दावे बड़े-बड़े, लेकिन संसद में राहुल गांधी फेल!
आगामी लोकसभा चुनावों के लिए कांग्रेस ने जब से राहुल गांधी को अनौपचारिक रूप से अपना सेनापति चुना है, तब से उनके अंदाज में अजीब सी आक्रामकता आ गई है। जाहिर है, इससे कांग्रेसी कार्यकर्ताओं का मनोबल बढ़ रहा है और यह उम्मीद जग रही है कि कांग्रेस चुनावों में अपनी कुछ साख बचा सकती है।
राहुल रैलियों में अब भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी और आम आदमी पार्टी के अरविंद केजरीवाल पर सीधे हमले बोलने लगे हैं। वो नाम नहीं लेते, लेकिन उनके सवालों का इशारा अब साफ होने लगा है।
वो संसद में भ्रष्टाचार विरोधी बिल पारित न कराए जाने को लेकर विपक्षी दल से खफा हैं। राहुल का कहना है कि उनकी सरकार ने भ्रष्टाचार पर हमला बोलने की कोशिश की, लेकिन विपक्षी दल ने विश्वासघात किया, जिसके चलते अहम बिल पारित नहीं हो सके। लेकिन संसद पहुंचने के मामले में वो फेल हो गए हैं!
सबसे कम मौजूदगी वाले नेताओं में कांग्रेस उपाध्यक्ष
जब बात 545 सदस्यों वाली लोकसभा में उपस्थिति की आती है, तो कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी का परफॉर्मेंस वैसा नहीं दिखता, जैसा कांग्रेस की रैलियों या समाज के अलग-अलग तबकों से उनकी मुलाकात में नजर आता है।
दरअसल, लोकसभा में मौजूदगी के पैमाने की बात करें, तो राहुल गांधी अपनी पार्टी की तरफ से सबसे खराब उपस्थिति वाले नेता रहे हैं। उनका नाम अलग-अलग राजनीतिक दलों के उन 30 सांसदों की सूची में भी शुमार है, जो उपस्थिति के मामले में सबसे निचले पायदान पर खड़े हैं।
पीआरएस लेजिसलेटिव रिसर्च के 17 फरवरी तक के आंकड़े बताते हैं कि राहुल की मौजूदगी केवल 42 फीसदी रही है, जो 76 फीसदी की राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है।
यूपी के सांसदों की अटेंडेंस 80 फीसदी
जिस राज्य की अगुवाई राहुल गांधी करते हैं, उस उत्तर प्रदेश के सांसदों की उपस्थिति का औसत कांग्रेस उपाध्यक्ष की तुलना में दोगुना यानी 80 फीसदी है। डाटा यह भी खुलासा करता है कि 15वीं लोकसभा के समूचे कार्यकाल में राहुल ने केवल दो बहसों में हिस्सा लिया।
खास बात यह है कि उन्होंने इस दौरान कोई सवाल नहीं उठाया और न ही कोई प्राइवेट मेंबर बिल सामने लाए। इस लोकसभा में राहुल ने जिन चीजों में दखल दिया, उनमें एक लोकपाल बिल है।
जाहिर है, इस सवाल का जवाब देने में राहुल गांधी को कुछ दिक्कतें पेश आ सकती हैं। यही वजह है कि जब से यह मामला सामने आया है, उनका दफ्तर इस बारे में कुछ भी कहने से इनकार कर रहा है।
मंत्रियों को नहीं करने पड़ते साइन
अब दूसरे सांसदों के डाटा पर नजर डालिए। पीआरएस के आंकड़ों के मुताबिक पूर्णकालिक सांसदों की तरफ से पूछे गए सवालों का राष्ट्रीय औसत 297 है और प्राइवेट मेंबर बिल के मामले में यह आंकड़ा 0.8 है।
इस डाटा में मंत्रियों को शामिल नहीं किया गया, क्योंकि उन्हें अटेंडेंस रजिस्टर पर दस्तखत करने की जरूरत नहीं होती। और ऐसा माना जाता है कि वे लोग सरकार की नुमाइंदगी करते हैं।
लेकिन ऐसा नहीं कि राहुल का परफॉर्मेंस सबसे खराब हैं। कुछ और नेता हैं, जिनका प्रदर्शन उनसे भी बदतर रहा है। और यहां समानता भी दिखती है, क्योंकि इन नेताओं में सभी राजनीतिक दलों का प्रतिनिधित्व भी दिखा।
डिंपल यादव, राहुल से भी पीछे
राहुल गांधी से भी खराब उपस्थिति वाले नेताओं में डीएमके के नेता ए राजा, एम के अलागिरि, डी नेपोलियन, समाजवादी पार्टी नेता और अखिलेश यादव की पत्नी डिंपल यादव, तृणमूल कांग्रेस के मोहन जटुआ, शिशिर अधिकारी और कबीर सुमन, झारखंड मुक्ति मोर्चा के शिबू सोरेन, भाजपा के बलिराम कश्यप, डी वी सदानंद गौड़ा और विट्ठलभाई हंसराजभाई शामिल हैं।
अगर हम नौजवान सांसदों की बात करें, तो राहुल का प्रदर्शन और निराश करता है। दरअसल, 45 साल से कम उम्र के सांसदों में राहुल की उपस्थिति निचले स्तर से सिर्फ छह कदम ऊपर है।
लेकिन कांग्रेस के लिए इन आंकड़ों में खुशी का इंतजाम भी है। उसके कुछ नेता ऐसे हैं, जिन्होंने संसद के हर सत्र में हिस्सा लिया और सक्रिय भूमिका अदा की। लेकिन राहुल इनसे सीख नहीं ले सके।
लेकिन कुछ ने मारा मैदान
डाटा बताता है कि कांग्रेस के नेता डी के सुरेश, के पी धनपालन, प्रतिभा सिंह और रमेश कुमार की उपस्थिति 100 फीसदी रही है। राहुल लोकसभा चुनावों के लिए बनी कांग्रेस की प्रचार समिति के को-चेयरमैन हैं।
उनके साथ इस समूह की अगुवाई उनकी मां और कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी कर रही हैं। और इन दोनों पर जिम्मा होगा आगामी लोकसभा चुनावों में पार्टी को जीत के दरवाजे या उसके करीब ले जाने का।
खास बात यह भी है कि शुक्रवार को खत्म हुई 15वीं लोकसभा साल 1962 की तुलना में सबसे कम काम करने वाली रही है। इस दौरान सबसे कम घंटों के लिए काम हुआ, जो बेहद निराशाजनक है।