मोदी सरकार के हिंदी प्रेम पर आया राजनीतिक उबाल
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
मोदी सरकार का सरकारी विभागों और सोशल साइट्स पर सरकारी कामकाज में हिंदी को बढ़ावा देने के निर्देश पर राजनीतिक घमासान छिड़ गया है।
सरकार के इस आदेश के खिलाफ जहां तमिलनाडु के सभी दल एक हो गए हैं, वहीं जम्मू-कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने भी इस आदेश पर ऐतराज जताया है।
डीएमके के मुखिया एम. करुणानिधि के इस आदेश के खिलाफ खड़ा होने के एक दिन बाद ही राज्य की मुख्यमंत्री जयललिता ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को पत्र लिख कर इस आदेश को वापस लेने की मांग की है। खास बात यह है कि विरोध करने वालों में राजग में शामिल दल पीएमके और एमडीएमके भी शामिल हो गए हैं।
उमर अब्दुल्ला ने किया विरोध
इसके अलावा जहां जम्मू कश्मीर के मुख्यमंत्री उमर अब्दुल्ला ने इस फैसले का सार्वजनिक विरोध किया है, वहीं कांग्रेस ने महज हिंदी को आगे बढ़ाने पर गैर हिंदीभाषी राज्यों में नफरत का माहौल खड़ा होने की आशंका जताते हुए केंद्र सरकार को सावधानी बरतने की नसीहत दी है।
इस मामले में सियासी बवंडर खड़ा होने के बाद प्रधानमंत्री कार्यालय ने सफाई देते हुए कहा है कि राजभाषा विभाग की ओर से इस आशय का जारी किया गया सर्कुलर हिंदी भाषी राज्यों के लिए है।
पीएमओ ने कहा है कि यह सर्कुलर हिंदी भाषी राज्यों में सरकार की योजनाओं और नीतियों को बेहतर ढंग से पहुंचाने केलिए जारी किया गया था, जिसका गैर हिंदी भाषी राज्यों से कोई लेना-देना नहीं है।
उल्लेखनीय है कि यह विवाद तब खड़ा हुआ जब राजभाषा विभाग ने बीते 10 जून को सर्कुलर जारी कर मंत्रालयों, विभागों सहित अन्य निकायों को कामकाज हिंदी और अंग्रेजी दोनों का प्रयोग करने के साथ ही हिंदी को पहली प्राथमिकता देने का आदेश जारी किया। इस बीच पूर्व वित्त मंत्री और कांग्रेस के वरिष्ठ नेता पी. चिदंबरम् ने भी सरकार के हिंदी प्रेम से गैर हिंदी भाषी राज्यों में बदले की प्रवृत्ति पैदा होने की आशंका जाहिर की है।
पीएमओ की सफाई
पीएमओ ने देर शाम सफाई में कहा कि राजभाषा विभाग का यह सर्कुलर हिंदीभाषी राज्यों के लिए था न कि गैर हिंदीभाषी राज्यों के लिए।
सरकार ने अपनी नीतियों और कार्यक्रमों को हिंदीभाषी राज्यों में बेहतर ढंग से पहुंचाने के लिए हिंदी के इस्तेमाल का निर्देश दिया था। इसका अंग्रेजी विरोधी या गैर हिंदीभाषी लोगों पर हिंदी को थोपने संबंधी आरोपों से कोई लेना देना नहीं है।
भाजपा नेता मुख्तार अब्बास नकवी ने कहा कि सरकार को अंग्रेजी से नफरत नहीं है। दरअसल सरकार हिंदी के साथ अरसे से जारी भेदभाव को खत्म करना चाहती है। विरोध करने वालों को देखना होगा कि राष्ट्रभाषा हिंदी महज औपचारिकता बन कर रह गई है।