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प्रधान मंत्री बोले, आरटीआई की हद तय की जाए
नई दिल्ली/अमर उजाला ब्यूरो
Updated Fri, 12 Oct 2012 11:30 PM IST
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प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने सूचना के अधिकार (आरटीआई) के साथ निजता के अधिकार को भी सुनिश्चित करने की वकालत की है। प्रधानमंत्री ने आरटीआई के बेजा इस्तेमाल पर चिंता जाहिर करते हुए कहा कि सूचना के अधिकार के चलते निजता का हनन नहीं होना चाहिए। निजता के हनन की संभावना की सूरत में जनता के जानने के कानूनी अधिकार (आरटीआई) की हद तय करनी चाहिए। प्रधानमंत्री ने कहा कि आरटीआई और निजता के अधिकारी के बीच संतुलन जरूरी है। गौरतलब है कि एक आरटीआई का हवाला देते हुए गुजरात के मुख्यमंत्री नरेंद्र मोदी ने यूपीए अध्यक्ष सोनिया गांधी की विदेश यात्राओं के खर्च पर सवाल खड़े कर दिए हैं। मोदी ने उस यात्रा का भी ब्योरा मांगा है जो सोनिया के विदेश में किए गए इलाज से संबंधित है।
प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को सूचना का अधिकार कानून के 7वें सालाना सम्मेलन का आगाज करते हुए यह राय जाहिर की। सोनिया के खिलाफ मोदी के आरटीआई बाण का जिक्र किए बिना प्रधानमंत्री ने कहा कि सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी हासिल करने में व्यक्तिगत व निजी अधिकारों के हनन की भी पूरी संभावना होती है। लोगों को सूचना आम भलाई के मकसद से लेनी चाहिए। ऐसा नहीं हो कि सूचना के कारण किसी की निजी जिंदगी पर असर पड़े। इसलिए निजता के अधिकार और आरटीआई के इस्तेमाल के बीच सामंजस्य बनाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि निजता का हनन होता है तो जनता के जानने के कानूनी हक की हद तय करनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इस हद की लकीर या लक्ष्मण रेखा कहां खींची जाए, यह जटिल सवाल है।
मनमोहन सिंह ने आरटीआई के जरिए सार्वजनिक निजी भागेदारी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के अंतर्गत बनी कंपनियों से संबंधित सूचना मांगने पर भी सवाल खड़े कर सरकार की मंशा जाहिर कर दी। उन्होंने कहा कि पीपीपी कंपनियों में आरटीआई की खुली छूट देने से निजी कंपनियां हतोत्साहित होंगी। इससे निजी कंपनियां सरकारी कंपनियों के साथ काम करने से हाथ खींचने लगेंगी। लेकिन इसे आरटीआई के दायरे से हटा कर लोगों के सूचना के अधिकार पर आघात नहीं किया जा सकता। इन हालत में इस अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत को जनता को समझना पड़ेगा।
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आरटीआई : जनता के निशाने पर सांसद
-15वीं लोकसभा के गठन के तुरंत बाद राहुल गांधी की परिसंपत्तियों की जानकारी मांगी गई।
-सांसदों के सदन की कार्यवाही में शामिल होने को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पूछे जा रहे हैं।
-सांसद निधि से किए गए खर्च की जानकारी मांगी जाती है।
-सांसदों के आपराधिक रिकार्ड को लेकर भी बड़ी संख्या में सवाल होते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जो सूचना अधिकार के तहत -सांसदों के दिल्ली के आवास का पता और टेलीफोन नंबर चाहते हैं।
प्रधानमंत्री की आरटीआई को लेकर पहले प्रतिक्रिया
14 अक्तूबर, 2011 : आरटीआई कानून को और असरदार बनाने के लिए इसके फायदों और नुकसान पर चर्चा होनी चाहिए ताकि सरकारी महकमों की चिंताओं को दूर किया जा सके। आरटीआई से सरकारी काम नहीं रुकने चाहिए।
आरटीआई के दायरे से बाहर होते गए
दिसंबर, 2009 : सांसद और विधायक जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में नहीं आते लेकिन लोग उनके कार्यों के बारे में सूचना संसद, राज्य विधानसभा या स्थानीय निकायों से मांग सकते हैं।
