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'प्राइवेट कंपनियां बन गए हैं राजनीतिक दल'

Sun, 13 Apr 2014 08:34 AM IST
Updated Sun, 13 Apr 2014 08:34 AM IST
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"कांग्रेस माँ और बेटे की पार्टी है। समाजवादी पार्टी बाप, बेटे और बहू की, राष्ट्रीय जनता दल पति-पत्नी की और झारखण्ड मुक्ति मोर्चा बाप-बेटे की पार्टियां हैं।"

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ये थे भारतीय जनता पार्टी के प्रधानमंत्री पद के उमीदवार नरेंद्र मोदी के शब्द, जो उन्होंने झारखण्ड के पलामू शहर में आम जनता को हाल में सम्बोधित करते समय कहे थे।
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नरेंद्र मोदी का इशारा साफ़ तौर पर वंशवाद की राजनीति की तरफ़ था, जिसे वह आगे कोडरमा शहर में अपने एक भाषण में लोकतंत्र के लिए ग़लत मानते हुए कहते हैं, "वंशवाद की राजनीति का लोकतंत्र में कोई महत्त्व नहीं।"
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नरेंद्र मोदी के दोनों बयानों को नकारा नहीं जा सकता। वह चुनावी अभियान के शुरू में केवल गांधी परिवार को ही वंशवाद की सियासत के लिए आड़े हाथों लेते थे लेकिन अब 'लोकतंत्र के लिए हानिकारक' इस सियासत के लिए दूसरे राजनीतिक परिवारों को भी निशाना बना रहे हैं।

लेकिन एक तरफ़ मोदी वंशवाद की राजनीति को ख़त्म करने की बात करते हैं तो दूसरी तरफ़ ख़ुद उनकी पार्टी में यह परंपरा फल फूल रही है।

प्राइवेट लिमिटेड पार्टियां

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उदाहरण के तौर पर भाजपा के नेता यशवंत सिन्हा के बेटे जयंत पहली बार चुनाव लड़ रहे हैं और अपने पिता की सीट पर। मुंबई में प्रमोद महाजन की बेटी पूनम महाजन लोकसभा चुनाव के मैदान में पहली बार कूदी हैं। साहिब सिंह वर्मा के बेटे प्रवेश भी लोकसभा के चुनावी अखाड़े में उतरे हैं।

लिस्ट और भी लंबी है। भाजपा अध्यक्ष राजनाथ सिंह, छत्तीसगढ़ के मुख्यमंत्री रमन सिंह और हिमाचल प्रदेश के पूर्व मुख्यमंत्री प्रेम कुमार के धूमल के बेटे भी चुनावी अखाड़े में उतरे हैं। यह फ़ेहरिस्त और भी लम्बी है।

भारत में वंशवाद काफ़ी पुराना है। एक अंदाज़ के अनुसार स्वतंत्र भारत में अब तक वंशवाद की राजनीति करने वाले 57 परिवार हैं, जिनमें सब से पहला और सबसे पुराना नेहरू-गांधी खानदान है।

इनके इलावा परिवार के अन्य सदस्य जो किसी न किसी सूरत में राजनीति से जुड़े रहे, वह थे इंदिरा गांधी की चचेरी बहन उमा नेहरू, उनके बेटे अरुण नेहरू।जवाहर लाल नेहरू की पत्नी कमला नेहरू, मोतीलाल नेहरू की बेटी विजय लक्ष्मी पंडित और उनकी बेटी नयनतारा सहगल।

इनके इलावा शेख अब्दुल्ला की पत्नी बेगम अकबर सांसद रह चुकी हैं और उनके बेटे मुस्तफा कमाल अब्दुल्ला कश्मीर विधानसभा के सदस्य थे।

कांग्रेस के नेता शकील अहमद कहते हैं कि भाजपा दोहरी नीति रखती है। लेकिन भाजपा के नितिन गडकरी कहते हैं उनकी पार्टी में वंशवाद नहीं है, "कांग्रेस के गांधी परिवार की तरह अडवाणी परिवार, वाजपेयी परिवार भाजपा में नहीं है। भाजपा के नेताओं के बेटे-बेटियों को टिकट इसलिए दिए गए हैं क्यूंकि वह पार्टी में वर्षों से सक्रिय हैं।"

