फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   News Archives ›   India News Archives ›   political parties far from rti act

आरटीआई के खिलाफ राजनीतिक दलों में हुई 'दोस्ती'

Tue, 16 Jul 2013 12:37 AM IST
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र Updated Tue, 16 Jul 2013 12:37 AM IST
विज्ञापन
political parties far from rti act

सूचना का अधिकार कानून (आरटीआई) के दायरे में लाए जाने के खिलाफ सभी राजनीतिक दल एकजुट हैं और सरकार भी इनका साथ देने को तैयार बैठी है।

विज्ञापन


सोमवार को छह हफ्ते की समय सीमा बीत जाने के बावजूद एक भी राष्ट्रीय दल ने केंद्रीय सूचना आयोग (सीआईसी) के निर्देशों के अनुरूप सूचना अधिकारी की नियुक्ति नहीं की।
विज्ञापन


उधर, सरकार इस कानून में संशोधन के लिए तैयार है। सरकारी सूत्रों के मुताबिक सीआईसी के फैसले के बाद मचे सियासी घमासान के बीच ही प्रधानमंत्री मनमोहन सिंह ने कानून मंत्री कपिल सिब्बल को संशोधन संबंधी रास्ते का फार्मूला तैयार करने का निर्देश दिया था।
विज्ञापन
विज्ञापन


इस कड़ी में सिब्बल ने अटॉर्नी जनरल से बात कर रूपरेखा तैयार कर ली है। मगर सरकार में इस बात का फैसला नहीं हो पाया है कि संशोधन के लिए मानसून सत्र का इंतजार किया जाए या इससे पहले अध्यादेश का सहारा लिया जाए।

सभी राजनीतिक दलों और सरकार के गठजोड़ पर सीआईसी ने हाथ खड़े कर लिए हैं। मुख्य सूचना आयुक्त सत्यनारायण मिश्रा का कहना है कि सीआईसी तब तक कुछ नहीं कर सकती जब तक कि इस मामले में आधिकारिक शिकायत दर्ज न कराई जाए।

उधर, राजनीतिक दलों को आरटीआई के दायरे में लाने के लिए लंबी लड़ाई लड़ने वाले एसोसिएशन फॉर डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) के संयोजक अनिल बैरवाल ने कहा कि हमें दलों से ऐसे ही प्रतिक्रिया की उम्मीद थी।

मगर इसके बाद भी इस कानून के तहत जवाब देने के लिए दलों के पास आज से चार हफ्ते का समय है। यह समय बीत जाने के बाद एडीआर सभी जरूरी विकल्पों को आजमाएगी।

किसने क्या कहा
‘इस कानून को ध्यान से पढ़ें। इसमें अगर राजनीतिक दलों को शामिल करने की बात होती तो इसकी स्पष्ट व्याख्या भी होती। जब दलों को प्रत्यक्ष रूप से इसमें शामिल नहीं कर सकते तब इसके लिए परोक्ष रूप से ऐसा करना उचित नहीं है।’--मनीष तिवारी, सूचना एवं प्रसारण मंत्री

‘सीआईसी का आदेश गलत है। सरकार आरटीआई कानून में जरूरी संशोधन करेगी। इसके लिए अध्यादेश लाया जा सकता है या फिर मानसून सत्र का इंतजार किया जा सकता है।’--शांताराम नाइक, अध्यक्ष, विधि एवं न्याय मंत्रालय संबंधी संसद की स्थायी समिति

‘दलों ने हमारे निर्देश का पालन नहीं किया है। मगर हम खुद कोई कार्रवाई नहीं कर सकते। इसके लिए जब तक आयोग के सामने आधिकारिक शिकायत दर्ज नहीं की जाएगी, तब तक हम कुछ नहीं कर सकते।’--सत्यनारायण मिश्रा, मुख्य सूचना आयुक्त


‘हम चुनाव प्रक्रिया और राजनीति में पारदर्शिता के समर्थक हैं। मगर यह आदेश उचित नहीं है। पार्टियां हर सवाल का जवाब देने के लिए बाध्य नहीं हैं क्योंकि हम जन प्रतिनिधित्व कानून के तहत संसद के लिए जिम्मेदार हैं। अन्य सभी जरूरी जानकारी चुनाव आयोग को उपलब्ध कराते रहते हैं।’--निर्मला सीतारमण, प्रवक्ता भाजपा

‘हम सरकार के कदमों का इंतजार कर रहे हैं। पार्टी सरकार के समक्ष अपने विचार रखेगी।’--नीलोत्पल बसु, वरिष्ठ नेता माकपा

‘सीआईसी ने अपने अधिकारों की सीमा रेखा लांघी है। दल जरूरी सूचना चुनाव आयोग को देते ही हैं, ऐसे में इस व्यवस्था की जरूरत ही क्या है?’--डी राजा वरिष्ठ नेता, भाकपा

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed