राहुल की ताजपोशी पर अपने ही कर रहे विरोध
कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी की करीब दो महीने बाद हुई ‘घर वापसी’ के बाद उनकी ताजपोशी की चर्चा एक बार फिर से तेज हो गई है। कांग्रेस अध्यक्ष सोनिया गांधी की ढलती उम्र और खराब स्वास्थ्य के कारण राहुल की ताजपोशी में अब और देरी की संभावना भी नहीं है।
हालांकि, बड़ी सच्चाई यह है कि ताजपोशी के बाद पहले से ही नेतृत्व क्षमता न होने के आरोपों से जूझ रहे राहुल को पार्टी को पटरी पर लाने के लिए सोनिया से भी बड़ी चुनौतियों से जूझना होगा।
वर्ष 1998 में लोकसभा में महज 112 सीटें हासिल कर तब तक की सबसे बड़ी हार झेलने वाली कांग्रेस की गाड़ी को पटरी लाने लाने के लिए सोनिया के साथ तब दिग्गज क्षत्रपों की फौज के साथ 14 राज्यों की सरकारें थी।
इस समय जबकि कांग्रेस लोकसभा में 44 सीटों पर सिमट कर अपने अस्तित्व की लड़ाई लड़ रही है। तो प्रदेश की सियासत में भी उसके पांव काफी कमजोर हो चुके हैं और पूर्वोत्तर के कुछ एक छोटे प्रदेशों को छोड़ इस समय सियासी महत्व वाले महज 5 राज्यों में ही कांग्रेस की सरकार है।
इसके अलावा तब सोनिया के साथ इंदिरा-राजीव गांधी के दौर में तैयार कई दिग्गज और वफादार क्षत्रपों की टीम थी। जबकि अब यही बचे खुचे क्षत्रप और सोनिया के वफादार दिग्गज नेता राहुल की ताजपोशी के मामले में नाक भौं सिकोड़ते देखे जा रहे हैं।
सिर्फ 5 राज्यों में है कांग्रेस
राहुल के सामने मुश्किल यह भी है कि असम, कर्नाटक, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश और केरल को छोड़ कर अन्य किसी बड़े राज्य में कांग्रेस की सरकार नहीं है। जिन राज्यों में पार्टी का आधार बचा है, वहां पार्टी के नेता एक दूसरे को चित करने में लगे हुए हैं।
इसके अलावा कांग्रेस की कमजोर हालत तो देखते हुए जनता परिवार खुद ही अन्य दलों के साथ मिल कर भाजपा विरोधी राजनीति का सिरमौर बनने को बेताब है। इसलिए यह देखना दिलचस्प होगा कि ताजपोशी से पूर्व अपनी ही कमजोर छवि से जूझते राहुल पार्टी की नैया को किस तरह पार लगाएंगे।
कांग्रेस की देर सबेर कमान संभालने वाले राहुल गांधी के लिए फिलहाल मुश्किलों का कोई अंत नहीं दिखाई दे रहा। मुश्किलें पार्टी के अंदर और बाहर दोनों से है।
राहुल के सामने बड़ी चुनौती
एक तरफ पार्टी के दिग्गज नेता और सोनिया के वफादार हैं जिन्हें राहुल की ताजपोशी नहीं भा रही, तो दूसरी ओर भाजपा है जो निरंतर एक अभियान चला कर राहुल में नेतृत्व क्षमता न होने की बात प्रचारित कर रही है।
चूंकि इशारों इशारों में ऐसा कहने वालों में कांग्रेसी दिग्गज भी शामिल हैं और खुद राहुल मैदान में मोर्चा संभालने के बदले दूर से तमाशा देखने की छवि बना चुके हैं।
इसलिए भाजपा के अभियान को लगातार बल मिल रहा है। नेतृत्व की इच्छा जताने के बदले दूरी दिखाने के कारण ताजपोशी से पहले राहुल अपनी कोई टीम भी तैयार नहीं कर पाए हैं।
अब जबकि राहुल की ताजपोशी पर सोनिया के वफादार ही सवाल उठा रहे हैं, ऐसे में नई टीम तैयार करने के दौरान उपजे असंतोष से पार पाना एक बड़ी चुनौती होगी।
सोनिया के वफादारों से उम्र का लंबा फासला होने के कारण राहुल अपनी टीम में ऐसे दिग्गज नेताओं को फिट भी नहीं कर सकते।