हर राज्य में है परिवारवाद

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सच तो यह है कि आज जिस राज्य या जिस पार्टी पर निगाह डालें वहां आपको ऐसे परिवार मिल जाएंगे। उत्तर प्रदेश में मुलायम सिंह यादव ने अपने बेटे अखिलेश यादव को आगे बढ़ा दिया।

कश्मीर में शेख अब्दुल्ला ने पहले फारूक अब्दुल्ला को अपनी पार्टी नेशनल कांफ्रेंस का अध्यक्ष बनाया और वो मुख्यमंत्री बने। बाद में जब वह केंद्र सरकार में आए तो पार्टी और राज्य में सत्ता की बागडोर अपने बेटे उमर अब्दुल्ला के हवाले कर दी।

ओडिशा में बीजू पटनायक ने नवीन पटनायक को आगे बढ़ाया। महाराष्ट्र में शिव सेना की स्थापना करने वाले बाल ठाकरे ने मरने से पहले अपने बेटे उद्धव ठाकरे के हवाले पार्टी की जिम्मेदारियां सौंप दीं। अब उद्धव ठाकरे के बेटे आदित्य ठाकरे पार्टी के उभरते हुए युवा नेता हैं।

दक्षिण भारत पर निगाह डालें तो तमिलनाडु में डीएमके के करुणानिधि ने अपने बेटे और परिवार के कई सदस्यों को मुख्य स्थान दिए चाहे वह पार्टी हो या सरकार।

बिहार में लालू यादव ने अपनी बेटी मीसा भारती को पार्टी में शामिल करके इस बार उन्हें चुनाव के मैदान में भी उतार दिया है, जबकि वह पहले ही अपनी पत्नी को मुख्यमंत्री बनवा चुके हैं।

वरिष्ठ महिला पत्रकार तवलीन सिंह अपने एक लेख में कहती हैं कि इन नेताओं ने अपनी पार्टियों को प्राइवेट लिमिटेड कंपनियों में बदल दिया है। पार्टियों पर इन परिवारों का शिकंजा इतना कसा हुआ है कि दूसरों को आगे बढ़ने का अवसर ही नहीं मिलता।

ज़रा सोचिए सोनिया गांधी और राहुल के बिना कांग्रेस पार्टी का वजूद बाक़ी रहेगा? नटवर सिंह अब सियासत से रिटायर हो चुके हैं लेकिन वंशवाद की राजनीति की अलम्बरदार इंदिरा गांधी के क़रीब थे। वह कहते हैं, "माँ-बेटा ही कांग्रेस पार्टी है।"

लेकिन नटवर सिंह कहते हैं गांधी परिवार की ही आलोचना करना ठीक नहीं, "केवल नेहरू गांधी परिवार को वंशवाद की सियासत के लिए ज़िम्मेदार मानना सही नहीं। यह कश्मीर से कन्याकुमारी तक सभी राज्यों और सभी पार्टियों में है।"

शुरूआत किसने की?

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उन परिवारों की संतानें क्या कहती हैं जो अपने राजनीतिक परिवार और पिता के बल पर सियासत में हैं।

मिलिंद देवड़ा दक्षिण मुंबई से सांसद हैं। क्या अगर उनके पूंजीपति पिता मुरली देवड़ा शक्तिशाली नहीं होते और मंत्री पद पर न होते तो उन्हें सियासत में प्रवेश मिलता? वह कहते हैं, "आप सियासत में जिस कारण से आएं। चुनाव में जीत और हार जनता के हाथ में होती है।"

हर आम चुनाव के समय ये सवाल उठाए जाते हैं कि भारत से वंशवाद की राजनीति का अंत कब होगा? क्योंकि आम तौर से इसे लोकतंत्र के विपरीत माना जाता है।

इन्दर मल्होत्रा एक ऐसे वरिष्ठ पत्रकार हैं जिन्होंने न केवल वंशवाद की सियासत का झंडा गाड़ने वाली इंदिरा गांधी पर किताब लिखी है बल्कि दक्षिण एशिया में वंशवाद की राजनीति पर भी उनकी किताबें प्रकाशित हुई हैं। उनका जवाब साफ़ है, "वंशवाद की राजनीति भारत से ख़त्म नहीं होगी।"

