गुजरात चुनाव: सौराष्ट्र में जातिगत राजनीति हावी

राजकोट/एजेंसी Updated Sat, 08 Dec 2012 07:56 AM IST
racial politics in saurashtra
गुजरात की राजनीति में हमेशा से निर्णायक भूमिका निभाने वाला सौराष्ट्र विकास के नाम पर काफी पीछे छूट गया है। यहां जातिगत राजनीति हावी है। यही कारण है कि मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी अपने ही प्रदेश के ग्रामीण अंचलों में राजनीतिक और आर्थिक रूप से प्रभावी पटेल बिरादरी और खेडुतों (किसानों) का गुस्सा झेल रहे हैं। शहरी अंचलों में हालांकि उनकी चमक फीकी नहीं पड़ी है।

कच्छ की छह सीटों को अलग कर दिया जाए तो 2007 के चुनावी महाभारत में सौराष्ट्र की कुल 52 में से 45 सीटों पर भारतीय जनता पार्टी (भाजपा) की जीत हुई थी। इसी के दम पर मोदी दूसरी बार सत्ता में आए। मोदी का जादू ऐसा चला था कि कच्छ की सभी सीटें भी भाजपा के ही खाते में गईं, लेकिन इस दफा यहां की राजनीतिक फिजा बदली-बदली सी नजर आ रही है।

इस विकसित प्रदेश का यह क्षेत्र कई जातियों में बंटा है और विकास पर जातिगत राजनीति हावी है। राजनीतिक दलों ने भी इसमें कम योगदान नहीं दिया है, क्योंकि कांग्रेस और भाजपा के टिकट बंटवारे का आधार ही जाति रहा है तो परिवर्तन के नाम पर बनी गुजरात परिवर्तन पार्टी (जीपीपी) का गठन भी जाति आधारित ही है, जिसके अगुवा बप्पा के नाम से प्रसिद्ध पूर्व मुख्यमंत्री केशुभाई पटेल हैं।

सौराष्ट्र में कोली समुदाय बहुमत में है, जिनकी आबादी लगभग 30 फीसदी है, जबकि सिर्फ 19 फीसदी की आबादी पर पटेल समुदाय अधिक प्रभावी है। पटेल समुदाय आर्थिक रूप से शुरू से ही मजबूत रहा है और इसी की बदौलत राजनीति में भी उनका वर्चस्व रहा है अधिक आबादी होने के बावजूद कोली समुदाय सत्ता से विमुख रहा है, क्योंकि उनकी आजीविका पटेलों से जुड़ी रही है। यही वजह भी रही है कि गुजरात के बाहर पटेल ही गुजरात के प्रतिनिधि के रूप में नजर आते रहे हैं। हालांकि पटेल भी लेहुआ और कड़वा में बंटे हुए हैं। शेष 50 फीसदी आबादी दलितों, राजपूतों, अन्य पिछड़ा वर्ग, मुसलमानों में बंटी हुई है।

मोदी की राह में कांटे बोने के लिए 80 साल की उम्र में सक्रिय केशुभाई के प्रति सौराष्ट्र के लोगों में अब भी सम्मान का भाव है और अपनी अस्मिता के नाम पर पटेल समुदाय तो उनके साथ एकजुट खड़ा दिख रहा है। वहीं कभी भाजपा का परम्परागत वोट बैंक रहा कोली इस बार कांग्रेस के साथ है।

कहने को मोदी के रणनीतिकार यह बोल रहे हैं कि सूबे में जातिगत राजनीति नहीं हैं, लेकिन वे यह भूल रहे हैं कि जाति आधारित राजनीति की जड़ें यहां पुरानी और गहरी रही हैं। राज्य में माधाव सिंह सोलंकी खाम फैक्टर (क्षत्रिय, हरिजन, आदिवासी और मुसलमान) के सहारे 182 में से 148 सीटें जीतकर रिकॉर्ड कायम कर चुके हैं।

ऊंचाइयों पर पहुंचने के बाद भी मोदी सोलंकी के लक्ष्य को नहीं भेद पाए हैं। 2002 और 2007 के बीते चुनावों में जाति आधारित राजनीति बेशक गौण हो गई थी, लेकिन इस दफे कोई मुख्य चुनावी मुद्दा न होने की वजह से जातिगत राजनीति एक बार फिर पैर पसारती नजर आ रही है। 2002 के चुनाव में गोधरा मुद्दा था तो 2007 के चुनाव में विकास और मौत का सौदागर मुद्दा बन गया था।

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