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जब ये गर्भवती महिला उफ़नती नदी में कूद पड़ी..

Tue, 05 Aug 2014 05:15 PM IST
इमरान क़ुरैशी/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए
इमरान क़ुरैशी/बीबीसी हिंदी डॉटकॉम के लिए Updated Tue, 05 Aug 2014 05:15 PM IST
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pregnant women jumped in to the river

कोई मां अपने बच्चे के लिए क्या-क्या जतन कर सकती है, इसकी एक मिसाल कर्नाटक की एक युवती ने दी है। अपने बच्चे को अस्पताल में जन्म देने के लिए येलव्वा ने बाढ़ से उफ़नती कृष्णा नदी को तैरकर पार करने का जोख़िम मोल ले लिया।

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उन्हें अपने घर से चार किलोमीटर दूर सरकारी अस्पताल तक पहुंचने के लिए इतना बड़ा जोख़िम उठाना पड़ा। येलव्वा अपने परिवार वालों की मदद से इस जोख़िम को पार पाने में कामयाब रहीं, लेकिन उनकी इस कोशिश ने कर्नाटक राज्य की स्वास्थ्य सुविधाओं पर सवालिया निशान जरूर लगा दिया है।
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डर के आगे हुए जीत

pregnant women jumped in to the river

कर्नाटक के यादगीर ज़िले की 22 साल की येलव्वा किसी भी आम युवती जैसी हैं, लेकिन उन्होंने जो किया, उसके लिए अदभुत इच्छाशक्ति चाहिए। येलव्वा ने कृष्णा नदी के 12 से 14 फ़ीट ऊंचे और उफनते जल स्तर को पार किया है।

येलव्वा नौ महीने की गर्भवती थीं। मानसून में उफ़नती नदी में तैरने का जोखिम अनुभवी तैराक भी नहीं लेते। येलव्वा ने बीबीसी हिंदी को बताया, "मुझे डर तो लगा था, लेकिन मेरे बच्चे का सवाल था, इसलिए मैंने डर को किनारे कर नदी पार करने का फ़ैसला लिया।

"येलव्वा यादगीर के नीलकंठ आरायंगदा गांव की रहने वाली हैं। कर्नाटक की राजधानी बेंगलुरू को भारत की तकनीकी राजधानी कहा जाता है। लेकिन उन्नत प्रदेश में भी सरकारी अस्पताल उनके गांव से चार किलोमीटर की दूरी पर था। वो बच्चे को अस्पताल में जन्म देना चाहती थी।

तेज़ बहाव को किया पार

pregnant women jumped in to the river

केक्करा गांव के अस्पताल तक पहुंचने के लिए उन्हें कृष्णा नदी पार करना था। आम दिनों में लोग लकड़ी से बने बेड़े के जरिए नदी पार करते हैं। लेकिन जब नदी में बाढ़ आई हो तो कोई बेड़ा भी उपलब्ध नहीं होता।

केक्करा गांव के प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र की डॉ। वीना कहती हैं, "मैं यहां सात साल से हूं और मैंने किसी महिला को इस तरह नदी पार करते नहीं देखा, वो भी तब जब वो नौ महीने की गर्भवती हो।"

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ऐसे में येलव्वा ने यह कैसे किया?

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येलव्वा बताती हैं, "मेरा भाई आगे चल रहा था। मैं उसके बाद थी। उसने सूखे हुए कद्दू और बोतलों का मेरे चारों तरफ घेरा बनाया था, ताकि मैं तैर सकूं।"

येलव्वा के भाई लक्ष्मण ने बताया, "मैं रस्सी को संभाल हुए था। मेरे पिता येलव्वाके ठीक पीछे थे। रास्ता तो आधे किलोमीटर का ही थी, लेकिन इसे पार करने में एक घंटा लग गया है। नदी के बीचोंबीच धार तेज़ थी।"

पानी के तेज़ प्रभाव और बहाव के चलते येलव्वाको सफ़र तिरछे रास्ते के जरिए तय करना पड़ा। इसके चलते इन लोगों को आधे किलोमीटर दूरी के बदले एक किलोमीटर की दूरी तय करनी पड़ी।

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