{"_id":"ec9e32a0fb98a2989b4e8bd9da5cce68","slug":"popularity-and-acceptability-of-narendra-modi","type":"feature-story","status":"publish","title_hn":"मोदी लोकप्रिय तो हैं लेकिन स्वीकार्य कब होंगे","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
मोदी लोकप्रिय तो हैं लेकिन स्वीकार्य कब होंगे
Updated Thu, 01 May 2014 01:26 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
जहां देखों चारों तरफ मोदी के प्रचार की लहर दिख रही है। वो लोग भी लहर को महसूस कर रहे हैं जो मोदी के कट्टर विरोधी है। मीडिया ने तो मोदी को अगला प्रधानमंत्री तक मान लिया है। यहां तक कि पाकिस्तान भी मोदी की संभावित ताजपोशी से बौखलाकर बयान पर बयान दिए जा रहा है।
एक बेवसाइट में प्रभु चावला बताते हैं कि कल तक मोदी का विरोध करने वाले, उन्हें राक्षस करार देने वाले आज या तो उनके बगल में बैठे हैं या पीछे की कतार में मोदी के कंधे पर हाथ धरे फोटो खिंचवा रहे हैं। बड़े बड़े विरोधी नेताओं के भाषणों का 60 फीसदी मोदी पर फोकस हो रहा है।
खुद भाजपा में मोदी विरोधियों को जिस तरह दबाया या किनारे किया गया है, पूरे देश ने देखा है। बेशक मोदी ने 12 साल के गुजरात शासन में एक सफल और प्रभावशाली मुख्यमंत्री के तौर पर हर तरह की स्थिति का सामना किया है। उन 12 सालों में मोदी पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा और यह बात काबिलेतारीफ भी है।
विज्ञापन
विज्ञापन
एक बेवसाइट में प्रभु चावला बताते हैं कि कल तक मोदी का विरोध करने वाले, उन्हें राक्षस करार देने वाले आज या तो उनके बगल में बैठे हैं या पीछे की कतार में मोदी के कंधे पर हाथ धरे फोटो खिंचवा रहे हैं। बड़े बड़े विरोधी नेताओं के भाषणों का 60 फीसदी मोदी पर फोकस हो रहा है।
विज्ञापन
खुद भाजपा में मोदी विरोधियों को जिस तरह दबाया या किनारे किया गया है, पूरे देश ने देखा है। बेशक मोदी ने 12 साल के गुजरात शासन में एक सफल और प्रभावशाली मुख्यमंत्री के तौर पर हर तरह की स्थिति का सामना किया है। उन 12 सालों में मोदी पर भ्रष्टाचार का एक भी आरोप नहीं लगा और यह बात काबिलेतारीफ भी है।
विज्ञापन
राजनीति कभी इतनी रोचक नहीं थी
इतनी ज्यादा आबादी तक तुरफ फुरत अपनी बात पहुंचाना। प्रभावशाली वक्तव्य, इंस्टेंट डाटा बनाना, आरोपों को भी अपने प्रचार का हथियार बनाना, सच में राजनीति कभी इतनी रोचक और आसान नहीं थी। कहीं भी दस लोगों की बातचीत हो रही हो तो कम से कम सात लोग इस शर्त पर पैसा लगाने को तैयार हैं कि इस बार मोदी पीएम बनेंगे। खास बात ये है कि इनमें से अधिकतर मोदी के विरोधी हैं लेकिन उन्हें इस बात पर यकीन है कि इस बार मोदी ही पीएम बनेंगे क्योंकि जनता मोदी को चाह रही है।
एक व्यक्ति इसे मोदी लहर बोलता है तो दूसरा मोदी सुनामी बताता है। अधिकतर ओपिनियन पोल चुनावी पंडितों और राजनीतिक विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस मोदी कम से कम 225 और ज्यादा से ज्यादा 280 सीट जीत लेंगे। इन अनुमानों में कोई तर्क नहीं है लेकिन अनुमानों पर शर्तें लगाई जा रही है।
यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी तक भाजपा को केवल 183 सीटें दिला पाए थे। 1977 में जब पूरा उत्तर और पश्चिम प्रदेश कांग्रेस के खिलाफ था, जनता पार्टी भी ये कमाल नहीं कर पाई थी। 1989 में वीपी सिंह जिन्हें भाजपा और वाम दलों का पूरा समर्थन प्राप्त था, तक ये करिश्मा नहीं कर पाए।
एक व्यक्ति इसे मोदी लहर बोलता है तो दूसरा मोदी सुनामी बताता है। अधिकतर ओपिनियन पोल चुनावी पंडितों और राजनीतिक विशेषज्ञ बता रहे हैं कि इस मोदी कम से कम 225 और ज्यादा से ज्यादा 280 सीट जीत लेंगे। इन अनुमानों में कोई तर्क नहीं है लेकिन अनुमानों पर शर्तें लगाई जा रही है।
यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी तक भाजपा को केवल 183 सीटें दिला पाए थे। 1977 में जब पूरा उत्तर और पश्चिम प्रदेश कांग्रेस के खिलाफ था, जनता पार्टी भी ये कमाल नहीं कर पाई थी। 1989 में वीपी सिंह जिन्हें भाजपा और वाम दलों का पूरा समर्थन प्राप्त था, तक ये करिश्मा नहीं कर पाए।
लोकप्रिय तो हैं लेकिन स्वीकार्य नहीं
