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नेता मांगते हैं ज्यादा, पर खर्च करते हैं कम

Mon, 24 Feb 2014 12:00 PM IST
Updated Mon, 24 Feb 2014 12:00 PM IST
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politicians demand more, spend less

बीती लोकसभा की तुलना में इस लोकसभा में सांसद निधि खर्च करने के मामले में सांसदों की उदासीनता और बढ़ गई है। हालत यह है कि देश का हर सांसद औसतन 4 करोड़ रुपये की रकम पर कुंडली मारे बैठा है।

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उत्तर भारत के 7 राज्यों और एक केंद्र शासित प्रदेश में तो स्थिति कहीं ज्यादा बदतर है। इन राज्यों के सांसद औसतन 4.56 करोड़ की रकम खर्च नहीं कर पाए हैं।

वित्तीय वर्ष खत्म होने में बमुश्किल पांच हफ्ते बचे हैं। मगर अब भी सांसद निधि के रूप में 2172.88 करोड़ रुपये की बड़ी राशि खर्च होने का इंतजार कर रही है।

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सिर्फ 14 सांसद खर्च कर पाए अपना फंड

politicians demand more, spend less

निधि खर्च करने के प्रति उदासीनता का आलम यह है कि देश के 545 सांसदों में से महज 14 सांसद ही सौ फीसदी राशि खर्च कर पाए हैं। इनमें से एक भी सांसद उत्तर भारत का नहीं है। वर्ष 1993 में नरसिंह राव सरकार के कार्यकाल में लागू हुई सांसद निधि योजना राशि में लगातार बढ़ोतरी तो हुई, मगर खर्च के प्रति सांसदों की उदासीनता भी उसी तेजी से बढ़ी।

मसलन वर्ष 1993 से अब तक दोनो सदनों में इस मद का करीब 4209 करोड़ रुपये बीते 21 सालों में खर्च नहीं हुए। फिलहाल लोकसभा के सांसदों को 2658.96 करोड़ तो राज्यसभा के सांसदों को 1550.04 करोड़ रुपये खर्च करने हैं। दबाव के चलते बीते दिनों प्रत्येक सांसदों को इस निधि के तहत क्षेत्र के विकास के लिए हर साल पांच करोड़ रुपये दिए जाने का प्रावधान किया गया था।

राहुल गांधी भी नहीं खर्च कर पाए अपना फंड

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यूपी, हिमाचल प्रदेश, उत्तराखंड, जम्मू-कश्मीर, चंडीगढ़, दिल्ली, पंजाब और हरियाणा के 123 सांसद करीब 560 करोड़ रुपये की विकास की राशि पर कुंडली मार कर बैठे हैं।

अकेले यूपी के 80 सांसदों को करीब 353.33 करोड़ रुपये खर्च करने हैं। ये सांसद बीते साल भी करीब 63 करोड़ रुपये खर्च नहीं कर पाए थे। 14वीं लोकसभा में राहुल गांधी 1.58 करोड़, नीरज शेखर 1.87 करोड़ व शैलेंद्र कुमार 3.48 करोड़ खर्च नहीं कर पाए थे।

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इसलिए नहीं खर्च हो पाता है फंड?

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महज 14 सांसद ही खर्च कर पाए निधि की पूरी रकम

लोकसभा के 545 सांसदों में से आठ राज्यों के महज 14 सांसद ही सौ फीसदी राशि खर्च कर पाए। इनमें एमपी, महाराष्ट्र, कर्नाटक, राजस्थान के दो-दो, प.बंगाल के तीन व आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और झारखंड के एक सांसद शामिल हैं।

सवाल सांसदों की संवेदनहीनता का नहीं बल्कि खराब नौकरशाही का है। सांसदों के बार-बार अनुमोदन करने के बावजूद नौकरशाह फाइल पर कुंडली मार कर बैठ जाते हैं।
-रमाशंकर राजभर

व्यवस्था को दुरुस्त करने की दरकार है। होना यह चाहिए कि सांसदों के अनुमोदन के बाद फाइल न अटके। मगर होता इसका ठीक उल्टा है। यह पूरी योजना नौकरशाही के जाल में उलझ कर रह गई है।
-निखिल चौधरी
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