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नरेंद्र मोदी के लिए आसान नहीं दिल्ली की डगर

Thu, 31 Jan 2013 12:21 AM IST
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा Updated Thu, 31 Jan 2013 12:21 AM IST
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prime minister path not easy for narendra modi

भाजपा में नरेंद्र मोदी को प्रधानमंत्री का उम्मीदवार बनाने की मांग भले ही तेज हो रही हो, लेकिन उनके लिए गुजरात से दिल्ली की डगर आसान नहीं है। एक तो एनडीए का दूसरा बड़ा घटक दल जदयू मोदी की राह में सबसे बड़ा रोड़ा बना है, दूसरे खुद भाजपा के भीतर दिल्ली में जमे दिग्गज उनकी राह में पलक पावड़े बिछाने को तैयार नहीं हैं।

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खासतौर पर भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी पार्टी अध्यक्ष के तौर पर नितिन गडकरी की दोबारा ताजपोशी रुकवाकर साबित कर चुके हैं कि वह अब भी सबसे ताकतवर हैं। वैसे भी गुजरात में हैट्रिक बनाने के बाद मोदी को पीएम उम्मीदवार बनाने की मांग कार्यकर्ताओं के बीच से उठ रही है, जबकि पार्टी के ज्यादातर नेता इस मुद्दे पर खामोश हैं। अभी तक मोदी को सिर्फ चुनाव अभियान समिति की कमान सौंपने की बात हो रही है।
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एक-दो जो नेता सामने आए भी हैं, उनके बारे में पार्टी मान रही है कि वे अपने नंबर बढ़ाने के लिए ही यह मांग कर रहे हैं। आगामी लोकसभा चुनाव में मोदी को बड़ी भूमिका देने को लेकर पार्टी की सर्वोच्च नीति निर्धारक संस्था संसदीय बोर्ड को फैसला करना है, जबकि इस बोर्ड में अब भी आडवाणी, राजनाथ सिंह, सुषमा स्वराज व अरुण जेटली से लेकर डा. मुरली मनोहर जोशी नेता ही शामिल होंगे, जो खुद भी पीएम के उम्मीदवार की लाइन में हैं।
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इसके साथ ही एनडीए में भी मोदी को लेकर एक राय नहीं है। सिर्फ शिरोमणि अकाली दल ही मोदी के नाम पर सहमत है। शिवसेना की पसंद सुषमा है, जबकि जदयू तो मोदी के सख्त खिलाफ है। मोदी का नाम घोषित होने पर जदयू के एनडीए से अलग होने की अटकलें लगाई जा रही हैं। भाजपा भी मानती है कि गठबंधन की राजनीति के दौर में जदयू के अलग होने से गलत संदेश जाएगा। एनडीए का कुनबा बढ़ाने की कोशिश में जुटी भाजपा गठबंधन को बचाने की कोशिश करेगी।


हालांकि भाजपा में मोदी समर्थक नेताओं की दलील है कि यदि भाजपा अकेले दम पर 150 से ज्यादा सीटें जीत लेती हैं, तो चुनाव बाद गठबंधन में और भी दल जुड़ जाएंगे। जबकि गठबंधन समर्थक खेमा कहता रहा है कि लोकसभा की 553 सीटों में से लगभग 200 पर पार्टी कहीं भी नहीं है। जबकि बाकी बची 353 सीटों में से 150 जीत पाना आसान नहीं हैं। इसलिए एनडीए का कुनबा बढ़ाने की वकालत होती रही है।

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