राष्ट्रपति प्रणब ने आत्मकथा में किए अहम खुलासे
छह दशक के देश की राजनीतिक का अहम हिस्सा रहे राष्ट्रपति प्रणव मुखर्जी ने कहा है कि उनका कभी भी बड़ा जनाधार नहीं रहा। यही वजह है कि प्रधानमंत्री राजीव गांधी के कार्यकाल के दौरान कांग्रेस से अलग होकर पार्टी बनाना उनकी बड़ी नाकामी साबित हुई।
प्रणव मुखर्जी ने अपनी आत्मकथा के दूसरे खंड में कहा है कि इंदिरा गांधी की हत्या के बाद उन्होंने कभी भी राजीव गांधी को प्रधानमंत्री बनने से रोकने की कोशिश नहीं की।
राजनीतिक इतिहास के बड़े सियासी मिथक को तोड़ते हुए राष्ट्रपति ने कहा है कि उन्हें उस दौरान फैलाई गई इस भ्रांति की कीमत कांग्रेस से उपजी दूरी के तौर पर चुकानी पड़ी थी।
अपनी किताब में प्रणव मुखर्जी ने 1980 से 1996 तक के 16 साल को देश की राजनीति का अशांत काल कहा है। राष्ट्रपति भवन में उप राष्ट्रपति हामिद अंसारी ने पुस्तक का विमोचन किया और उसकी पहली प्रति राष्ट्रपति को सौंपी।
इस मौके पर कर्ण सिंह, नटवर सिंह और पी जे कुरियन के अलावा कांग्रेस की ओर से किसी नेता ने शिरकत नहीं की। बीजेपी की तरफ से लालकृष्ण आडवाणी और राज्यसभा सांसद चंदन मित्रा विमोचन समारोह में मौजूद थे।
बाबरी ढ़ाचे का विध्वंस तत्कालीन पीएम की सबसे बड़ी असफलता
ऑपरेशन ब्लू स्टार और संवेदनशील आर्थिक फैसलों पर अपना तजुर्बा समेटते हुए
राष्ट्रपति ने बाबरी ढाचे के विध्वंस को तत्कालीन प्रधानमंत्री नरसिंह राव
की सबसे बड़ी असफलता करार दिया। उन्होंने लिखा है कि विध्वंस के बाद
उन्होंने नरसिंह राव को एक निजी मुलाकात के दौरान कस कर डांट लगाई थी।
प्रणव मुखर्जी ने राव से कहा कि क्या आपको किसी ने विध्वंस के खतरे के
प्रति आगाह नहीं किया है। क्या आप ढांचे के नुकसान का विश्व्यापी असर समझ
रहे हैं। प्रणव में मुताबिक उन्होंने गुस्से में राव से कहा कि अब वह कम से
कम सांप्रदायिक तनाव रोकने और मुसलमानों में विश्वास बहाली के लिए ठोस कदम
उठाएं।
प्रणव ने लिखा है कि राव ने अपने चेहरे पर कोई भाव नहीं आने दिया।
लेकिन वह (प्रणव) उनकी (राव) उदासी और विवशता को अच्छी तरह भांप रहे थे।
हालांकि इस प्रणव मुखर्जी ने माना है कि उस समय हालात ऐसे थे कि केंद्र
सरकार चाह के भी वैसे कदम नहीं उठा पा रही थी जिससे विध्वंस को रोका जा
सके। राज्य सरकार भी केंद्र से ढांचे को नुकसान नहीं पहुचने देने के लिखित
वादे पर खड़ी नहीं उतर सकी।