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अंदर एक सिपाही है, जिसने ली अंगड़ाई है
प्रसून जोशी
Updated Wed, 14 Aug 2013 08:16 PM IST
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पता नहीं क्यों मुझे ऐसा महसूस हो रहा है कि अब स्वतंत्रतापूर्वक खुशियां मनाने का वक्त चला गया है। स्वतंत्रता दिवस को सेलिब्रेट जरूर करना है, लेकिन इतने सारे दशकों में भी क्या हमारे भीतर स्वतंत्रता की सही समझ विकसित हुई है?
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स्वतंत्रता का वास्तविक अर्थ यह है कि हम इसे समाज में परिलक्षित होते देखें। देखना होगा कि हम किन अर्थों में स्वतंत्र हैं और यह स्वतंत्रता हमें कितना जिम्मेदार नागरिक बना रही है? आज के राजनीतिक हालात बहुत चिंताजनक हैं। समाज में विषमता बढ़ती जा रही है। मुस्कराहटें गायब हो रही हैं।
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अगर कहीं मुस्कराते चेहरे दिख रहे हैं, तो उनके भीतर भी निराशा का भाव मौजूद है। शासन में आम आदमी की भागीदारी नहीं है। आम आदमी को अहसास करवाया जाता है कि उसका वोट तो महत्वपूर्ण है, लेकिन खुद उसका कोई अस्तित्व नहीं है।
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वोट डालनेवाले की सोच से सरकार को कोई लेना देना नहीं है। इस बात को वोट डालने वाला भी अच्छी तरह समझ गया है, इसी वजह से वह उदासीन भी हो चुका है। उसके मन में 'होई कोऊ नृप हमें का हानी' का भाव आ चुका है। यह भाव काफी निराशाजनक है। यह आत्मसमर्पण जैसी बात है।
दरअसल आम आदमी को कोई रास्ता नहीं दिख रहा है। वह थक चुका है और पस्त पड़ चुका है। लेकिन दृश्य में कुछ हलचल भी होती दिख रही है। यह हलचल धुंधलके में कुछ रोशनी की किरणों जैसी है। आम आदमी के बीच से ही कुछ जागृत लोग उठ खड़े हो रहे हैं।
अब इन्हीं लोगों से उम्मीदें हैं। कुछ लोग हैं, जिनके अंदर के सिपाहियों ने अंगड़ाइयां लेनी शुरू कर दी हैं। मुझे हाल ही में प्रकाश झा की फिल्म सत्याग्रह के लिए एक गाना लिखने का मौका मिला। सत्याग्रह में आज की सामाजिक स्थितियों का विश्वसनीय तरीके से खुलासा किया गया है। मैंने गाने में यही लिखा है -
अंदर एक सिपाही है
जिसने ली अंगड़ाई है
अब तक सोया-सोया था
सपनों में ही खोया था
बहुत हो गया है विश्राम
रघुपति राघव राजाराम...
सच कहूं तो मुझे देश के युवाओं से बहुत ज्यादा आशाएं हैं, लेकिन इन्हें राह दिखाने वाला चाहिए। आंदोलनों में युवाओं की बड़ी भागीदारी होनी चाहिए। उनमें एक ऐसी सामाजिक चेतना पैदा हो जानी चाहिए, जो बाद में राजनीतिक चेतना में परिवर्तित हो जाए।
इधर यह भी देखने में आ रहा है कि बहुत से युवा इन आंदोलनों का छद्म सुख उठा रहे हैं। उन्हें आंदोलनों के बारे में गहराई से मालूम नहीं है, लेकिन फेसबुक पर च्आइ लाइकज् लिखने में वे देर नहीं लगाते। आइ लाइक लिखने भर से आप किसी भी आंदोलन का हिस्सा नहीं हो सकते। इंटरनेट पर दो लाइनें लिखकर आप अपनी जिम्मेदारियों से छुटकारा नहीं पा सकते हैं।
मुझे अपने देश के बुद्धिजीवियों से बहुत शिकायतें हैं। ड्राइंग रूम में बैठकर सड़क की बात नहीं की जा सकती। ज्यादातर बुद्धिजीवी ड्राइंग रूम में बैठकर ही विश्लेषण करते हैं, क्यों कि उन्हें ग्रास रूट की कोई जानकारी नहीं होती है। आज बुद्धिजीवियों की एक बिरादरी बन चुकी है। यह बिरादरी नहीं बननी चाहिए। इस बिरादरी के पास आम आदमी की भाषा नहीं है।
जो बुद्धिजीवी आम आदमी के बीच से निकलता है, वही विश्वसनीय होता है और उसी को मान्यता भी मिलती है। मुझे अपनी फिल्म इंडस्ट्री से भी शिकायतें हैं। बॉलीवुड कहलाने वाली यह फिल्म इंडस्ट्री बड़ी भ्रामक हो चुकी है। लोग हैं कि बॉलीवुड की फिल्मों में संस्कृति तलाश कर रहे हैं और उसी को देश की संस्कृति समझने लगे हैं। इस पर मुझे सख्त एतराज है।
मुझे डर है कि बॉलीवुड हमारी संस्कृति को हाइजैक न कर ले। 'जो बिकता है, वही टिकता है' की सोच बहुत कुछ सोचने पर मजबूर करती है। यह बाजार की सोच है। सच तो यह है कि जो हम चाहेंगे, वही टिकेगा। लेकिन इसके लिए प्रयत्न करना होगा। हमें अपनी संस्कृति को नए सिरे से समझने की जरूरत है। हमें संघर्ष करना पड़ेगा। पलटकर वार करना पड़ेगा। झपटना पड़ेगा। अपना लहू गर्म रखना पड़ेगा। इकबाल का एक शेर है -
लपकना झपकना पलटकर झपटना
लहू गर्म रखने का बस है बहाना।
(प्रस्तुति: हरि मृदुल)