नवाज की नाक में दम करने वाले ताहिर को जानिए
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'मुझसे बड़ा मार्क्स, स्टालिन और लेनिन कोई नहीं।' पाकिस्तान अवामी तहरीक के संस्थापक ताहिर उल कादरी अपने समर्थकों के बीच खुद का परिचय कुछ इसी अंदाज में देते हैं। पाकिस्तान की राजनीति में पिछले कई दिनों से पाकिस्तान तहरीक-ए-इंसाफ नेता इमरान खान और पाकिस्तानी अवामी तहरीक नेता ताहिर उल कादरी के कारण तूफान आया है।
दोनों ही पार्टियों ने इस्लामाबाद में घेरा डाल रखा है। दोनों दल पाकिस्तानी प्रधानमंत्री नवाज शरीफ का इस्तीफा मांग रहे हैं। उन्होंने इस्तीफे के लिए नवाज शरीफ को दो दिनों का अल्टीमेटम दिया था, जिसकी मियाद मंगलवार को पूरी हो गई है।
नतीजे में इमरान खान के पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद के अतिसुरक्षित रेड जोन इलाके में प्रवेश करने का निर्णय लिया है। रेड जोन राजधानी का वही इलाका है, जहां पाकिस्तान की संसद, राष्ट्रपति, प्रधानमंत्री के निवास है और सभी दूतावास हैं।
ताहिर उल कादरी ने इस्लामाबाद में जनसंसद लगाने के फैसला किया है। ये जनसंसद धरने की शक्ल में होगी।
2013 के आम चुनावों से पहले ताहिर ने निकाला मार्च
क्रिकेट से राजनीति में आए इमरान खान दुनिया भर के लिए जानापहचाना नाम हैं, लेकिन पाकिस्तान अवामी तहरीक के नेता ताहिर उल कादरी अब भी दुनिया के बड़े हिस्से के लिए अबुझ ही हैं, जबकि पाकिस्तानी अवामी तहरीक लगभग ढाई दशक पुरानी पार्टी है। 1990 में पार्टी की स्थापना ताहिर ने ही की थी। पार्टी ने 1991 में राष्ट्रीय चुनावों में भाग भी लिया।
2013 के आम चुनावों से महज पांच महीने पहले ताहिर ने पाकिस्तानी सरकार के विरोध में विशाल मार्च निकाला। उस समय उन्होंने नारा दिया था-देश को बचाइए, राजनीति को नहीं।
हालांकि कई राजनीतिक विश्लेषकों ने ये कहकर कि कादरी चुनावों से चंद महीने पहले ही क्यों सक्रिय हुए हैं, उस समय उनकी मंशा पर शक जताया था। ताहिर पाकिस्तान की राजनीति में एक बार फिर सक्रिय हैं।
अलजजीरा को दिए एक साक्षात्कार में उन्होंने मांग की थ्ाी कि पाकिस्तान में चुनाव प्रक्रिया पारदर्शी बनाई जाए। वे संविधान में प्रदत्त जीवन, संपत्ति और स्वतंत्रता के अधिकार के पूर्ण क्रियान्वयन की मांग कर रहे है।
2004 में मुशर्रफ से मतभेद के बाद दिया इस्तीफा
राजनेता के अलावा ताहिर उल कादरी पाकिस्तानी कानूनों के विद्वान और शिया धार्मिक नेता के रूप में भी जाने जाते हैं।
2002 के आम चुनावों में उन्हें नेशनल असेंबली के सदस्य के रूप में चुना गया था। लेकिन 2004 में तत्कालीन राष्ट्रपति परवेज मुशर्रफ से मतभेद के बाद उन्होंने इस्तीफा दे दिया था।
उन्होंने 41 पेज का इस्तीफा लिखा था और मुशर्रफ पर राजनीतिक भ्रष्टाचार, ब्लैकमेलिंग, इराक युद्घ और भारत पाकिस्तान संबधों को लेकर कई गंभीर आरोप लगाए थे।
2005 में वे कनाडा में बस गए। 2008 में उनकी पार्टी ने पाकिस्तानी आम चुनावों का बहिष्कार भी किया। 2013 के चुनावों के ठीक पहले वे पाकिस्तान की राजनीति में सक्रिय हो गए।
जन-कल्याणकारी गतिविधियों में शामिल ताहिर
ताहिर कनाडा में वे सामाजिक संगठन मिनहाजुल कुरान इंटरनेशनल (एमक्यूआई) का संचालन भी करते हैं। ताहिर के मुताबिक, ये संगठन दुनिया के 80 से ज्यादा देशों में शैक्षणिक और जन-कल्याणकारी गतिविधियों में शामिल है। सीएनएन-आईबीएन ने उन्हें 2012 में 'अंतरराष्ट्रीय शांति दूत' के खिताब से नवाजा था।
19 फरवरी 1951 को जन्मे कादरी ने लॉ की पढ़ाई पंजाब (पाकिस्तानी पंजाब) यूनिवर्सिटी से की और वहीं प्रोफेसर भी रहे। कादरी ने मिनहाज यूनिवर्सिटी और चैरिटी संगठन मिनहाज वेल्फेयर फाउंडेशन की स्थापना भी की है।
कादरी 2010 में एकाएक तब चर्चा में आए, जब उन्होंने आतंकवाद के खिलाफ फतवा दिया। उनके इस कदम की दुनिया भर में सराहना हुई थी। अमेरिका ने कहा था कि कादरी ने इस्लाम को आतंकवाद से अलग करने का काम किया है।
भारत भी आ चुके हैं कादरी
ताहिर-उल-कादरी ने 2012 में भारत की भी यात्रा की थी। इस यात्रा में उन्होंने दिल्ली में तत्कालीन अल्पसंख्यक मामलों के मंत्री ए रहमान खान, पूर्व रेल मंत्री सी के जाफर शरीफ और प्रेस काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष जस्टिस मारकंडेय काटजू जैसी चुनिंदा शख्सियतों से मुलाकात की थी। कादरी ने दिल्ली के बाद मुंबई, बंगलुरू और हैदराबाद की भी यात्रा की।
भारत यात्रा के दौरान कादरी भारतीय एजेंसियों की नजर में तब आए जब 14 मार्च 2012 को मुंबई में उनकी होने वाली सभा के खिलाफ वहां की कट्टर मुसलिम संस्था रजा एकेडमी ने तीखा विरोध दर्ज किया और उसे रोकने के लिए मुंबई हाईकोर्ट में याचिका तक दायर कर दी।
रजा एकेडमी की शिकायत थी कि कादरी मुंबई में भड़काऊ भाषण देंगे, जिससे सांप्रदायिक माहौल बिगड़ने का खतरा है। इसके बाद बंगलूरू और हैदराबाद में उनकी गतिविधियों को सीमित रखा गया।
दिल्ली के इंडिया इस्लामिक सेंटर में उनकी किताब 'फतवा ऑन टेरोरिजिम एंड सुसाइड बांबिंग' के लिए सम्मानित भी किया गया था। कादरी उर्दू, अरबी और अंग्रेजी में लगभग चार सौ किताबों का लेखन कर चुके हैं।