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कुछ मुद्दों पर राजनीति नहीं होती भाई!

Thu, 06 Jun 2013 01:15 AM IST
कमलेश
कमलेश Updated Thu, 06 Jun 2013 01:15 AM IST
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political parties ignore their differences in self interest

सियासी बिसात पर वक्त और मुद्दा देखकर चाल बदलने की रीत पुरानी है और देश के राजनीतिक दल इसमें महारत रखते हैं।

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कांग्रेस हो, भाजपा हो या फिर कोई दूसरा राजनीतिक दल, सियासी रोटियां सेंकने का वक्त आता है, तो राष्ट्रीय महत्व के मुद्दे भी ठंडे बस्ते में डाल दिए जाते हैं और मकसद होता है सिर्फ विरोध करना।

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महंगाई के मुद्दे पर संसद नहीं चलने दी जाती, नक्सलवाद जैसे गंभीर मसले पर सत्ता पर काबिज कांग्रेस और विपक्ष में बैठी भाजपा सर्वदलीय बैठक का बहिष्कार तक कर जाते हैं।

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लेकिन कुछ बातें ऐसी हैं, जिस पर दुश्मन भी दोस्त हो जाते हैं। वक्त का तकाजा कह लीजिए या परस्पर हितों का सवाल, ऐसे मौके भी कम नहीं, जब हर राजनीतिक दल वैचारिक मतभेदों को भुलाकर गले मिलते दिखाई देते हैं। आखिर इसमें सभी का फायदा जो छिपा होता है।


हाल में आए कुछ फैसलों का विरोध करने के लिए भी ये दल एकसुर में गाने लगे थे। आइए गौर करें, ऐसे मुद्दों पर जहां राजनीतिक दल सारी पॉलिटिक्स भुलाकर साथ हो गएः


आरटीआई में आने पर गुस्साए नेताजी

right to informatonसीआईसी ने जैसे ही राजनीतिक दलों के आरटीआई के दायरे में आने का फैसला किया, तो कांग्रेस, भाजपा, माकपा, बसपा, भकापा, एनसीपी जैसे तमाम राजनीतिक दल इस फैसले पर बिफर पड़े।


आरटीआई के दायरे में आते ही राजनीतिक दलों को अपनी फंडिंग, खर्चे, सरकारी सुविधाओं और चुनावी खर्च का ब्यौरा भी देना पड़ता।


आरटीआई को अपनी अहम उपलब्धियों में गिनने और गिनाने वाली कांग्रेस ने भी यूटर्न मारा और इस कानून के दायरे में आने से मना कर दिया। कांग्रेस प्रवक्ता जर्नादन द्विवेदी ने कहा कि कांग्रेस इस फैसले का समर्थन नहीं करती।


भाजपा की ओर से भी नाखुशी जताते हुए वरिष्ठ नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि इससे मुश्किलें बढ़ेंगी और लोग चाय-पानी का हिसाब भी मांगने लगेंगे।


सीबीआई को स्वायत्ता देने से इंकार

हाल में कोयला घोटाले की रिपोर्ट सरकार से साझा करने पर सीबीआई को स्वायत्त बनाने के सुप्रीम कोर्ट के आदेश के बाद भी सरकार इस पर राजी नहीं हुई।


सुप्रीम कोर्ट ने कड़े शब्दों में कहा था कि सीबीआई पिंजड़े में बंद तोता है और वह अपने राजनीतिक आकाओं की भाषा बोलती है।


सीबीआई के दुरुपयोग और उसे स्वायत्त बनाने की मांग पहले भी उठती रही है, लेकिन कोई भी राजनीतिक दल इसका समर्थन नहीं करता। सरकार किसी भी पार्टी की रहे, सीबीआई का अपना फायदे के लिए इस्तेमाल होता रहा है।


इस बार भी अन्य दलों ने सीबीआई के स्वायत्त करने की मांग पर गंभीरता नहीं दिखाई।


लोकपाल कानून पर नहीं हुए एकमत

janlokpalदेश में भ्रष्टाचार के खिलाफ जनलोकपाल कानून लाने के लिए आंदोलन हुआ, समिति बनी, टीवी और संसद में बहस हुईं, लेकिन जनलोकपाल नहीं आया।


साल 2011 में जनलोकपाल के लिए अन्ना हजारे के नेतृत्व में आंदोलन हुआ। उनके अनशन के बाद सरकार ने इस पर विचार के लिए समिति बनाई। लेकिन तब भी कोई हल न निकल सका।


कई दलों ने मंच पर आकर इस कानून का समर्थन तो किया लेकिन जैसे ही लोकपाल बिल संसद में गया तो इस पर पार्टियों के मतभेद खत्म नहीं हुए। गतिरोध कायम रख बिल को मंजूरी नहीं दी गई। दलों में एकमत न होने पर भी एकता नजर आई।


अल्पसंख्यकों को लेकर, प्रधानमंत्री को लोकपाल के दायरे में लाने और राज्य स्तर पर लोकपाल कानून लागू होने पर राजनीतिक दलों के मतभेद अब तक जारी हैं।


चुनाव सुधारों के खिलाफ अड़े

लोकतंत्र की मजबूती और जनता का भरोसा बढ़ाने के लिए चुनाव सुधारों पर सरकार ने कितनी ही बार प्रतिबद्धता जताई है। अन्य राजनीतिक दल भी मंचों से इसका समर्थन करते दिखते हैं लेकिन पार्टियों की कार्यप्रणाली इसके ठीक उलट है।


चुनाव सुधार में गंभीर अपराधों में दोषियों को टिकट न देने, एक से ज्यादा सीट से चुनाव न लड़ने, पार्टियों के खर्चे की सीमा तय करने, हिसाब ना देने वाले उम्मीदवारों और पार्टियों के खिलाफ कार्रवाई करने जैसे सुधार प्रस्तावित हैं। यहां जमीनी हकीकत कुछ और है।


सभी दलों में कितने ही उम्मीदवार ऐसे हैं जो गंभीर अपराध में लिप्त हैं और सियासत में कितना पैसा बह रहा है, हम सभी जानते हैं।


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