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विदेशी कंपनियों से भी चंदा लेते हैं राजनीतिक दल

Tue, 04 Jun 2013 12:12 AM IST
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र
नई दिल्ली/हिमांशु मिश्र Updated Tue, 04 Jun 2013 12:12 AM IST
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political parties also take donations from foreign companies

राजनीतिक दलों को चंदा हासिल करने के लिए विदेशी कंपनियों से भी परहेज नहीं है। वह भी तब जब यह पूरी तरह से असंवैधानिक है।

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राजनीतिक दलों को सूचना का अधिकार (आरटीआई) के दायरे में लाने का पुरजोर विरोध करने वाली कांग्रेस और भाजपा ने तो वर्ष 1984 में भोपाल गैस त्रासदी के लिए जिम्मेदार कंपनी डाउ केमिकल्स से भी चंदा लेने से गुरेज नहीं किया।

इन दोनों ही दलों ने वर्ष 2003 से वर्ष 2011 के दौरान विदेशी कंपनियों से लगभग 30 करोड़ रुपये चंदे के रूप में स्वीकार किए।

फिलहाल यह मामला दिल्ली हाईकोर्ट के विचाराधीन है। इस मामले में एसोसिएशन ऑफ डेमोक्रेटिक रिफॉर्म्स (एडीआर) और भारत सरकार में सचिव रहे डॉ. ईएएस सरमा बीते तीन साल से अदालती लड़ाई लड़ रहे हैं।
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एडीआर के राष्ट्रीय संयोजक अनिल बैरवाल के मुताबिक दलों का विदेशी कंपनियों से चंदा लेना असंवैधानिक है। यह फेरा के साथ-साथ जनप्रतिधित्व कानून का भी सीधा-सीधा उल्लंघन है।
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इसके बावजूद वर्ष 2011 तक भाजपा और कांग्रेस ने छह विदेशी कंपनियों से क्रमश: 19,42,50,000 रुपये और 9,83,50,000 रुपये लिए।

जिन विदेशी कंपनियों से चंदा लिया गया उनमें डाउ केमिकल्स, वेदांत की मद्रास एल्युमिनियम कंपनी लि., सेसा गोवा लिमिटेड, स्टरलाइट इंडस्ट्रीज इंडिया, सोलाराइज होल्डिंग्स और हयात रिजेंसी शामिल हैं।

फिलहाल दिल्ली हाईकोर्ट ने इस संबंध में गृह मंत्रालय और चुनाव आयोग से जवाब तलब किया है। गृह मंत्रालय ने अपने जवाब में वाणिज्य मंत्रालय सहित संबंधित विभागों को जांच करने का आदेश दिया है।


एडीआर के ही संस्थापक सदस्य प्रो जगदीप छोंकर कहते हैं कि सारी समस्या पारदर्शिता की कमी के कारण पैदा हुई। पारदर्शिता में कमी के कारण पूरी राजनीतिक व्यवस्था बड़ी और विदेशी कंपनियों के इर्दगिर्द घूमने लगी।

ये कंपनियां चंदे के रूप में बड़ी राशि दे कर अपने पक्ष में नीतियां तैयार कराने लगीं। अब राजनीतिक दल और सांसद खुद को संविधान से ऊपर मानते हैं।

चूंकि चंदा बटोरने के मामले में सभी दल सही-गलत का ख्याल नहीं रखते, इसलिए सूचना मांगे जाने पर इन्हें परेशानी होती है।

यही कारण है कि विदेशी चंदा मामले में भी सरकार की ओर से सार्थक कदम नहीं उठाया जा रहा।

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