इस खेल को कुछ इस तरह देखा जाए कि एंटी इन्कमबैंसी फैक्टर मोदी लहर के लिए जिम्मेदार है। देश में कांग्रेस के प्रति बिगड़ा मूड मोदी लहर को सुनामी में तब्दील करता है। लेकिन सीटें जीतने का दावा और सीटें जीत लेने में बहुत फर्क है।
अगर मोदी भाजपा की सभी 400 सीटों पर भी चुनाव लड़ें तब भी असल मुद्दा लोकप्रियता और स्वीकार्यता का है। अगर लोकप्रिय होने के साथ साथ स्वीकार्य भी हैं तो मोदी की लहर देश की सभी सीटों पर दिखाई देगी और भाजपा को इसका फायदा होगा।
उत्तर और पश्चिम भारत में मोदी एक प्रीमियर ब्रांड की तरह पेश किए जा रहे हैं। यहां जाहिर तौर पर मोदी की स्वीकार्यता बढी है। लेकिन ऐसी कुल 50 सीटें हैं जहां लोकप्रिय मोदी स्वीकार किए जा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि इन चुनावों के बाद भाजपा सबसे बड़ी सिंगल पार्टी के तौर पर उभरेगी लेकिन असल मुद्दा ये है कि क्या भाजपा अपने दम पर सरकार बना पाएगी।
भाजपा इन चुनावों में केवल कांग्रेस के खाते की सीटों पर सेंध लगाने में कामयाब होगी। बड़े क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक से कुछ निकाल पाने में भाजपा अभी भी असमर्थ है। मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता और वामदलों के राज्यों और उत्तर पूर्वी राज्यों से सीटें खींचना भाजपा के बूते की बात नहीं। ऐसा तभी हो सकता है जब मोदी जाति, वर्ग और क्षेत्रीय हितों की दीवारें तोड़ने में कामयाब हो जाएं।
अगर मोदी भाजपा की सभी 400 सीटों पर भी चुनाव लड़ें तब भी असल मुद्दा लोकप्रियता और स्वीकार्यता का है। अगर लोकप्रिय होने के साथ साथ स्वीकार्य भी हैं तो मोदी की लहर देश की सभी सीटों पर दिखाई देगी और भाजपा को इसका फायदा होगा।
उत्तर और पश्चिम भारत में मोदी एक प्रीमियर ब्रांड की तरह पेश किए जा रहे हैं। यहां जाहिर तौर पर मोदी की स्वीकार्यता बढी है। लेकिन ऐसी कुल 50 सीटें हैं जहां लोकप्रिय मोदी स्वीकार किए जा रहे हैं। इसमें दो राय नहीं कि इन चुनावों के बाद भाजपा सबसे बड़ी सिंगल पार्टी के तौर पर उभरेगी लेकिन असल मुद्दा ये है कि क्या भाजपा अपने दम पर सरकार बना पाएगी।
भाजपा इन चुनावों में केवल कांग्रेस के खाते की सीटों पर सेंध लगाने में कामयाब होगी। बड़े क्षेत्रीय दलों के वोट बैंक से कुछ निकाल पाने में भाजपा अभी भी असमर्थ है। मायावती, ममता बनर्जी, जयललिता और वामदलों के राज्यों और उत्तर पूर्वी राज्यों से सीटें खींचना भाजपा के बूते की बात नहीं। ऐसा तभी हो सकता है जब मोदी जाति, वर्ग और क्षेत्रीय हितों की दीवारें तोड़ने में कामयाब हो जाएं।
किसकी सीटें छीन कर पीएम बनेंगे मोदी
250 सीटों पर भाजपा सीधे कांग्रेस से मुकाबला कर रही है। इन सीटों में 100 सीटें पहले से भाजपा के पास हैं और 150 पर कांग्रेस काबिज है। लोकसभा में 200 का आंकड़ा पार करने के लिए भाजपा के कांग्रेस के खाते से 100 सीटें छीननी होंगी। अगर मोदी की लहर देश में परंपरागत वोटिंग मानसिकता को पछाड़ दे तो मोदी 240 सीटें जीतने में कामयाब हो सकते हैं।
लेकिन यदि मोदी अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता और एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर को वोट में बदलने में फेल हो गए तो भाजपा इस बार बहुमत क्या पिछली बार के 180 सीटों के आंकड़े को भी नहीं छू पाएगी।
ये बात ध्यान रखनी होगी कि वाजपेयी की अपार लोकप्रियता के बावजूद 2004 में भाजपा मोदी फैक्टर के चलते काफी बुरी स्थिति में पहुंच गई थी। इस बार अगर मोदी जीतते हैं तो ये जीत उस हार की भरपाई होगी और खुदा न खास्ता अगर मोदी हारते हैं तो भाजपा का क्या होगा...आप अनुमान लगाते रहिए।
लेकिन यदि मोदी अपनी व्यक्तिगत लोकप्रियता और एंटी इन्कंबेंसी फैक्टर को वोट में बदलने में फेल हो गए तो भाजपा इस बार बहुमत क्या पिछली बार के 180 सीटों के आंकड़े को भी नहीं छू पाएगी।
ये बात ध्यान रखनी होगी कि वाजपेयी की अपार लोकप्रियता के बावजूद 2004 में भाजपा मोदी फैक्टर के चलते काफी बुरी स्थिति में पहुंच गई थी। इस बार अगर मोदी जीतते हैं तो ये जीत उस हार की भरपाई होगी और खुदा न खास्ता अगर मोदी हारते हैं तो भाजपा का क्या होगा...आप अनुमान लगाते रहिए।