प्रदीप शुक्ला पर मुकदमे की मंजूरी, चार्जशीट दायर
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पिछली सरकार में चिकित्सा व परिवार कल्याण विभाग के प्रमुख सचिव और एनआरएचएम के मिशन निदेशक रहे प्रदीप शुक्ला को सीबीआई ने दस मई को गिरफ्तार किया था। गिरफ्तारी के 90 दिन के भीतर चार्जशीट दाखिल न कर पाने के कारण कोर्ट ने गाजियाबाद की डासना जेल में बंद शुक्ला को 9 अगस्त को जमानत दे दी थी। सीबीआई चार्जशीट इसलिए नहीं दाखिल कर पा रही थी क्योंकि आईएएस प्रदीप शुक्ला के खिलाफ अभियोजन की स्वीकृति नहीं मिल पा रही थी।
इस बीच केंद्रीय कार्मिक एवं प्रशिक्षण विभाग के अंडर सेक्रेटरी अनुराग शर्मा ने 30 नवंबर को यह स्वीकृति दे दी। इसके बाद सीबीआई ने सोमवार को उत्तर प्रदेश विधायन एवं निर्माण सहकारी संघ लिमिटेड (पैकफेड) के एमडी वीके चौधरी, चीफ इंजीनियर एमएम त्रिपाठी, सुपरिटेंडिंग इंजीनियर अतुल कुमार श्रीवास्तव और सहायक इंजीनियर विपुल कुमार गुप्ता के खिलाफ चार्जशीट दाखिल कर दी। हाल ही में हाईकोर्ट और सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को इन आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल न कर पाने पर फटकार भी लगाई थी।
सीबीआई ने जांच में पाई थी अनियमितता
सीबीआई ने 19 जनवरी को जो मामला दर्ज किया था। उसमें एनआरएचएम की धनराशि से मनमाने ढंग से मुरादाबाद और गजरौला की तीन फर्मों को बगैर किसी मानक का पालन किए ठेका देने का आरोप लगाया था। जांच में यह आरोप सही पाए गए। सीबीआई ने पाया कि एनआरएचएम के पैसे से प्रदेश में 2372 उपकेंद्र, 30 जिला दवा भंडार और 21 सीएचसी और 89 जिला महिला और पुरुष चिकित्सालयों के उच्चीकरण करने का ठेका पैकफेड को दिया गया।
करीब 563.48 करोड़ के ठेके इस संस्था को दिए गए, वह भी बगैर किसी करार और टेंडर प्रक्रिया को अपनाए। इसके अलावा इस सहकारी संस्था को करीब सवा दो सौ करोड़ एडवांस में दे दिए गए। वहीं पैकफेड ने भी बगैर कोई टेंडर निकाले अपने नीचे के ठेकेदारों को काम बांट दिया। दिसंबर, 2009 तक पूरा होने वाला काम अप्रैल 2011 तक अधूरा था। सीबीआई की जांच में सामने आया है कि इसमें ओपीडी बनाने या उच्चीकरण की जगह माड्यूलर ऑपरेशन थियेटर बनाने का काम दे दिया गया।
यह काम यूपी प्रोजेक्ट कारपोरेशन के जरिए नई दिल्ली की मेसर्स सर्जिकॉन मेडीक्विप प्राइवेट लिमिटेड और गाजियाबाद की जीएनसी मेटल फार्मिंग को दिया गया। इसके अलावा मुरादाबाद और गजरौला के तीन ठेकेदारों को भी काम आवंटित किया गया। सीबीआई ने जांच में पाया है कि इसमें प्रति अस्पताल 25 लाख का घाटा हुआ और सरकार को करीब 5.89 करोड़ का नुकसान हुआ। इसमें न केवल एडवांस भुगतान किया गया बल्कि निर्माण पूरा हुए बगैर सारा भुगतान कर दिया गया। यह सारा काम बतौर एनआरएचएम मिशन निदेशक और प्रमुख सचिव चिकित्सा एवं परिवार कल्याण प्रदीप शुक्ला ने दिया था। वहीं पैकफेड के एमडी वीके चौधरी समेत बाकी अफसरों ने यह काम निजी फर्मों को दिया था।
कौन हैं प्रदीप शुक्ला
- आईएएस प्रदीप शुक्ला 1981 बैच के आईएएस टॉपर हैं। बसपा, सपा, कांग्रेस सभी सरकारों में उनका रसूख कायम रहा है। सभी सरकारों में वह ‘प्राइम पोस्टिंग’ पर रहे हैं।
- प्रदीप शुक्ला की पत्नी आराधना शुक्ला भी आईएएस हैं। उनके पांच करीबी रिश्तेदार आईएएस हैं। इनमें एक पीएमओ में तैनात है।
- प्रदीप शुक्ला का नाम एनआरएचएम घोटाले में सीबीआई की जांच में सामने आया। प्रदीप माया सरकार में प्रमुख सचिव स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण और एनआरएचएम के मिशन निदेशक थे।
- एनआरएचएम घोटाले में प्रदीप शुक्ला को दस मई को गिरफ्तार किया गया। उन्हें 90 दिन तक डासना जेल में काटने पड़े। इस दौरान उन्हें रीढ़ में ट्यूमर भी हो गया। जिसका उपचार चल रहा है।
सरकार ने बचाने को की थी हरसंभव कोशिश
- प्रदीप शुक्ला को बचाने की केंद्र और राज्य सरकारों ने हरसंभव कोशिश की थी। एकबारगी तो लगने लगा था कि सीबीआई भी रसूखदार आईएएस के प्रभाव में आ गई है लेकिन सुप्रीमकोर्ट और हाईकोर्ट की सख्ती के आगे सरकारों की मर्जी नहीं चल पाई।
- बसपा सरकार के भ्रष्टाचार के खिलाफ जनादेश लेकर आई मौजूदा सरकार ने प्रदीप शुक्ला की गिरफ्तारी के बाद भी उन्हें निलंबित नहीं किया। उधर, सीबीआई ने 90 दिन में चार्जशीट पेश नहीं की तो शुक्ला को जमानत मिल गई। शुक्ला ने पुराने ही पद पर ज्वाइनिंग तक दे दी।
- हाईकोर्ट की फटकार पड़ी तो जेल से बाहर आने के बाद सरकार को निलंबन आदेश जारी करना पड़ा और राजस्व मंडल में तैनाती दी। हाईकोर्ट को चेतावनी देनी पड़ी कि वह प्रदीप शुक्ला की याचिका को जनहित याचिका मानकर सुनवाई शुरू कर देगी।
- पूर्व में, केंद्रीय कार्मिक व प्रशिक्षण विभाग (डीओपीटी) ने भी सीबीआई को मुकदमा चलाने की मंजूरी नहीं दी। सीबीआई ने याद दिलाया, तब भी कोई असर नहीं। सीबीआई ने दूसरे मुकदमे में भी मंजूरी मांग ली।
- डीओपीटी ने राज्य सरकार से राय मांगी तो चिट्ठी यहां फाइलों में दब गई।
- हाल में सुप्रीमकोर्ट ने सीबीआई को तीखे शब्दों में कहा, टूजी मामले में अदालत ने साफ कहा हुआ है कि भ्रष्टाचार के मामलों में अभियोजन स्वीकृति की जरूरत नहीं है, आप बेवजह यूपी सरकार से मंजूरी की भीख मांग रहे हैं। इस फटकार के दो दिन बाद ही डीओपीटी ने राज्य सरकार की मंशा न होने के बावजूद मुकदमा चलाने की मंजूरी दे दी।