सोशल मीडिया बना चुनावी अखाड़ा, सियासत चमकाने में भाजपा ने मारी बाजी
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सोशल मीडिया को चुनावी अखाड़ा बना चुके राजनीतिक दल यहां भी एक-दूसरे को कड़ी टक्कर दे रहे हैं। तमाम मुद्दों पर ऑनलाइन चर्चा कर खुद को दूसरी पार्टी से बेहतर साबित करने के लिए वे निरंतर प्रयास कर रहे हैं।
इसी दौड़ में पार्टियों के बीच फेसबुक पर लाइक्स पाने और फेसबुक यूजर्स की चर्चाओं में बने रहने की होड़ मची हुई है।
सोशल मीडिया पर सियासत चमकाने की इस दौड़ का ही नतीजा है कि फेसबुक पर भाजपा अब तक बाजी मारते हुए 31 लाख 55 हजार से अधिक लोगों की पसंद बन चुकी है। जबकि कांग्रेस को करीब 22 लाख 41 हजार लाइक मिल चुके हैं। वहीं आप पार्टी को अब तक 17 लाख 88 हजार से ज्यादा लाइक मिले हैं।
युवाओं को लुभाने के लिए भारी-भरकम खर्च
हालांकि फेसबुक पर लाइक्स के यह लुभावने आंकड़े कितने विश्वसनीय हैं, इस पर साइबर विशेषज्ञ सवाल खड़े कर रहे हैं। फेसबुक पेज के लाइक्स बढ़ाने के लिए बड़े पैमाने पर प्रत्याशी और पार्टियों के पैसा बहाने से इनकार भी नहीं किया जा रहा है।
यह कहा जा रहा है कि युवाओं पर असर डालने के लिए राजनीतिक पार्टियों को यह बेहतर हथियार लग रहा है। इसलिए राजनीतिक दलों के साइट्स पर भारी भरकम खर्च किया जा रहा है।
साइबर विशेषज्ञ पवन दुग्गल का कहना है कि सोशल नेटवर्किंग साइट पर होने वाले राजनीतिक हलचल का असर युवा वोटरों पर हो सकता है। खासतौर पर पहली दफा वोट डालने वाले युवाओं के निर्णय नेटवर्किंग साइट से प्रभावित हो सकते हैं। यही वजह है कि भारतीय राजनीति के इतिहास में पहली दफा तकनीक का इस्तेमाल बड़े पैमाने पर हो रहा है और राजनीतिक पार्टियां अपने वोट बैंक को पक्का करने के लिए नेटवर्किंग साइट का सहारा ले रही हैं।
लाइक्स बटोरने के लिए सांठगांठ
बताते चलें कि राजस्थान के पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलोत के फेसबुक लाइक्स में पिछले साल अप्रत्याशित वृद्धि पर सवाल उठ चुके हैं। भाजपा के पीएम उम्मीदवार नरेंद्र मोदी और कांग्रेस नेता शशि थरूर से आगे निकलते हुए गहलोत सोशल साइट पर अनायास लोकप्रियता बटोरने लगे थे।
लेकिन इस पर सवाल तब उठे जब यह मालूम हुआ कि उनके फेसबुक पेज पर सबसे ज्यादा लाइक्स टर्की के शहर इस्तांबुल के किसी आईटी फर्म से किए गए थे। इसलिए सोशल नेटवर्किंग साइट से किसी राजनीतिक पार्टी या फिर प्रत्याशी के सांठगांठ को इनकार नहीं किया जा रहा है।