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राष्ट्रपति ने माना, देश में चौतरफा निराशा का माहौल
नई दिल्ली/ब्यूरो
Updated Wed, 14 Aug 2013 09:36 PM IST
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राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी ने भी माना है कि आज पूरे देश में शासन व्यवस्था तथा संस्थाओं के कामकाज के प्रति चौतरफा निराशा और मोहभंग का वातावरण है।
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संसद व विधानसभाओं के आए दिन हंगामे से नाराज राष्ट्रपति ने कहा कि हमारी विधायिकाएं कानून बनाने वाले मंचों से ज्यादा लड़ाई का अखाड़ा दिखाई देती हैं। उन्होंने कहा कि भ्रष्टाचार एक बड़ी चुनौती बन चुका है।
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देश के 67वें स्वतंत्रता दिवस की पूर्व संध्या पर राष्ट्र के नाम संदेश में प्रणब दा ने संसद, न्यायपालिका से लेकर देश के राजनीतिक नेतृत्व को आईना दिखा दिया।
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उन्होंने कहा कि हमें ऐसी संसद चाहिए जिसमें वाद-विवाद हों, परिचर्चाएं हों और निर्णय लिए जाएं। ऐसी न्यायपालिका चाहिए जो बिना देरी किए न्याय दे। ऐसा नेतृत्व चाहिए जो देश के प्रति तथा उन मूल्यों के प्रति समर्पित हो, जिन्होंने हमें एक महान सभ्यता बनाया है।
राष्ट्रपति ने कहा कि हमें ऐसा राज्य चाहिए जो लोगों में यह विश्वास जगा सके कि वह मौजूदा चुनौतियों पर विजय पाने में सक्षम है। हमें ऐसे मीडिया तथा नागरिकों की जरूरत है जो अपने अधिकारों पर दावों की तरह ही अपने दायित्वों के प्रति भी समर्पित हों।
राष्ट्रपति ने कहा कि अकर्मण्यता और उदासीनता के चलते देश के बेशकीमती संसाधन बर्बाद हो रहे हैं। इससे समाज की खत्म हो रही ऊर्जा को रोकना होगा।
राष्ट्रपति के संबोधन में वह सभी बातें दिखीं जो कि आम आदमी सोचता रहा है। संभवत: यह पहला मौका होगा जब रायसीना हिल्स से सरकार के संवैधानिक मुखिया ने चौतरफा निराशा के माहौल की बात कही है।
प्रणब दा ने कहा कि लोकतंत्र का मतलब हर पांच साल में मत देने से कहीं ज्यादा है। लोकतंत्र का अस्तित्व जवाबदेही से ही बना रह सकता है न कि मनमानी से।
इसके बावजूद, हम बेलगाम व्यक्तिगत संपन्नता, असहिष्णुता, व्यवहार में उदंडता तथा प्राधिकारियों के प्रति असम्मान से अपनी कार्य संस्कृति को नष्ट होने दे रहे हैं।
सीमा पर जारी तनाव का जिक्र कर राष्ट्रपति ने पाकिस्तान को कड़ी चेतावनी भी दी। उन्होंने कहा कि हम शांति के प्रति वचनबद्ध हैं, लेकिन हमारे धैर्य की भी एक सीमा है।
माओवाद को उन्होंने आंतरिक सुरक्षा के लिए गंभीर चुनौती बताया। उत्तराखंड त्रासदी को प्रकृति की चेतावनी बताते हुए प्रणब दा ने कहा कि विकास दौड़ में इंसान और प्रकृति के बीच का संतुलन नहीं बिगड़ना चािहए। शिक्षा प्रणाली को लेकर भी राष्ट्रपति चिंतित दिखे।
उन्होंने कहा कि विश्व स्तर का विश्वविद्यालय बनाए बगैर हम विश्व शक्ति बनने की आकांक्षा नहीं पाल सकते। इतिहास गवाह है कि हम कभी तक्षशिला, नालंदा, विक्रमशिला, वल्लभी, सोमपुरा तथा ओदांतपुरी, जैसे प्राचीन विश्वविद्यालय दुनिया भर के सबसे मेधावी व्यक्तियों तथा विद्वानों के लिए आकर्षण का केंद्र थे।