुरुआत से ही बनाई जा रही थी। यूपीए एक से उलट यूपीए दो में प्रधानमंत्री कार्यालय का एक समानांतर शक्ति केंद्र के रूप में उभरना दस जनपथ के वफादारों को नागवार गुजरने लगा था।

फिर यूपीए एक के शासनकाल के दौरान हुए घोटालों में प्रधानमंत्री कार्यालय पर लगातार उठने वाली उंगलियों ने भी संगठन नेतृत्व और सरकार नेतृत्व के बीच दरार बढ़ाई।

मंहगाई और भ्रष्टाचार को लेकर कई बार कांग्रेस कार्यसमिति की बैठकों में प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह और उनके मंत्रियों को पार्टी के वरिष्ठ नेताओं केतमाम असहज सवालों का सामना करना पड़ा।

इसके बावजूद सोनिया गांधी और मनमोहन सिंह ने सार्वजनिक रूप से पार्टी और सरकार की एकजुटता दिखाने की भी हर मुमकिन कोशिश की। लेकिन सरकार के कई फैसलों और कामकाज पर सोनिया और राहुल की असहमति की चर्चाएं भी पार्टी की भीतरी खुसुरपुसुर में सुनाई पड़ती रहीं।

सूत्रों के मुताबिक नेतृत्व के स्तर एकजुटता दिखाने की तमाम कोशिशों के  बावजूद सरकार में शामिल मंत्रियों के बीच भी दस जनपथ और सात रेसकोर्स के प्रति निष्ठा को लेकर खेमेबंदी बढ़ती गई।

सरकार में साफ साफ मंत्रियों के दो खेमे नजर आने लगे। कुछ मंत्री जिनकी पहली निष्ठा कांग्रेस अध्यक्ष के प्रति देखी जाने लगी तो कुछ ऐसे जिनकी पहली निष्ठा प्रधानमंत्री के प्रति दिखाई देने लगी।

अश्वनीकुमार और पवन कुमार बंसल के इस्तीफा प्रकरण के पीछे भी इसी राजनीति को देखा गया।

दागी नेताओं पर सुप्रीम कोर्ट केफैसले को लेकर कांग्रेस के भीतर अलग अलग राय थी। राहुल शुरु से अदालत के फैसले के पक्ष में थे, लेकिन पार्टी के यथास्थितिवादी नेताओं केदबाव में वह खामोश हो गए।

अदालत के फैसले को बेअसर करने वाला कानून बनाने केपक्ष में तर्क दिया गया कि मौजूदी सहयोगी दलों संतुष्ट करने और भविष्य में फिर सहयोगी दलों को जुटाने के लिए ऐसा करना जरूरी है।

क्योंकि इस फैसले का सबसे ज्यादा असर राजद, सपा, बसपा जैसे दलों पर पडऩे वाला है। इस तर्क ने सोनिया और प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह का रुख भी नरम कर दिया। इसका फायदा उठाकर राजद अध्यक्ष लालू प्रसाद यादव को राहत देने केलिए आनन फानन में अध्यादेश लाया गया।   

अध्यादेश लाने तक कांग्रेस संगठन और सरकार में बैठे लोगों को इस मुद्दे पर जनता की नाराजगी का अहसास नहीं था। लेकिन जल्दी ही यह अहसास सोनिया गांधी और राहुल गांधी दोनों को हो गया कि जनभावना इस अध्यादेश के बेहद खिलाफ है और भाजपा इस मामले को भुना सकती है।

इसके बाद राहुल ने यथास्थितिवादियों के खिलाफ खुलकर खड़े होने के लिए इस मौके का इस्तेमाल किया और अपनी ही सरकार के खिलाफ वह सार्वजनिक रूप से हमलावर हो गए।

राहुल के इस एक कदम जिसे कुछ हद तक अतिवादी भी कहा जा सकता है, उनके विरोध के तरीकेऔर भाषा को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं, लेकिन इसकेजरिए राहुल ने खुद को जनभावना का प्रतिनिधि बनाकर न सिर्फ पूरी पार्टी को अपने पीछे खड़ा कर लिया, बल्कि भाजपा को भी बैकफुट पर ला दिया है।

साथ ही अब तक पार्टी और सरकार के कामकाज पर टिप्पणी करने से बचने वाले राहुल गांधी के इस कदम ने एकाएक पूरी पार्टी को उनके पीछे खड़ा कर दिया और यूपीए सरकार पर भी राहुल का दबदबा बन गया ।


इससे दो चीजें तय हो गईं। पहली यह कि अब पार्टी का हर नीतिगत फैसला राहुल के रुख से तय होगा और दूसरी यह कि चुनाव से पहले पहले कांग्रेस यह साफ संदेश दे देगी कि अब मनमोहन सिंह नहीं राहुल गांधी के नाम पर अगला चुनाव लड़ा जाएगा।

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