आम तौर पर लोग समझते हैं कि इसकी शुरुआत जवाहरलाल नेहरु ने अपनी बेटी इंदिरा गांधी को सियासत में उतार कर की थी। लेकिन इन्दर मल्होत्रा कहते हैं कि नेहरु ने इंदिरा को किसी बड़े ओहदे के लिए नहीं आगे बढाया। वह आज़ादी से पहले से अपने पिता के साथ काम करती थीं और बाद में उनका हाथ बंटाती थीं।

वह इंदिरा गांधी को वंशवाद की राजनीति की शुरुआत करने वाला मानते हैं, “इंदिरा ने संजय गांधी को आगे बढ़ा कर वंशवाद की राजनीति की बुनियाद रखी।”

लेकिन नेहरु-गांधी परिवार का दबदबा न केवल कांग्रेस पार्टी पर बल्कि देश की सियासत पर जवाहर लाल नेहरु के पिता मोती लाल नेहरु के समय से चला आ रहा है। यह आज भारत में राजनीतिक वंशवाद का सबसे पुराना उदाहरण है। कांग्रेस उसकी पुश्तैनी पार्टी की तरह है।

वंशवाद की राजनीति में कमी?

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लेकिन परिवार का समर्थन करने वाले यह तर्क देते हैं कि जिस कमज़ोरी के लिए परिवार की आलोचना की जाती है, वही इस परिवार की शक्ति है। मणिशंकर अय्यर इंदिरा गांधी के बेटे और पूर्व प्रधानमंत्री राजीव गांधी के क़रीबी साथियों में से एक थे।

वह कहते हैं, “राजीव जी के मरने के बाद अगर सोनिया पार्टी का नेतृत्व न करतीं तो पार्टी बिखर सकती थी। भारत के इतिहास में इस परिवार का काफ़ी योगदान है। इसने दो प्रधानमंत्रियों का बलिदान दिया। कांग्रेस पार्टी आज देश की सबसे बड़ी पार्टी है जो इस परिवार के कारण ही संभव हो पाया है।”

इन्दर मल्होत्रा भी वंशवाद की सियासत के पूरी तरह से ख़िलाफ़ नहीं हैं। वह कहते हैं कि हर मैदान में- चाहे वह फ़िल्मी दुनिया हो या डॉक्टर, किसान और पत्रकार का पेशा हो– भारतीय समाज में वंशवाद का सिलसिला पुराना है। इसे बुरा नहीं माना जाता और इसीलिए हर मैदान में एक पीढ़ी के बाद दूसरी पीढ़ी उसी मैदान में आ जाती है।

इन्दर मल्होत्रा कहते हैं कि भारत के बाहर भी इसकी परंपरा है। बांग्लादेश में शेख हसीना और पाकिस्तान में भुट्टो परिवार इसकी मिसालें हैं।

मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया

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यहाँ तक कि उनके अनुसार अमरीका जैसा लोकतंत्र भी इससे वंचित नहीं। बुश सीनियर के बाद बिल क्लिंटन राष्ट्रपति बने और उनके बाद बुश सीनियर के बेटे बुश जूनियर। अगर बिल क्लिंटन की पत्नी हिलेरी क्लिंटन बराक ओबामा को प्राइमरीज में हरा देतीं तो हो सकता था वह उनकी जगह राष्ट्रपति होतीं।

लेकिन जो वंशवाद की राजनीति के ख़िलाफ़ हैं और एक ही परिवार के शिकंजे में पार्टी को नहीं देखने के हक़ में हैं, वो कहते हैं कि इसका सब से बड़ा नुक़सान यह होता है कि पार्टी के अन्दर दूसरे योग्य लोगों को अवसर नहीं मिलते। कांग्रेस में एक से एक क़ाबिल नेता हुए हैं लेकिन पार्टी के बड़े ओहदों के लिए या प्रधानमंत्री पद के लिए उनका प्रोत्सान नहीं किया गया।

सोनिया गांधी ने 2004 चुनाव में जीत के बाद मनमोहन सिंह को प्रधानमंत्री बनाया। लेकिन उनके आलोचक कहते हैं कि मनमोहन सिंह के कंधे पर रख कर सोनिया गांधी बंदूक चलना चाहती हैं।

इन्दर मल्होत्रा ने अपनी पुस्तक पिछले चुनाव से पहले लिखी थी। तो क्या इस चुनाव में वंशवाद की राजनीति में कमी आई है? वह एक लम्बी सांस लेकर कहते है, "यह रिवाज और बढ़ा है। यह जारी रहेगा।”

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