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पहाड़ियों की रानी में दिलचस्प है मुकाबला

Fri, 28 Mar 2014 04:25 PM IST
रीता तिवारी/ अमर उजाला ब्यूरो, दार्जिलिंग
रीता तिवारी/ अमर उजाला ब्यूरो, दार्जिलिंग Updated Fri, 28 Mar 2014 04:25 PM IST
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Queen of moutains have a interesting competition

पहाड़ियों की रानी के नाम से मशहूर दार्जिलिंग में पर्यटन का सीजन पूरे शबाब पर है। पूरा शहर देशी-विदेशी पर्यटकों से भरा है। बेहद खुशगवार और शीतल मौसम में इस पर्वतीय संसदीय सीट के लिए होने वाले चुनाव के चलते माहौल में राजनीतिक गर्मी धीरे-धीरे बढ़ने लगी है।

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तृणमूल कांग्रेस ने भारतीय फुटबॉल टीम के पूर्व कप्तान बाइचुंग भूटिया को मैदान में उतारा है, जबकि भारतीय जनता पार्टी ने गोरखा जनमुक्ति मोर्चा के समर्थन से एस एस आहलुवालिया को अपना उम्मीदवार बनाया है।
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अलग गोरखालैंड राज्य की मांग में आंदोलन करने वाले संगठनों का समर्थन ही यहां किसी उम्मीदवार की जीत की गारंटी माना जाता है। सुभाष घीसिंग के जमाने में गोरखा नेशनल लिबरेशन फ्रंट (जीएनएलएफ) और अब गोरखा मोर्चा।
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भूटिया पर बाहरी होने का ठप्पा

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इस सीट पर तृणमूल कांग्रेस प्रमुख और मुख्यमंत्री ममता बनर्जी की प्रतिष्ठा दांव पर है। यही वजह है कि उन्होंने इस सप्ताह लगातार दो दिन भूटिया के समर्थन में इलाके में चुनावी रैलियां की हैं। आम पर्वतीय शहरों की तरह यहां भी सुबह देर से शुरू होती है और शामें जल्दी ढल जाती हैं।

इसलिए तमाम उम्मीदवार भी इसी के अनुरूप रणनीति बना कर चुनाव प्रचार के लिए निकल रहे हैं। भाजपा को मोर्चा के समर्थन ने हमेशा फारवर्ड पोजीशन पर खेल कर गोल दागने वाले भूटिया को बैकफुट पर आने को मजबूर कर दिया है। मोर्चा ने उन पर बाहरी होने का ठप्पा लगा दिया है। उनका घर पड़ोसी राज्य सिक्किम में है। लेकिन भूटिया इससे विचलित नहीं हैं। भूटिया कहते हैं, ‘मैं भी पहाड़ का हूं। सिक्किम और दार्जिलिंग की पहाड़ियों में कोई अंतर नहीं है।’

भूटिया कहते हैं कि अगर मैं बाहरी हूं तो आहलुवालिया कहां के हैं? अपनी सभाओं में वे पिछली बार यहां से जीते भाजपा के जसवंत सिंह का उदाहरण देते हैं, जो पांच वर्षों में महज तीन बार दार्जिलिंग आए थे। दूसरी ओर, भाजपा के आहलुवालिया ने शुरूआती दौर में तो गोरखालैंड का समर्थन करने की बात कहकर पार्टी के नेताओं को मुश्किल में डाल दिया था। इसलिए अब वे संभल कर बात करते हैं।

भूटिया अब नहीं लेते गोरखालैंड का नाम

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प्रचार के दौरान भूटिया कहते हैं कि मैं जीतने के बाद इलाके के लोगों की समस्याओं और मांगों को पूरा करने का प्रयास करूंगा। अब वे भूलकर भी गोरखालैंड का नाम नहीं लेते। इलाके के लोगों का दिल जितने के लिए उन्होंने तेनजिंग नोर्गे को भारत रत्न देने का सवाल भी उठाया है। वे कहते हैं, ‘भाजपा सरकार सत्ता में आने पर इस पर विचार करेगी।’

अलग गोरखालैंड है मुद्दा
बरसों से अलग गोरखालैंड राज्य ही इलाके में प्रमुख चुनावी मुद्दा रहा है। हालांकि भूटिया की दलील है कि बरसों से बाहरी लोगों के सांसद बनने की वजह से ही इलाके का कोई विकास नहीं हो सका है। वे कहते हैं कि दार्जिलिंग की पहाड़ियों को विकास की जरूरत है, गोरखालैंड की नहीं।

पिछली बार जसवंत जीते
दार्जिलिंग में पिछली बार 12.15 लाख वोटर थे। तब भाजपा नेता जसवंत सिंह लगभग पांच लाख वोटों के अंतर से जीते थे। तब भी मोर्चा ने भाजपा का समर्थन किया था। वाम मोर्चा उम्मीदवार जीवेश सरकार दूसरे नंबर पर रहे।

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