राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने याद किए पुराने दिन
बात 70 के दशक की है। राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी तब युवा थे और देश के वित्त राज्यमंत्री थे। उनके सचिव की उम्र उनसे अधिक थी।
एक दिन उन्होंने अपने सचिव से पूछा कि क्या उन्हें अपने से कम उम्र और कम अनुभव के मंत्री से निर्देश लेने में हिचकिचाहट नहीं होती। इसके जवाब में सचिव ने जो कुछ कहा था उसे सुनकर मुखर्जी हक्के-बक्के रह गए थे।
सचिव ने कहा था कि वह निर्देश लेते समय उनका नहीं बल्कि उन्हें यहां तक पहुंचाने वाले का चेहरा देखते हैं। राष्ट्रपति ने बीते दिनों के अपने इस अनुभव को साझा कर प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को देश और जनता के प्रति जिम्मेदारियां निभाने की याद दिलाई।
उन्होंने कहा कि उक्त सचिव के जवाब से स्पष्ट है कि वह उनसे आदेश का पालन कर उन लोगों की अपेक्षाओं को पूरा करता था, जिन्होंने उनके ऊपर भरोसा जताया था।
राष्ट्रपति शुक्रवार को मसूरी के एलबीएस राष्ट्रीय प्रशासन अकादमी में ऑल इंडिया सर्विस के 89वें फाउंडेशन कोर्स के विदाई समारोह में शिरकत कर रहे थे।
प्रशासनिक सेवा के अधिकारियों को दी सीख
इस दौरान राष्ट्रपति ने बदलते परिवेश में नौकरशाही पर जन आकांक्षाओं को पूरा करने के बढ़ते दबाव का जिक्र किया और कहा कि यह जिम्मेदारी अब सिर्फ सरकारों तक ही सीमित नहीं रह गई है।
राष्ट्रपति ने अधिकारियों से कहा कि आज का युवा तेजी से विकास चाहता है। उसकी अपेक्षाएं बहुत ज्यादा हैं। ऐसे में करीब साढ़े तीन दशक तक देश की सेवा करने वाला अधिकारी अपनी जिम्मेदारी महज पांच साल के लिए सांसद और मंत्री बनने वालों पर नहीं डाल सकता। अब अधिकारियों को अधिक जिम्मेदारी लेनी होगी और उन्हें निभानी होगी।
राष्ट्रपति ने अपने संबोधन में सुशासन की भी चर्चा की। उन्होंने कहा कि सुशासन भारत के लिए कोई नया शब्द नहीं है। भारत के अर्थशास्त्र, गीता, महाभारत में प्रमुखता से इसकी झलक मिलती है।
उन्होंने कहा कि सुशासन का वास्तविक अर्थ संविधान के दायरे में विकास और शक्ति का सही बंटवारा है। यह अर्थव्यवस्था और सामाजिक स्रोतों के बेेहतर प्रबंधन के जरिए ही संभव है।
भारत की उत्तरोत्तर प्रगति की चर्चा करते हुए राष्ट्रपति ने कहा कि 50 से 80 के दशक तक दुनिया हमारे 3.5 फीसदी विकास दर को हिंदू विकास दर कह कर मजाक उड़ाती थी, लेकिन नई सदी में बेहतर प्रबंधन के कारण स्थिति ने ऐसी करवट ली कि वैश्विक आर्थिक मंदी की दौर में विकसित देशों ने खुद भारत को जी20 का सदस्य बनाने का आह्वान किया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि दुनिया मान गई कि भारत को विचार में शामिल किए बिना इस संकट से निजात नहीं मिल सकता।