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कुर्सी एक, नेता दस...बड़ी नाइंसाफी है!

Wed, 01 Jan 2014 04:56 PM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Wed, 01 Jan 2014 04:56 PM IST
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politicians to look out for in 2014

गले में मफलर और सिर पर टोपी, उनका पहनावा भले पारंपरिक नेताओं और फैशनपरस्तों को पसंद न आए, लेकिन वह दिग्गजों को धूल चटाने में कामयाब रहे हैं।

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भाजपा और कांग्रेस, दोनों के होश उड़ाने वाले केजरीवाल ने दिल्ली के सीएम की कुर्सी पर धमाकेदार शुरुआत की, लेकिन उनकी नजर राष्ट्रीय राजनीति पर है। उनका कहना है कि वह जादू की छड़ी नहीं रखते, लेकिन वह चमत्कार में यकीन रखते हैं।
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नरेंद्र मोदीः इतिहास कमजोर, सियासत नहीं!

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देश में नमो-नमो की धूम मची। भाजपा के पीएम पद के दावेदारों ने इतिहास के जानकारों को खूब मसरूफ रखा, लेकिन जो काम वो करना जानते हैं, करते रहे। विरोधियों पर तंज और कांग्रेस पर हमला।

आगामी लोकसभा चुनावों में उन्हें संभलकर कदम रखना होगा, क्योंकि अगर भाजपा का आंकड़ा 160 सीट या उससे कम रहता है, तो पार्टी के भीतर ही इस बात पर सवाल खड़ा हो जाएगा कि मोदी का जादू कहां गया?

राहुल गांधीः कंधों पर विरासत का भार!

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अगर कांग्रेस 2014 के चुनावों में चित होती है, तो क्या राहुल गांधी लंबी रेस का घोड़ा रखने वाला स्टैमिना दिखा पाएंगे? लेकिन इससे पहले उन्हें अपनी पार्टी को क्रैश लैंडिंग से बचाना है।

कांग्रेस के युवराज यह दिखा चुके हैं कि दाढ़ी से क्लीन शेव होने में ज्यादा वक्‍त नहीं लगाते, लेकिन क्या पार्टी को नाकामी के ढेर से उठाकर जीत की बुलंदी तक पहुंचाने का हुनर भी वो क्या इसी तेजी से दिखा पाएंगे?

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मुलायम सिंह यादवः फंस गए नेताजी!

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साल भर पहले तक उत्तर प्रदेश में होने वाले तमाम सर्वे में वह इस सूबे के राजा बताए जा रहे थे, लेकिन आज केवल राजनीतिक तालुकदार बनकर रह गए हैं और इसका श्रेय जाता है कि बेटे अखिलेश यादव की सरकार की चाल-ढाल को।

पहले वह कांग्रेस के काफी करीब थे, लेकिन आजकल काफी दूर दिखाई दे रहे हैं। पीएम बनने का ख्वाब सजाए हैं, लेकिन मुजफ्फरनगर दंगों के वक्‍त हालात संभालने में वह और उनके बेटे की सरकार बेहद औसत साबित हुई।

मायावतीः बहनजी इंतजार में हैं!

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बहुजन समाज पार्टी जब सरकार में नहीं होती, तो उससे जुड़ी ज्यादा खबरें भी नहीं मिलती। यह बसपा सुप्रीमो मायावती का खास स्टाइल रहा है और पार्टी कार्यकर्ता, काडर वोट, सभी इस बात को जानते हैं।

बहनजी और उनके समर्थकों को पूरा विश्वास है कि वह उत्तर प्रदेश और राष्ट्रीय राजनीति में एक बार फिर धमाकेदार वापसी करेंगी। भाजपा के लिए बुरी खबर यह है कि माया ने कांग्रेस से ज्यादा दूरी नहीं बनाई है।

ममता बनर्जीः दीदी का जलवा कायम!

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जब कांग्रेस हालिया विधानसभा चुनाव में धूल चांट रही थी, तो पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री और तृणमूल कांग्रेस प्रमुख ममता बनर्जी चाहकर भी अपनी हंसी नहीं रोक सकी।

कांग्रेस और पुरानी दुश्मन सीपीएम की हालत ने उन्हें मजबूती दी है और क्षेत्रीय गठबंधन में इससे उनका भाव बढ़ेगा। कार्टून भले उनके पक्ष में न जाते हों, लेकिन मुस्कुराहट अभी उन्हीं के साथ है।

जयललिताः पीएम पद की चाहत!

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जब एआईएडीएमके ने कहा कि वह अपनी नेता को प्रधानमंत्री की कुर्सी पर देखना चाहती है, तो ज्यादातर लोगों को इस बात पर हैरत नहीं हुई।

कांग्रेस और भाजपा, दोनों में से किसी दल के साथ हाथ मिलाने से इनकार करने वाली जयललिता लोकसभा चुनावों में 40 सीटों तक पहुंचने की फिराक में है। जयललिता की महत्वाकांक्षा की दाद देनी होगी।

प्रकाश करातः लाल सलाम बेहाल!

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सीपीएम के बॉस का कहना है कि उनकी नजर तीसरे मोर्चे पर ‌नहीं लगी है। लेकिन वह मुलायम सिंह यादव जैसे पुराने दोस्तों के साथ प्यार की पींगे बढ़ा रहे हैं और आम आदमी पार्टी की भी तारीफ कर रहे हैं।

वाम दलों के किलों में भी करात की वापसी मुश्किल लग रही है और उनके अपने कॉमरेड को इस बात पर हैरत है कि उन्हें इस बात अंदाजा है कि वह क्या करना चाहते हैं।

जगनमोहन रेड्डीः दोस्ती और दुश्मनी!

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महत्वाकांक्षा, बगावत, शोहरत, इन जनाब के पास ये सारी चीजें हैं। वाईएसआर कांग्रेस के नेता युनाइटेड आंध्र प्रदेश के चैम्पियन के रूप में अपना काफी कुछ दांव पर लगाए हैं।

वह यह संकेत दे चुके हैं कि भाजपा भी अछूत नहीं है, ऐसे में जगन को खोई सत्ता दोबारा पाने की चाह है। वह ऐसा कर पाते हैं या नहीं, यह देखना काफी दिलचस्प साबित होगा।

शरद पवारः मराठा पावर बाकी!

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मराठा पावर शरद पवार को कांग्रेस के आगामी चुनावों में फिसलने की आशंका पता लग गई है। वह कह रहे हैं कि इस वक्‍त सबसे ज्यादा मजबूत नेतृत्व की जरूरत है।

अपने भतीजे की बढ़ती उम्मीदों को काबू करना उन्होंने सीख लिया है। यह अंदाजा किसी को नहीं कि मजबूत नेता हैं कौन? अब उन्हें उम्मीद है कि लोकसभा चुनावों में नए मौके मिलेंगे।

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