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तमिलनाडु में अदालत की दर पर भगवान!

Tue, 22 Dec 2015 07:07 PM IST
मधुकर उपाध्याय/ वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम
मधुकर उपाध्याय/ वरिष्ठ पत्रकार, बीबीसी हिंदी डॉटकॉम Updated Tue, 22 Dec 2015 07:07 PM IST
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Priest issue takes God to court

समझ से परे है कि 'भगवान के अपने देश' केरल के ठीक पड़ोस में बार-बार ऐसा क्यों होता है कि भगवत लीला सवालों के घेरे में आ जाती है। उन सवालों का हल आसानी से नहीं निकलता और हर दफा मामला कोर्ट कचहरी तक पहुंच जाता है। करीब दो दशक पहले तमिलनाडु में विवाद इस विषय पर था कि भगवान कौन सी भाषा बोलते और समझते हैं।

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पूछा जा रहा था कि अगर पूजा अर्चना संस्कृत की जगह तमिल में हो, मंत्र तमिल में पढ़े जाएं तो भगवान को क्या समस्या होगी? क्या भक्त की प्रार्थना स्वीकार नहीं होगी? अर्चकों-पुजारियों ने इसका कड़ा विरोध किया। उनका तर्क था कि मंत्रों की शक्ति देवभाषा संस्कृत में निहित है। भाषा बदलने पर मंत्र अपनी शक्ति खो देंगे। लेकिन गैर-ब्राह्मण वर्ग इससे सहमत नहीं था। विवाद इस कदर बढ़ा कि उसने राजनीतिक शक्ल ले ली। एक अरसे तक रस्साकशी चलती रही। तमिल में प्रार्थना का विरोध खुलकर कोई नहीं कर रहा था, लेकिन राजनीतिक दलों में सशक्त उच्च वर्ग को नाराज करने का साहस भी नहीं था।
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दूसरी तरफ, वोट की राजनीति उन्हें व्यापक गैर-ब्राह्मण वर्ग के खिलाफ जाने से रोक रही थी। जब सवाल प्रेस कॉन्फ्रेंस में और रास्ता चलते पूछा जाने लगा, तो एक मंत्री ने गुस्से में कहा, "अगर भगवान तमिल नहीं समझते तो उन्हें तमिलनाडु में रहने का हक नहीं है।" यह मामला अदालत में गया पर पूरी तरह नहीं सुलझा। लेकिन इसी बीच सत्तर के दशक का एक दूसरा मुकदमा सुनवाई के लिए पेश हो गया। इस बार सवाल था कि मंदिर के पुजारी के रूप में क्या ब्राह्मण के अलावा किसी और की नियुक्ति की जा सकती है?
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'शास्त्र के प्रावधानों के अंतर्गत हो पुजारी की नियुक्‍ति'

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पूजा पद्धति में प्रशिक्षित और वेदों, पुराणों, आगम शास्त्र में दक्ष किसी अन्य वर्ण के व्यक्ति को पुजारी क्यों नहीं बनाया जा सकता? राज्य सरकार ने इसे संविधान में प्रदत्त धार्मिक स्वतंत्रता के हनन की तरह देखा। तर्क दिया गया कि पुजारी होने पर केवल एक वर्ण का विशेषाधिकार कैसे हो सकता है।

दूसरी ओर, पुजारी इसे अपने संवैधानिक अधिकारों के हनन के रूप में पेश कर रहे थे। सन 1971 में तमिलनाडु की तत्कालीन सरकार ने कानून में संशोधन करते हुए कहा कि वेदों में प्रशिक्षित कोई व्यक्ति मंदिर का पुजारी नियुक्त किया जा सकता है, चाहे वह किसी वर्ण या जाति का हो।

समानता का अधिकार मंदिर में भी लागू होना चाहिए। मामला उच्चतम न्यायालय में पहुंचा तो अदालत ने यह कहकर उसे वहीं छोड़ दिया कि मंदिर में ‘पंडित-पुजारी की नियुक्ति सिर्फ शास्त्र के प्रावधानों के अंतर्गत की जा सकती है।’ फैसले के बाद मामला ठंडा पड़ा पर विवाद अपनी जगह कायम रहा। इसमें प्रश्न संविधान के सोलहवें अनुच्छेद की व्याख्या का था। तय यह किया जाना था कि पांचवीं उपधारा में दर्ज धार्मिक स्वतंत्रता के अधिकार का विस्तार कहां तक है?

क्या उसमें कर्मकांड को शामिल माना जाएगा? सन 2006 में, द्रविड़ मुनेत्र कषगम की सरकार ने दोबारा इसी आशय का एक आदेश जारी किया, जिसे आदि शैव शिवचार्यार्गल नाल संगम ने अदालत में चुनौती दी। न्यायमूर्ति राजन गोगोई और एनवी रमणा ने कहा कि अर्चकों की ‘नियुक्ति शास्त्रोक्त आधार पर होने में संविधान में दर्ज समानता के अधिकार का उल्लंघन नहीं होता।’

अर्चकों की नियुक्ति हिंदू कर्मकांड के अनुरूप ही होगी

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पीठ ने शासकीय आदेश को खारिज नहीं किया लेकिन यह कहते हुए सभी हिंदू वर्णों के लिए अर्चकों की नियुक्ति का पट जरा सा खोल दिया कि भविष्य में ‘ऐसे किसी विवाद में राज्य सरकार के आदेश को भी ध्यान में रखा जाए।’मतलब यह कि अनुच्छेद 16 (5) के तहत अर्चकों की नियुक्ति हिंदू कर्मकांड और आगम शास्त्र के अनुरूप ही होगी लेकिन किसी मामले में विवाद होने पर अदालत देखेगी कि वह नियुक्ति संविधान सम्मत है या नहीं।

उससे संविधान की किसी व्यवस्था का उल्लंघन तो नहीं हो रहा है। यानी कि एकमुश्त आदेश देने की जगह सुप्रीम कोर्ट ने ऐसे मुद्दों को अलग-अलग मामलों में जरूरी होने पर विचार के लिए छोड़ दिया। एक तरह से देखा जाए तो अदालत के फैसले ने सभी हिंदू वर्णों जातियों के लिए मंदिर में अर्चना का कपाट खोलने की जगह और मुकदमेबाजी के लिए न्यायालय के कपाट खोल दिए हैं। मामला हल होने की जगह और उलझ गया है।

अदालत के फैसले को केवल इस अर्थ में स्वागत योग्य कहा जा सकता है कि उसने सभी वर्णों के लिए मंदिरों के दरवाजे थोड़ा और खोल दिए हैं। इस संभावना को कुछ और प्रबल बना दिया है। लेकिन इसे क्रांतिकारी निर्णय कहना शायद उचित नहीं होगा क्योंकि दरवाजा जितना खुला है उतना ही बंद भी है। हर बार उसे खोलने के लिए अदालत की शरण में जाना पड़ेगा।

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