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'हमारी भी दुश्मनियां थी, पर बस इतना सा फर्क था...'

Mon, 22 Feb 2016 02:12 PM IST
Updated Mon, 22 Feb 2016 02:12 PM IST
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politicans do not enter in student movement

जेएनयू में जो हो रहा है वो कभी कराची यूनिवर्सिटी में भी होता था। मैं खुद अखिल भारतीय विद्यार्थी परिषद जैसी इस्लामी जमियते तौलबा का कट्टर समर्थक था और हाथ हिला-हिला कर कहता था कि पाकिस्तान की आख़िरी मंज़िल इस्लामी व्यवस्था है।

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ये मुसलमानों का देश है, हमारी अपनी संस्कृति है, इतिहास, परंपराएं और नियम हैं। हमें किसी और की तरफ देखने की कोई ज़रूरत नहीं। जिसने भी इस्लामिक विचारधारा से हटकर बात की हम मुंह तोड़ देंगे, इंकलाब मुर्दाबाद, इंकलाब, इंकलाब, इस्लामी इंकलाब, धर्मनिरपेक्षता, उदारतावाद नहीं चलेगा, नहीं चलेगा।
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और फिर हम अपने ही साथ पढ़ने वाले छात्रों को नास्तिक, कम्युनिस्ट, देशद्रोही और इस्लाम का दुश्मन समझकर उनकी पिटाई करते थे तो कभी वो हमें मार भगाते थे।

वक़्त गुज़रता गया और फिर असल ज़िंदगी शुरू हो गई, आज 30-35 वर्ष बाद ये हाल है कि उस ज़माने का अगर कोई नास्तिक, कम्युनिस्ट, देशद्रोही, इस्लाम दुश्मन पुराना साथी मिलता है तो हम एक-दूसरे से ऐसे गले मिलते हैं जैसे बिछड़े हुए सगे भाई हों।
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पुराने मुद्दों का जिक्र कर खूब होती है हंसी मजाक

politicans do not enter in student movement

घंटा आधा घंटा बाद सब कुछ भूल जाते हैं और 30-35 साल पहले की हरकतों पर ख़ूब हंसते हैं, तो मेरे प्यारे छात्रों एक-दूसरे से ख़ूब लड़ो, मुंह से झाग निकालो, गालम-गलौच भी ठीक है।

मगर ये बात समझ लो कि जब तुम तीन-चार वर्ष कैंपस में गुज़ारकर असल ज़िंदगी के जंगल में गुम हो जाओगे और अचानक किसी रेलवे स्टेशन, बस टर्मिनल, एयरपोर्ट, फुटपाथ, सेमिनार या किसी शादी-ब्याह में एक-दूसरे को देखोगे तो क्या तुम तब भी एक-दूसरे पर नारे लगाते हुए पिल पड़ोगे?

भारत माता की जय, देशद्रोही मुर्दाबाद, फासिज़्म की ललकार, नहीं चलेगी-नहीं चलेगी। लेकिन हम पुरानी पीढ़ी के छात्रों के पास एक सुविधा उपलब्ध थी जिससे तुम महरूम हो।

हमारे ज़माने में कैंपस की लड़ाई कैंपस तक ही रहती थी, किसी टीवी चैनल के हाथों हाईजैक नहीं होती थी। किसी विवादास्पद नेता को कैंपस की कीमत पर अपनी सियासत चमकाने की बिल्कुल इजाज़त नहीं होती थी। सरकार किसी की भी हो सभी छात्र अपनी-अपनी विचारधारा भूलकर सरकार की कैंपस में दख़लअंदाज़ी बर्दाश्त नहीं करते थे।

नेताओं की बातों से खुद को दूर रखें छात्र

politicans do not enter in student movement

हम जैसे भी थे, हमारी अपनी दुश्मनियां थी, अपनी दोस्तियां और अपनी समझ, इसलिए अग़र दुमछल्ला बनना है तो अपना दुमछल्ला बनो किसी और का नहीं। कड़े से कड़ा सवाल पूछो, जम के एक-दूसरे को ख़ारिज करो। लेकिन अपने मन से, किसी और के इशारे या एजेंडे पर नहीं...

कल जब तुम छात्र नहीं रहोगे तो क्या आज के व्यवहार के हिसाब से एक-दूसरे से आंख मिला पाओगे? ये सवाल किसी और से नहीं अपने से पूछो।

ताकि, कल तुम एक-दूसरे से दीवानों की तरह लिपटते हुए चीख सको, 'अबे हिन्दुत्ववादी तू कहां है,' 'अबे देशद्रोही सुना है आजकल तू बड़े देशभक्ति के भाषण देता फिर रहा है,' 'अबे तुझे याद है वो सरस्वती कितनी कटखुन्नी हुआ करती थी,' 'बकवास न कर वो अब तेरी भाभी है,' 'अरे ये कब हुआ,' 'चल चाय पीते हैं बताता हूं तुझे।'

(ये लेखक के निजी विचार हैं)

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