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दुष्कर्म के दागियों को हाथोंहाथ लेती हैं पार्टियां
लखनऊ/अखिलेश वाजपेयी
Updated Fri, 04 Jan 2013 01:06 PM IST
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दिल्ली गैंगरेप के बाद बसपा ने दुष्कर्म के आरोपियों को टिकट न देने की बात कहकर वाहवाही लूटने की कोशिश की है। कांग्रेस और भाजपा ने भी उनके प्रस्ताव पर सहमति जताई है। हालांकि अतीत बताता है कि दुष्कर्म, हत्या और अपहरण के आरोपियों को टिकट देने में ये दल कभी पीछे नहीं रहे हैं।
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पूर्व मुख्यमंत्री मायावती के अलावा दुष्कर्म के आरोपियों को टिकट नहीं देने का ऐलान भाजपा के प्रदेश अध्यक्ष डॉ. लक्ष्मीकांत वाजपेयी ने भी किया है। बसपा-भाजपा के बाद कांग्रेस ने भी इसे सही कदम बताया। सपा फिलहाल इस मसले पर चुप है।
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उत्तर प्रदेश विधान सभा में इस समय सपा के तीन व बसपा के एक विधायक पर दुराचार का आरोप है। दोनों पार्टियों ने इनको जब टिकट दिया था तब भी इन पर दुष्कर्म का आरोप था। ये जीत भी गए। इनके अलावा छह और दुष्कर्म के आरोपी भी चुनाव लड़े थे।
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पिछले विधानसभा चुनाव में सपा ने गुड्डू पंडित और मनोज पारस को टिकट दिया था। दोनों दुष्कर्म के अरोपी हैं और मनोज पारस प्रदेश सरकार में राज्यमंत्री भी हैं। यह उस सपा का हाल है, जो दिल्ली दुष्कर्म पर केंद्र सरकार को कठघरे में खड़ा कर रही है।
मायावती लोकसभा चुनाव में दुष्कर्म के किसी भी आरोपी को टिकट न देने का ऐलान कर रही हैं। लेकिन जब वह मुख्यमंत्री थीं तो उन्ही की सरकार में नरेनी बांदा से तत्कालीन विधायक पुरुषोत्तम द्विवेदी पर शीलू निषाद से बलात्कार का आरोप लगा। इस विधायक के संरक्षण और मजबूरी में विधायक की गिरफ्तारी की कहानी सभी को याद होगी। डिबाई से तत्कालीन बसपा विधायक भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित पर भी इसी तरह का आरोप लगा। बसपा सरकार उनके संरक्षण में जुटी रही।
बिलसी से तत्कालीन विधायक योगेन्द्र सागर, तत्कालीन ग्राम विकास मंत्री दद्दू प्रसाद पर भी बलात्कार के आरोप लगे तो पूरी सरकार इनके पक्ष में खड़ी नजर आई थी। पार्टी की गाड़ी पटरी से उतरने के डर से बाद में भले ऑपरेशन क्लीन चलाकर ऐसे आरोपियों के टिकट काटे गए, लेकिन शुरू में तो आरोपियों का जमकर बचाव किया गया।
केस-1: गुड्डू पंडित
भगवान शर्मा उर्फ गुड्डू पंडित डिबाई से बसपा के विधायक थे। उनपर बलात्कार का आरोप लगा। सपा ने उनकी गिरफ्तारी की मांग की और स्थानीय कार्यकर्ताओं ने बुलंदशहर व डिबाई में गुड्डू पंडित के खिलाफ आंदोलन किया। सदन में भी हंगामा हुआ। बुलंदशहर में प्रशासन को कार्रवाई के लिए ज्ञापन भी दियाग गया। ऑपरेशन क्लीन में बसपा ने जब गुड्डू पंडित को बाहर किया तो सपा ने उनके सारे गुनाह भूलकर उन्हें गले से लगा लिया। सपा ने गुड्डू को तो टिकट दिया ही, उसके भाई को भी अपने उम्मीदवार के रूप में उतार दिया।
केस-2: शाहनवाज राना
दुष्कर्म के आरोपी मुजफ्फरनगर के शाहनवाज राना पिछली बार बसपा से विधायक थे। उनकी गाड़ी में सवार भतीजों पर बीते साल दिल्ली की छात्राओं से दुराचार की कोशिश का आरोप लगा। बसपा सांसद कादिर राना के भतीजे शाहनवाज के बहाने सपा कई दिन तक बसपा सरकार के खिलाफ हमलावर रही थी। सपा कार्यकर्ताओं ने वहां एक दिन का बंद भी कराया था। खूब धरना-प्रदर्शन किया। मायावती ने उन्हें पार्टी से बाहर कर दिया, तो वे इस बार लोकदल से लड़े और हार गए। आखिर में सपा से संपर्क साधा। सपा ने सब कुछ भुलाकर उन्हें भी मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की मौजूदगी में पार्टी में शामिल कर लिया।
केस-3: अलीमखान
मायावती ने दुष्कर्म के आरोपी नेताओं और विधायकों के टिकट काट दिए। लेकिन पता नहीं क्यों, माया के ऑपरेशन क्लीन से अलीम खान बच गए। वह टिकट हासिल करने में कामयाब रहे। उन पर सर्कस की महिला कर्मचारियों से यौन शोषण करने का आरोप था। पुलिस ने सर्कस में बंधक बना कर रखी गई महिला कर्मचारियों को रिहा कराया था। अलीम खान को बसपा ने टिकट दिया और वह चुनाव भी जीत गए।
राजनीतिक दल मानें तब न
'जब तक राजनीतिक दलों में दागियों को राजनीति से अलग रखने की इच्छा नहीं पैदा होगी तब तक राजनीति और अपराध के रिश्ते खत्म नहीं होने वाले। इस सिलसिले में कोई कानून तो है नहीं। हालत यह है कि अभी जनप्रतिनिधित्व अधिनियम में दो साल से ऊपर की सजा पाए लोगों के ही चुनाव लड़ने पर रोक का प्रावधान है। चुनाव आयोग सरकारों से आग्रह कर चुका है कि आरोप पत्र को चुनाव लड़ने की अयोग्यता में शामिल कर दिया जाए। जिन पर आरोपपत्र दाखिल हो जाएं उनको चुनाव लड़ने की अनुमति न मिलें। लेकिन यह तभी होगा जब नेता चाहेंगे। नेता भला क्यों चाहेंगे और अगर चाह भी लें तो इस तरह के आरोपों में घिरे जीते हुए लोग कानून क्यों बनने देंगे?'
- केएल गुप्ता पूर्व पुलिस महानिदेशक यूपी