पुर्तगाली हुए मोदी के दीवाने और इतालवी राहुल के!
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चुनाव के मैदान में लड़ी जा रही जंग में एक तरफ नरेंद्र मोदी हैं और दूसरी तरफ राहुल गांधी। कांग्रेस सत्ता बचाने की कोशिश कर रही है और भाजपा दस साल के लंबे इंतजार के बाद एक बार फिर कुर्सी तक पहुंचने के ख्वाब सजा रही है। नतीजा 16 मई को आएगा।
लेकिन जंग अब तीखी हो चली है। शुरुआत में राहुल कुछ ढीले दिख रहे थे, लेकिन अब नरेंद्र मोदी को निशाने पर लेने के मामले में उनमें काफी आक्रामकता आ गई है। चुनावी रैलियों और विज्ञापनों के जरिए दोनों नेता किसी भी तरह एक-दूसरे को पछाड़ने की कोशिश कर रहे हैं। लेकिन दिलचस्प है कि इन दोनों की जंग अब देश की सीमा लांघकर पुर्तगाल और इटली तक पहुंच गई है।
नमो हुए पुर्तगाली, रागा हुए इतालवी
सुनने में भले अजीब लगे लेकिन इन दिनों पुर्तगाली नरेंद्र मोदी के बारे में बात करते नहीं थक रहे, जबकि इतालवी राहुल गांधी के बारे में चर्चा करने में दिलचस्पी दिखा रहे हैं।
मौजूदा लोकसभा चुनावों में जीत के जरिए सत्ता तक पहुंचने की कोशिश कर रहे इन दोनों नेताओं को सोशल मीडिया में विदेशी भाषाओं के जरिए भी बड़ी तादाद में प्रशंसक मिल रहे हैं। सोशल मीडिया एनालाइसिस प्लेटफॉर्म मेरुकी के मुताबिक अंग्रेजी के बाद पुर्तगाली ऐसी पसंदीदा भाषा है, जिसमें भाजपा के पीएम पद के दावेदार नरेंद्र मोदी (#Namo) के बारे में चर्चा हो रही है।
अंग्रेजी के बाद न्यूजफीड की तादाद
इसी तरह चौंकाने वाली बात यह है कि कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी (#RaGa) के बारे में चर्चा इंडोनेशियाई और इतालवी भाषाओं में चर्चा जा रही है, जबकि राहुल के पोस्ट आम तौर पर अंग्रेजी और हिंदी में होते हैं।
दूसरी तरफ नरेंद्र मोदी के ब्लॉग का अनुवाद आठ भारतीय भाषाओं के अलावा स्पेनिश, चीनी, जापानी और रूसी में भी किया जाता है। मेरुकी ने 1 मार्च से 17 अप्रैल के बीच सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म पर न्यूजफीड का विश्लेषण किया और पाया कि मोदी के मामले में 1.5 लाख फीड अंग्रेजी में थे और चार हजार के करीब पुर्तगाली में।
केजरीवाल अंग्रेजी के बाद हिंदी में मशहूर
इसके अलावा राहुल की 44,991 न्यूजफीड अंग्रेजी में थीं, जबकि 6,907 फीड इंडोनेशियाई भाषा में और 4,956 इतालवी में हैं। मेरुकी के को-फाउंडर ज्वलंत पटेल का कहना है कि केवल आम आदमी पार्टी के नेता अरविंद केजरीवाल के मामले में ऐसा है कि लोग उनके बारे में अंग्रेजी के बाद हिंदी में पढ़ रहे हैं।
सोशल मीडिया एक्सपर्ट 'आउटसोर्सिंग' की संभावना से इनकार नहीं कर रहे हैं। पिछले साल अशोक गहलोत, अजय माकन और दिग्विजय सिंह जैसे वरिष्ठ कांग्रेसी नेताओं की सोशल मीडिया की फोलोइंग में तुर्की, यूक्रेन, इंडोनेशिया और रूस जैसे मुल्कों का नाम था। ऐसा समझा जाता है कि उन्होंने फेसबुक, गूगल प्लस और ट्विटर जैसे सोशल मीडिया पेज को लोकप्रिय बनाने का काम आउटसोर्स किया था। हालांकि, तीनों इससे इनकार करते रहे।
आखिर क्या है इसके पीछे खेल?
वर्चुअल सोशल मीडिया कंपनी के सतीश आइजैक ने कहा, "नेताओं की अपनी डिजिटल मार्केटिंग टीम होती हैं, जो लाइक, रिट्वीट, फेवरेट और कमेंट में तब्दीली करने के लिए फर्जी एकाउंट का सहारा लोती हैं। इसकी वजह से हैशटैग ढाका, इंस्ताबुल, लिस्बन, जकार्ता और रोम जैसे मुल्कों में भी ट्रेडिंग में दिखाई देते हैं।"
आज सोशलबजस्टोर और सोशल टाइगर जैसे कई टूल हैं, जो लोग और समूह फेसबुक और ट्विटर पर अपने नंबर बढ़ाने के लिए इस्तेमाल करते हैं। इसके अलावा दुनिया भर में कई एजेंसी हैं, जो पैसों के बदले डमी एकाउंट के जरिए ऐसा कर सकती हैं।