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दया याचिकाएं खारिज, सात लोगों की फांसी तय

Thu, 04 Apr 2013 05:06 PM IST
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क
नई दिल्ली/इंटरनेट डेस्क Updated Thu, 04 Apr 2013 05:06 PM IST
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president pranab mukherjee rejects five mercy petitions

राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने फांसी की सात दया याचिकाओं पर फैसला सुना दिया है। इनमें से पांच मामलों में उन्होंने फांसी की सजा बरकरार रखी है जबकि दो मामलों में फांसी की सजा को आजीवन कारावास में बदल दिया।

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जिन पांच दया याचिकाएं को राष्ट्रपति ने खारिज कर दिया उनमें कुल सात लोग गुनहगार हैं। इनमें एक महिला भी शामिल है। आजाद भारत में संभवत: पहली बार किसी महिला को फांसी की सजा देने पर राष्ट्रपति ने मुहर लगाई है।
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फांसी का रास्ता साफ
राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के इस फैसले के साथ ही इन सात दोषियों को फांसी दिया जाना तय हो गया है।
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माना जा रहा है कि हरियाणा का धर्मपाल को सबसे पहले फांसी दी जाएगी। उन्हें कब फांसी दी जाएगी इसकी जानकारी नहीं दी गई हे। फिलहाल धर्मपाल रोहतक जेल में बंद है।

सबसे पहले धर्मपाल को फांसी?
धर्मपाल पर एक लड़की के साथ बलात्कार करने का आरोप लगा था। आरोप साबित होने पर 1993 में अदालत ने उसे दस साल की सजा सुनाई थी।

बाद में पांच दिन के लिए धर्मपाल को पैरोल पर रिहा किया गया तो उसने एक भयानक हत्याकांड को अंजाम दिया। धर्मपाल ने अपने भाई निर्मल के साथ मिलकर पीड़ित लड़की के मां, बाप, बहन और भाई की हत्या कर दी।

इस मामले में अदालत ने दोनों भाइयों को फांसी की सजा सुनाई। बाद में सुप्रीम कोर्ट ने धर्मपाल की फांसी की सजा बरकरार रखी, वहीं निर्मल की सजा उम्रकैद में बदल दी।

राष्ट्रपति ने संविधान के अनुच्छेद-72 के मुताबिक अपने अधिकार का उपयोग किया। सूत्रों के मुताबिक अब राष्ट्रपति के पास कोई दया याचिका लंबित नहीं है।

राष्ट्रपति ने फांसी की सजा पाए इन सात मामलों में लिया फैसलाः


गुरमीत सिंह (यूपी)
--लखीमपुर खीरी में 17-18 अगस्त 1986 की रात को गुरमीत सिंह ने अपने एक अन्य साथी लाखा सिंह (ट्रायल के दौरान मौत हो गई) के साथ मिलकर एक ही परिवार के 13 सदस्यों की हत्या कर दी थी।
--20 सितम्बर 1992 में ट्रायल कोर्ट ने उसे मौत की सजा सुनाई।
--2005 में सुप्रीम कोर्ट ने मौत की सजा को बरकरार रखा। 2007 से राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका लंबित है।

धर्मपाल (हरियाणा)
--1991 में उसने लड़की के साथ रेप किया था, जिसके बाद 1993 में उसे 10 साल की सजा सुनाई गई। सजा के दौरान ही उसे पांच दिनों के लिए पैरोल पर छोड़ा गया। पैरोल पर रिहा होते ही धर्मपाल ने पीड़ित लड़की के मां-बाप समेत 5 लोगों की हत्या कर दी थी। जिसके बाद कोर्ट ने उसे फांसी की सजा सुनाई थी।

--1999 में सुप्रीम कोर्ट ने धर्मपाल की सजा कायम रखी। उसने राष्ट्रपति के समक्ष दया याचिका दाखिल की थी।
धर्मपाल फिलहाल रोहतक जेल में बंद है।

सोनिया और उसके पति संजीव (हरियाणा)
--23 अगस्त 2001 को देर रात हरियाणा के पूर्व विधयाक रेलूराम और सात अन्य परिवार के सदस्यों की हत्या उनके हिसार के लिटानी स्थित फार्म हाऊस में सोते समय जहरीला पदार्थ खिलाने और फिर रॉड मारकर कर दी गई। रात को परिवार के सदस्यों ने बेटी का जन्म दिन भी मनाया था। मृतको में विधायक रेलूराम पुनिया, उसकी पत्नी कृष्णा, बेटा सुनिल सुकुन्तला, बेटी प्रयिंका, पोते लोकेश (4), शिवानी (2), और प्रति (6) महीना के मृत शरीर बेड पर पड़े मिले थे।
--बेटी सोनिया ने भी आत्महत्या करने की कोशिश की और सुसाइड नोट में ज्यादाद में से हिस्सा नहीं मिलने को वजह बताया।
--सोनिया ने साहरनपुर के युवक संजीव से शादी की थी जिससे उसके माता-पिता नाराज थे।
--1 जून 2004 को स्थानीय अदालत ने सोनिया और संजीव को उम्र कैद की सजा सुनाइ।
--15 फरवरी, 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने भी दोनों को मौत की सजा को बरकरार रखा।
--2007 में दया याचिका दाखिल की गई।

जफर अली (यूपी)
--उत्तर प्रदेश के जफर अली ने 2002 में अपनी पत्नी और पांच बेटियों की हत्या कर दी थी।
--5 अप्रैल 2004 को अदालत ने उन्हें मौत की सजा सुनाई।
--याचिका 2007 में लगाई गई। गृह मंत्रालय ने उनकी याचिका 3 नवम्बर 2011 को राष्ट्रपति कार्यालय में प्रेषित की।

सुंदर सिंह (उत्तराखंड)
--30 जून, 1989 को उत्तराखंड के सुंदर ने अपने भाई के परिवार के छह सदस्यों पर पेट्रोल छिड़ककर आग लगा दी थी। सब के सब मारे गए।
--2011 में याचिका भेजी दाखिल की गई।

सुरेश और रामजी (यूपी)
--वाराणसी के सुरेश और रामजी ने 1996 में जमीन विवाद को लेकर अपने छोटे भाई के परिवार के पांच सदस्यों की हत्या कर दी थी। इनकी याचिका 2004 में दाखिल हुई।
--24 फरवरी 2011 को केंद्रीय गृह मंत्रालय ने उनकी दया याचिका राष्ट्रपति के पास भेजी।

प्रवीन कुमार (कर्नाटक)

--23 फरवरी, 1994 को कर्नाटक के प्रवीन ने एक ही परिवार के चार लोगों की हत्या कर दी थी।
--2003 में सुप्रीम कोर्ट ने प्रवीण को मामले में दोषी पाया था। इनकी याचिका 2004 में दाखिल हुई।

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