पोंटी चड्ढा का हर दल में था दखल

अखिलेश वाजपेयी/लखनऊ Updated Sat, 17 Nov 2012 11:29 PM IST
ponty chadha was close to all parties
इसका कोई सबूत तो देना आसान नहीं है लेकिन परिस्थितियों को साक्ष्य मानें और उन पर ध्यान दें तो विगत ढाई दशक में पोंटी चड्ढा उत्तर प्रदेश में एक समानांतर सत्ता के केंद्र बन गए थे। जो काम कोई न करा पाए, वह काम उनके इशारे पर हो जाता था।

प्रदेश में सरकार चाहे कांग्रेस की रही हो या भाजपा की। मुलायम मुख्यमंत्री रहे हों या मायावती। पोंटी ने जो चाहा, वह किया। नीतियां ही नहीं बदलवाई बल्कि अधिकारियों को भी बदलवा दिया। खासतौर से माया व मुलायम के राज में तो वह खुलकर खेले।

पोंटी देखते-देखते उत्तर प्रदेश जैसे बड़े राज्य में सियासत और सत्ता के रिंग मास्टर बन गए। पोंटी का घोषित तौर पर देश में पांच से छह हजार करोड़ रुपये का कारोबार है जो अघोषित रूप से 50-60 हजार करोड़ रुपये का माना जाता है।

दल के भीतर भी बनवा दिए कई दल :-
पोंटी ने अपनी पहुंच के बल पर दल के भीतर भी कई दल बनवा दिए थे। कोई गुट अगर पोंटी के हितों को प्रभावित करता था तो दूसरा तुरंत उसके बचाव में खड़ा हो जाता था। इस सिलसिले में सिर्फ पिछले विधानसभा चुनाव के दौरान बाबूसिंह कुशवाहा की भाजपा में शामिल होने की घटना का उल्लेख ही काफी है।

जो भाजपा पोंटी और बसपा सरकार की साठगांठ से घोटालों को उजागर करने का अभियान छेड़े थी। बाबू सिंह कुशवाहा पर निशाना साध रही थी। उसी भाजपा में एक दिन अचानक कुशवाहा को एंट्री मिल गई। उस समय चर्चा में यह बात आई थी कि इसके पीछे भाजपा के एक बडे़ नेता की भूमिका है। जिनकी भाजपा के सत्ता में रहने के दौरान पोंटी से निकटता थी।

हर पार्टी की सरकार में चली:-
पोंटी अपने शुरुआती दिनों में कांग्रेस के नेताओं के बेहद करीबी रहे। 1989 में प्रदेश में मुलायम सरकार बनने के बाद भी सत्ता के गलियारों में उनका हस्तक्षेप चर्चा में रहा। शराब के सबसे बड़े कारोबारी का रुतबा हासिल किया। कुछ लोग उन्हें ‘लिकर किंग’ भी कहने लगे। मुलायम के बाद सूबे में भाजपा की सरकार में भी सत्ता में नीचे से ऊपर तक पहुंच व पकड़ के लिए पोंटी का नाम जाना गया।

सूत्रों की मानें तो उस समय सरकार में नीति व निर्णय के स्थिति में रहने वाले एक नेता की कृपा से उत्तराखंड में खनन का ठेका भी पोंटी को मिला था। इस ठेके में संबंधित नेता के पुत्र की हिस्सेदारी भी चर्चा में रही। इसके बाद की सरकारों में भी पोंटी का रुतबा बरकरार रहा। मुलायम की 2002-03 की सरकार में भी पोंटी पर सत्ता-प्रतिष्ठान की कृपा रही। उसी सरकार में पोंटी को मल्टीप्लेक्स सिनेमाघरों का लाइसेंस मिला।

माया के राज में खुलकर खेले:-
यूपी में पूर्ववर्ती मायावती सरकार में तो पोंटी करिश्माई तरीके से आगे बढ़े। सदन से लेकर सड़क तक माया सरकार पर पोंटी से साठगांठ व घोटाले के आरोप लगे। चीनी मिलों को बेचने पर बवाल हुआ। नोएडा की कीमती जमीनों को औनेपौने दाम पर पोंटी की कंपनियों या उनकी बेनामी कंपनियों को सौंप देने का आरोप लगा।

स्कूलों में बंटने वाले मिड-डे-मील और आंगनबाड़ी केंद्रों पर बांटी जाने वाली पंजीरी की आपूर्ति में घोटाले की तोहमत लगी। एनआरएचएम घोटाले के आरोपी तत्कालीन मंत्री बाबू सिंह कुशवाहा के करीबी माने जाने वाले पोंटी पर सरकार की मेहरबानी और नियमों की अनदेखी चर्चा में रही। नसीमुद्दीन सिद्दीकी ही नहीं खुद मायावती तक पोंटी की पहुंच भी कई बार मीडिया में सुर्खियां बनी। शराब कारोबार पर ‘माया टैक्स’ को लेकर भी वह चर्चा में रहे।

दूसरे राज्यों में दखल, संतुलन साधने में माहिर:-
पोंटी संतुलन साधने में भी माहिर थे। किसी की सरकार हो और कोई मुख्यमंत्री हो। उनके बीच भले ही छत्तीस का आंकड़ा हो। मगर पोंटी सभी के साथ गहरे रिश्ते बना लेते थे। सिर्फ उत्तर प्रदेश ही नहीं बल्कि पंजाब, उत्तराखंड, हरियाणा और राजस्थान के सियासी गलियारों तक उनकी पहुंच थी। पंजाब में सरकार चाहे कांग्रेस की हो या अकाली दल की, हरियाणा व राजस्थान में भी कोई पार्टी सरकार में हो, पोंटी ने मनचाहे फैसले कराए।

मौजूदा सपा सरकार भी रही मेहरबान:-
मायावती के करीब रहने को लेकर सपा के निशाने पर रहे पोंटी पर सत्ता में आने के बाद अखिलेश सरकार की मेहरबानी भी जमकर बरसी। सपा के सत्ता में आने के बाद पार्टी के बड़े नेता से पोंटी की मुलाकात भी चर्चा में रही। हालांकि इसकी पुष्टि नहीं हुई।

भोजन के अधिकार मामले में सर्वोच्च न्यायालय के कमिश्नरों के प्रमुख सलाहकार बिराज पटनायक का एक पत्र भी सपा सरकार की पोंटी पर मेहरबानी साबित करता है। पत्र में लिखा है कि यूपी में आईसीडीएस में भारी गड़बड़ी की गई है। पोंटी की ग्रेट वैल्यू फूड्स जैसी कंपनी को पूरक आहार के ठेके दिए गए। यह सर्वोच्च न्यायालय के निर्देशों का उल्लंघन है। इसके बावजूद कार्रवाई नहीं हुई।

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