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क्या लालू ने अपने पाप धो लिए हैं?

Mon, 09 Nov 2015 12:35 PM IST
अवनीश पाठक/अमर उजाला, नई दिल्ली
अवनीश पाठक/अमर उजाला, नई दिल्ली Updated Mon, 09 Nov 2015 12:35 PM IST
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political future of lalu prasad yadav

बिहार के नतीजों के बाद संभवतः लालू प्रसाद यादव के राजनीतिक जीवन का आंकलन दोबारा किया जाए। आपातकाल और मंडल की राजनीति से उभरे लालू अपनी पत्नी राबड़ी देवी के जरिए रिमोट से सरकार चलाकर और चारा घोटाले में सजायाफ्ता होने के बाद भारतीय राजनीति में 'अवांछनीय' के रूप में कुख्यात हो चुके हैं। एक ऐसा चेहरा, जिनके साथ उन्हीं के सहयोगी मंच साझा नहीं करते।

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अंग्रेजी की एक कहावत है 'Take the bull by the horns'। लोकसभा चुनावों के बाद राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भारतीय जनता पार्टी ने लव जेहाद, घर वापसी और गोकसी के इर्दगिर्द जैसा तानाबाना बुना, वह बिलकुल वैसा ही है जैसा '90 के दशक आरंभ में राम मंदिर आंदोलन के इर्दगिर्द बुना गया था। लालू यादव ने उस समय भाजपा के पितृपुरुष लालकृष्‍ण आडवाणी की रथयात्रा बिहार में रोक दिया, और उन्हें गिरफ्तार किया। सांप्रदायिक ध्रुवीकरण के 'साँड़' को इस बार भी उन्होंने सामने आकर 'स‌ींग' से ही पकड़ा।
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दिल्ली के करीब ‌बिसाड़ा में गोमांस रखने के शक में जब 52 वर्षीय मुसलमान अखलाक की हत्या हुई, तब लालू ने निडर होकर कहा कि गोमांस के मु्द्दे पर सांप्रदायिक ध्रुवीकरण का प्रयास किया जा रहा है। चुनावी समीकरणों को संतुलित किए बगैर वे ये कहने से नहीं चूके कि हिंदू भी बीफ खाते हैं। लालू यादव ने उस समय कहा, 'बीफ जो खाता है खाता है, हिंदुओं में नहीं खाता है क्या बीफ? जो बाहर जा रहा है बीफ खा रहा है कि नहीं, हिंदुस्तान में भी तो बीफ खा रहा है।'
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बीफ के जरिए भाजपा ने लालू को घेरने की कोशिश की, उन्हें 'हिंदू विरोधी' बताया गया। भाजपा की बिहार इकाई के नेता सुशील कुमार मोदी ने उस समय कहा कि भाजपा सत्ता में आई तो गोहत्या पर प्रतिबंध लगा दिया जाएगा, हालांकि नीतीश कुमार ने उस समय तमाम कागजात सामने रखे और दावा किया कि बिहार में गोहत्या प्रतिबंधित है। लालू ने सांप्रदायिकता के खिलाफ मोर्चा खोला और एक बार फिर समर्थकों का एक ऐसा हिस्सा तैयार किया, जो मुल्क में बढ़ रही असहिष्‍णुता से बेचैन थे।

चारा घोटाले के अपराध में सजायाफ्ता होने से पहले तक लालू की राजनीति परिवार तक स‌िमट चुकी थी। 1997 में भ्रष्टाचार के आरोपों से घिरने के बाद उन्होंने जनता दल के दो हिस्से कर दिए, अपनी पत्नी राबड़ी देवी को बिहार का मुख्यमंत्री बना दिया। भारतीय राजनीति में परिवारवाद का ऐसा उदाहरण पहली बार देखा गया, राजन‌ीतिक के ककहरे से लगभग अन‌भिज्ञ और राजकाज को न के बराबर समझने वाली राबड़ी देवी को उन्होंने सूबे की कमान सौंप दी।

लालू का न‌िर्णय राजनीतिक तौर पर कितना गलत था, उस ऐसे समझा जा सकता है कि उस दौर को आज भी 'जं‌गलराज' का नाम देकर आम आदमी को खौफजदा किया जाता है। लालू के पुराने सहयोगी उन्हीं के गुरु जयप्रकाश नारायण से नीतीश कुमार और शरद यादव ने उस 'जंगलराज' के खात्मे के लिए ही भाजपा से हाथ मिलाया। चारे घोटाले में सजा पाने के बाद लालू जब जेल से बाहर आए तो राष्ट्रीय जनता दल को दोबारा खड़ा करने के लिए उन्होंने नए किस्म की राजनीति शुरु की। संगठन और गठबंधन उनकी नई राजनीति का आधारस्तंभ था। ये लालू की राजन‌ीति की दूसरी पारी ‌थी, वे एक ऐसे नेता थे, जो सजायाफ्ता था और चुनाव नहीं लड़ सकता था।

सांप्रद‌‌ायिकता के विरोध की राजनीतिक को उन्होंने मुखर होकर आगे बढ़ाया। लोकसभा चुनावों में मोदी लहर में धराशायी हो जाने के बाद वे अपने पुराने प्रतिद्वंद्वी नीतीश कुमार की दोस्ती हाथ बढ़ाने से नहीं हिचके। उन्होंने विधानसभा चुनावों में खुलकर नीतीश का साथ दिया। कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी लालू के साथ दिखने से बचते रहे, लेकिन वे कांग्रेस को साथ लेने से नहीं से चूके। लालू और नीतीश के साझा श्रम की बदौलत महागठबंधन ने 179 सीटें जीतीं। लालू की पार्टी राजद सर्वाधिक 80 सीट जीतकर विधानसभा में एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी बनी। कांग्रेस ने अर्से बाद बिहार विधानसभा दहाई का आंकड़ा छुआ। लालू ध्रुवीकरण की राजनीति को विफल करने में कामयाब रहे।


हालांकि ये राजनीतिक साझेदारी बिहार तक ही सीमित रहेगी या राष्‍ट्रीय स्तर पर भी लालू सांप्रद‌ायिकता विरोध की धुरी बन पांएगे, ये सवाल अब भी बचा है। राहुल गांधी और अन्य दलों के नेता लालू यादव को स्वीकार कर पाएंगे, ये देखना होगा। देखना ये भी होगा कि जिन पापों ने लालू को अवांछनीय बना दिया थे, वे धुल गए या नहीं? सांप्रदायिकता को हराकर उन्होंने जो राजनीतिक पुण्य कमाया है, वह राष्ट्रीय राजनीति में उन्‍हें स्वीकारयोग्य बना पाया या नहीं?

परिवार लालू की प्राथमिकताओं की फेहरिस्त अब भी अव्वल है, इसलिए संशय की पौध अब भी हरी है कि अगर लालू पुराने ढर्रे पर लौटे तो ‌बिहार का क्या होगा?

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