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किस 'सवर्ण युग' को खोज रहे हैं नरेंद्र मोदी?

Wed, 30 Oct 2013 03:00 PM IST
राजेश जोशी/बीबीसी संवाददाता
राजेश जोशी/बीबीसी संवाददाता Updated Wed, 30 Oct 2013 03:00 PM IST
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political analysis of modi speech

स्वर्ण और सवर्ण हिंदी के दो ऐसे शब्द हैं जिन्हें बोलने और लिखने में कोई ज्यादा फर्क नहीं है। कई बार कई लोग इन दोनों शब्दों को अनजाने में या फिर जानबूझ कर एक दूसरे के पर्याय के तौर पर इस्तेमाल करते हैं।

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रविवार को पटना के गाँधी मैदान में भारतीय जनता पार्टी की हुंकार रैली के दौरान नरेंद्र मोदी ने बिहार में चाणक्य के स्वर्ण युग को वापस लाने का ऐलान किया।
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लेकिन जो शब्द उन्होंने प्रयोग किया वो था – “सवर्ण युग”। बहुत लोगों का ध्यान इस उच्चारण और उसके निहितार्थ पर नहीं गया।

पर क्या ये सिर्फ गलत उच्चारण का मामला था या फिर मोदी पिछड़े और मुसलमानों के साथ साथ भारतीय जनता पार्टी के अगड़े वोटरों को भी पुचकार रहे थे?

बरसों तक लालू प्रसाद यादव को सत्ता में बनाए रखने वाले यादव-मुसलमान एकजुट पर मोदी की नज़र थी इसीलिए उन्होंने पहले  मुसलमानों की ओर हाथ बढ़ाया और कहा कि बिहार के मुसलमान इतने गरीब हैं कि हज करने के लिए भी नहीं जा पाते।
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लेकिन गुजरात में दो मुस्लिम बहुल जिले सबसे ज्यादा विकसित हैं।

फिर उन्होंने सीधे यादवों को संबोधित किया जो लालू प्रसाद यादव के जेल जाने के बाद नेतृत्व के संकट से गुज़र रहे हैं। मोदी ने “यदुवंशियों” का हित सुरक्षित रखने का भरोसा दिलाया।

कठिन डगर
पर उन्हें इस बात का एहसास था कि मुसलमानों और यादवों की ओर हाथ बढ़ाने से भारतीय जनता पार्टी के अगड़े वोट बैंक पर कहीं गलत असर न पड़े। इसलिए उन्होंने प्राचीन भारत के ब्राह्मण कूटनीतिज्ञ चाणक्य का सहारा लिया।

मोदी ने कहा, “मित्रों यही धरती है जिस धरती पर चाणक्य पैदा हुए थे और वो कालखंड हिंदुस्तान का स्वर्णिम कालखंड था। चाणक्य का मंत्र था सबको जोड़ो।”

उन्होंने फिर विश्लेषण किया कि चाणक्य का काल इसलिए स्वर्णिम काल था क्योंकि तब “हिंदुस्तान का मानचित्र सबसे फैला हुआ था”।

पर मोदी के मुताबिक़ “फिर काँग्रेस आई जिसने विभाजन का नारा उठाया, संप्रदाय के नाम पर बार बार तोड़ा। दूसरे आए जिन्होंने जातिवाद का जहर फैलाया, तीसरे आए जिसने जाति के भीतर भी जाति पैदा करने का प्रयास किया।

बिहार में फिर से एक बार अगर ‘सवर्ण’ युग लाना है, अगर बिहार को फिर से चाणक्य की उस महान विरासत को हासिल करना है तो हमें जोड़ने की राजनीति करनी पड़ेगी, तोड़ने की राजनीति से देश नहीं चलेगा।”

मोदी की रैली के दौरान हुए सिलसिलेवार बम विस्फोटों की धमक में उनके इस बयान पर बहुत ध्यान नहीं दिया गया पर “जातिवादी” राजनीति करने वाली पार्टियों पर हमला बोलने के एकदम बाद “चाणक्य की विरासत वाले सवर्ण युग” की याद दिलाने के गहरे राजनीतिक मायने हैं।

साधारण चूक?
मोदी का स्वर्ण युग की बजाए सवर्ण युग कहना उच्चारण की बहुत साधारण चूक भी हो सकती है और शायद यही समझकर बहुत से लोगों ने इस पर ध्यान नहीं दिया।

पर अगले आम चुनावों से पहले अलग अलग जाति समूहों में अपनी स्वीकृति बढ़ाने की कोशिश के संदर्भ में देखें तो ये स्वर्ण को सवर्ण कहने जैसी साधारण चूक नहीं दिखती।

अपनी स्वीकृति बढ़ाने की कोशिश मोदी के लिए कितनी कठिन साबित हो रही है इसका अंदाज़ा नरेंद्र मोदी के भाषणों से लग जाता है।

इस कोशिश में इतिहास और नागरिकशास्त्र की वो नए सिरे से, अपने हिसाब से व्याख्या कर रहे हैं और उनसे सवाल करने वाला कोई नहीं है।

उन्हें एक ओर मुसलमानों को ये विश्वास दिलाना है कि गुजरात में हुए 2002 के दंगों के बावजूद उनसे बड़ा ख़ैरख्वाह कोई नहीं है, दूसरी ओर हिंदू मतदाताओं के बीच अपनी हिंदू हृदय सम्राट की छवि को भी बचाए रखना है।

इस बीच दलितों और पिछड़ों को भी ये बताना है कि मैं पिछड़ी जाति में पैदा हुआ हूँ और बचपन में मैंने रेलगाड़ियों में चाय बेचकर गुज़ारा किया है।

ऐसी कठिन डगर पर चलते हुए अगर नरेंद्र मोदी पटना के गाँधी मैदान से कविता के ज़रिए बताते हैं कि सिकंदर जब दीन-ए-इलाही का बेबाक बेड़ा लेकर विश्वविजय करते हुए हिंदुस्तान आया तो दीन-ए-इलाही के बेड़े को गंगा में डुबो दिया और बिहार के सैनिकों ने उसे परास्त करके भगा दिया।


अब इतिहास के किस विद्वान में है हिम्मत कि वो भारतीय जनता पार्टी की ओर से प्रधानमंत्री पद के दावेदार से पूछे कि सिकंदर ने दीन-ए-इलाही का प्रचार कब किया था, सर?

और किस सन में वो विश्वविजय करके पटना में आया जहाँ उसे बिहार के सैनिकों ने उसे परास्त किया और मार भगाया?

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