गंदगी गलियों में नहीं, हमारे दिमाग में है: प्रणब मुखर्जी
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने विभाजनकारी विचारों को दिमाग से हटाने पर जोर देते हुए कहा कि भारत की असल गंदगी गलियों में नहीं, बल्कि ‘हमारे दिमाग में और ‘उनके’ एवं ‘हमारे’, ‘पवित्र’ एवं ‘अपवित्र’ के बीच समाज को विभाजित करने वाले विचारों को दूर करने की अनिच्छा में है।’
मुखर्जी ने सोमवार को यहां साबरमती आश्रम में आयोजित एक समारोह में भारत के बारे में महात्मा गांधी की सोच का जिक्र करते हुए कहा कि उन्होंने एक समावेशी राष्ट्र की कल्पना की थी जहां देश का हर वर्ग समानता के साथ रहे और उसे समान अधिकार मिलें।
राष्ट्रपति ने कहा, हम हर दिन अपने चारों ओर अभूतपूर्व हिंसा होते देखते हैं। इसके मूल में अंधेरा, डर और अविश्वास है। जब हम इस फैलती हिंसा से निपटने के नए तरीके खोजें, तो हमें अहिंसा, संवाद और तर्क की शक्ति को नहीं भूलना चाहिए।
मानव होने का मूल एक-दूसरे पर हमारे भरोसे में है। राष्ट्रपति ने आश्रम में अभिलेखागार और अनुसंधान केंद्र का उद्घाटन करते हुए कहा कि गांधीजी ने अपने होठों पर राम के नाम के साथ हत्यारे की गोली लेकर हमें अहिंसा की एक ठोस सीख दी। उन्होंने भारत को एक ऐसे देश के रूप में देखा जो अपनी अतुल्य विविधिता और बहुलवाद के प्रति प्रतिबद्धता को लगातार मजबूत करे।
स्वच्छ भारत अभियान की तारीफ
उन्होंने कहा, जिन लोगों को अपनी आस्था पर भरोसा है, जो अपनी आस्था को लेकर सुरक्षित हैं और अपनी संस्कृति से जुड़े हैं, केवल वे ही एक खुले घर और खुले समाज में रह सकते हैं। यदि हम स्वयं को सिमटाए रखते हैं, अन्य प्रभावों से स्वयं को मुक्त रखना चाहते हैं, तो यह दर्शाता है कि हम एक ऐसे मकान में रहने के लिए तैयार हैं जहां ताजा हवा नहीं आ सकती।
मुखर्जी ने कहा, हमें स्वच्छ भारत अभियान का स्वागत करने के साथ ही इस सराहनीय अभियान को सफल बनाना चाहिए। लेकिन जोड़ा, जब तक सिर पर मैला ढोने की अमानवीय प्रथा है, तब तक हम असल स्वच्छ भारत प्राप्त नहीं कर सकते।
मुखर्जी ने कहा कि गांधी जी केवल ‘राष्ट्रपिता’ नहीं हैं बल्कि हमारे देश के निर्माता भी हैं। उन्होंने हमारे कार्यों को निर्देशित करने के लिए हमें नैतिक बल दिया, एक ऐसा तरीका जिससे हमें आंका जाता है। गांधी जी चाहते थे कि हमारे लोग खुले विचारों और कार्यों के साथ एकसाथ आगे बढ़ें और सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि वह यह नहीं चाहते थे कि उनके जीवन एवं संदेश को मात्र एक रस्म के तौर पर मनाया जाए।