सितंबर, 2009 : सूचना आयोग ने कहा कि प्रधानमंत्री की बीमारियों संबंधी जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नहीं दी जा सकती क्योंकि यह बेहद निजी मसला है। आयोग ने हालांकि कहा कि उपचार के दौरान हुए खर्च का खुलासा किया जाना चाहिए क्योंकि यह पैसा सरकारी खजाने से जाता है।
जून, 2011 : सीबीआई को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के बाद सरकार ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नेटग्रिड) को भी इसके दायरे से बाहर कर दिया। मामला कोर्ट तक पहुंचा।
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प्रधानमंत्री ने शुक्रवार को सूचना का अधिकार कानून के 7वें सालाना सम्मेलन का आगाज करते हुए यह राय जाहिर की। सोनिया के खिलाफ मोदी के आरटीआई बाण का जिक्र किए बिना प्रधानमंत्री ने कहा कि सूचना के अधिकार कानून के तहत जानकारी हासिल करने में व्यक्तिगत व निजी अधिकारों के हनन की भी पूरी संभावना होती है। लोगों को सूचना आम भलाई के मकसद से लेनी चाहिए। ऐसा नहीं हो कि सूचना के कारण किसी की निजी जिंदगी पर असर पड़े। इसलिए निजता के अधिकार और आरटीआई के इस्तेमाल के बीच सामंजस्य बनाने की जरूरत है। प्रधानमंत्री ने कहा कि यदि निजता का हनन होता है तो जनता के जानने के कानूनी हक की हद तय करनी चाहिए। हालांकि उन्होंने यह भी माना कि इस हद की लकीर या लक्ष्मण रेखा कहां खींची जाए, यह जटिल सवाल है।
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मनमोहन सिंह ने आरटीआई के जरिए सार्वजनिक निजी भागेदारी यानी पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप (पीपीपी) के अंतर्गत बनी कंपनियों से संबंधित सूचना मांगने पर भी सवाल खड़े कर सरकार की मंशा जाहिर कर दी। उन्होंने कहा कि पीपीपी कंपनियों में आरटीआई की खुली छूट देने से निजी कंपनियां हतोत्साहित होंगी। इससे निजी कंपनियां सरकारी कंपनियों के साथ काम करने से हाथ खींचने लगेंगी। लेकिन इसे आरटीआई के दायरे से हटा कर लोगों के सूचना के अधिकार पर आघात नहीं किया जा सकता। इन हालत में इस अधिकारों के बीच संतुलन की जरूरत को जनता को समझना पड़ेगा।
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आरटीआई : जनता के निशाने पर सांसद
-15वीं लोकसभा के गठन के तुरंत बाद राहुल गांधी की परिसंपत्तियों की जानकारी मांगी गई।
-सांसदों के सदन की कार्यवाही में शामिल होने को लेकर सबसे ज्यादा सवाल पूछे जा रहे हैं।
-सांसद निधि से किए गए खर्च की जानकारी मांगी जाती है।
-सांसदों के आपराधिक रिकार्ड को लेकर भी बड़ी संख्या में सवाल होते हैं। कई लोग ऐसे भी हैं जो सूचना अधिकार के तहत -सांसदों के दिल्ली के आवास का पता और टेलीफोन नंबर चाहते हैं।
प्रधानमंत्री की आरटीआई को लेकर पहले प्रतिक्रिया
14 अक्तूबर, 2011 : आरटीआई कानून को और असरदार बनाने के लिए इसके फायदों और नुकसान पर चर्चा होनी चाहिए ताकि सरकारी महकमों की चिंताओं को दूर किया जा सके। आरटीआई से सरकारी काम नहीं रुकने चाहिए।
आरटीआई के दायरे से बाहर होते गए
दिसंबर, 2009 : सांसद और विधायक जैसे निर्वाचित जनप्रतिनिधि सूचना के अधिकार अधिनियम के दायरे में नहीं आते लेकिन लोग उनके कार्यों के बारे में सूचना संसद, राज्य विधानसभा या स्थानीय निकायों से मांग सकते हैं।
सितंबर, 2009 : सूचना आयोग ने कहा कि प्रधानमंत्री की बीमारियों संबंधी जानकारी सूचना के अधिकार अधिनियम के तहत नहीं दी जा सकती क्योंकि यह बेहद निजी मसला है। आयोग ने हालांकि कहा कि उपचार के दौरान हुए खर्च का खुलासा किया जाना चाहिए क्योंकि यह पैसा सरकारी खजाने से जाता है।
जून, 2011 : सीबीआई को सूचना के अधिकार के दायरे से बाहर रखने के बाद सरकार ने राष्ट्रीय जांच एजेंसी (एनआईए) और नेशनल इंटेलिजेंस ग्रिड (नेटग्रिड) को भी इसके दायरे से बाहर कर दिया। मामला कोर्ट तक पहुंचा।