मेरठ गैंगरेप: पुलिस और सरकार ने बताई कुछ और ही कहानी
खरखौदा निवासी युवती से गैंगरेप और धर्मांतरण के मामले को पुलिस ने नाटकीय मोड़ दे दिया है। एसएसपी ने दावा किया है कि युवती का ऑपरेशन 23 जुलाई को मुजफ्फरनगर में नहीं बल्कि मेरठ मेडिकल कॉलेज के अस्पताल में हुआ था। युवती यहां चार दिन भर्ती भी रही। मामले में पुलिस ने एक आरोपी कलीम को गिरफ्तार किया है। इस खुलासे के साथ ही एसएसपी ने यह दावा कर नई बहस छेड़ दी है कि युवती का जबरन धर्मांतरण नहीं हुआ। मालूम हो कि लखनऊ में बैठे आला अफसर पहले दिन से ही पूरे मामले को झुठलाने में लगे हुए थे। अब तक पुलिस प्रकरण पर पर्दा ढंकती नजर आई। मामले में कई ऐसे अहम सवाल हैं, जिनका पुलिस के पास कोई जवाब नहीं है।
पुलिस लाइन में शुक्रवार को प्रेसवार्ता में एसएसपी ओंकार सिंह का फोकस 23 से 27 जुलाई के बीच के घटनाक्रम और ऑपरेशन मेरठ में कराए जाने की बात पर रहा। बकौल एसएसपी, गांव उलधन खरखौदा निवासी कलीम पुत्र आदिल इस युवती को बच्चा पार्क स्थित एक अल्ट्रासाउंड सेंटर लेकर गया था। जांच में युवती को डेढ़ माह का गर्भ बताया गया था। महिला डॉक्टर ने ऑपरेशन की सलाह दी थी। इस पर 23 जुलाई को कलीम ने युवती को मेडिकल अस्पताल में भर्ती कराया था। यहां युवती का रिकॉर्ड में असली नाम लेकिन बिरादरी बदली गई जबकि कलीम ने पति के रूप में अपना ही नाम लिखवाया। युवती की फेलोपियन ट्यूब का ऑपरेशन होने के बाद उसे 27 जुलाई को डिस्चार्ज किया गया। इसके बाद युवती अपने घर चली गई थी।
एसएसपी ने दावा किया कि युवती का जबरन धर्मांतरण नहीं हुआ था। तो क्या युवती ने सहमति से अपना धर्म बदला? इस सवाल पर एसएसपी चुप्पी साध गए। एसएसपी का कहना था कि उनके पास 23 से 27 जुलाई के बीच हुए घटनाक्रम से संबंधित साक्ष्य हैं। इसके आधार पर ही यह जानकारी दी गई है। इस केस के दूसरे आरोपियों के खिलाफ कार्रवाई के सवाल पर उनका कहना था कि सनाउल्ला के खिलाफ कुर्की की कार्रवाई अमल में लाई जा रही है।
अब पढ़िए यूपी सरकार की कहानी
मेरठ में धर्मांतरण व रेप के मामले में पीड़ित युवती का अपहरण नहीं हुआ था। जिस दौरान उसके अपहरण की बात कही जा रही है वह मेरठ मेडिकल कॉलेज में भर्ती थी। इस बात की तस्दीक युवती के बयान व मेडिकल कॉलेज के चिकित्सकों से हो चुकी है। यह तथ्य उस रिपोर्ट में भी शामिल है जो राज्य सरकार ने केंद्र को भेजी है। केंद्र ने मेरठ के खरखौंदा मामले में उत्तर प्रदेश सरकार से रिपोर्ट मांगी, जिसे शुक्रवार को दिन में भेज दिया गया।
मेरठ मामले में सरकार द्वारा भेजी गई रिपोर्ट पर एनेक्सी के मीडिया सेंटर में शुक्रवार को गृह सचिव कमल सक्सेना ने कहा कि युवती के पिता ने पहले 31 जुलाई को गुमशुदगी की सूचना दी थी, जिसमें कहा था कि उनकी बेटी 29 जुलाई से लापता है। गृह सचिव ने बताया कि युवती के पिता ने इसके बाद तीन अगस्त को मुकदमा दर्ज कराया है कि उनकी बेटी 23 जुलाई से लापता है। इसमें अपहरण की आशंका जताई गई है। सक्सेना ने बताया कि युवती ने अपने बयान में यह कहा है कि वह कलीम नाम के एक व्यक्ति के साथ 23 जुलाई को मेरठ मेडिकल कॉलेज में भर्ती हुई थी, जहां उसका ऑपरेशन हुआ और वह कुछ दिनों तक अस्पताल में भर्ती रही। गृह सचिव ने बताया कि पड़ताल में सामने आया है कि युवती गलत नाम से उलधन गांव खरखौंदा निवासी कलीम की पत्नी बनकर अस्पताल में दाखिल हुई थी। यह पीड़ित युवती ने भी स्वीकार किया है। उन्होंने यह भी कहा कि युवती ने अपने कलमबंद बयान में खुद को बालिग व अपनी उम्र 20 वर्ष की बताई है।
गृह सचिव ने कहा कि जिस दौरान युवती अस्पताल में रही वहां उसके साथ कलीम के साथ और कोई नहीं था। ऐसे में अगर उसका अपहरण हुआ होता, तो वह शोरशराबा कर सकती थी, यहां विरोध जता सकती थी। गृह सचिव ने कहा कि पूर्व में जो कहा जा रहा था कि डॉक्टर नवाब और सनत उल्लाह द्वारा उसका ऑपरेशन किए जाने की बात की पुष्टि नहीं हो सकी है। उन्होंने बताया गया कि इस मामले में आरोपी बने सात में से पांच को बंदी बनाया जा चुका है। उनसे जब पूछा गया कि धर्मांतरण हुआ या नहीं तो वह बोले की मामले की जांच चल रही है।
भर्ती होने के आधे घंटे में कर दी सर्जरी
लाला लाजपत राय मेमोरियल मेडिकल कॉलेज प्रशासन की भूमिका एक बार फिर संदेह के घेरे में है। इस बार खरखौदा कांड की पीड़िता के ऑपरेशन को लेकर यहां का स्टाफ कठघरे में है। मामले से पल्ला झाड़ने की कोशिशों में जुटा कॉलेज प्रशासन कह रहा है कि ऑपरेशन नहीं किया जाता तो युवती की जान जा सकती थी। लेकिन उसे इस सवाल का जवाब नहीं सूझ रहा है कि जिस मेडिकल कॉलेज में लंबी वेटिंग चलती है, उसमें भर्ती होने के आधे ही घंटे में ऑपरेशन कर युवती की फैलोपियन ट्यूब कैसे निकाल दी गई।
मेडिकल कॉलेज के सेंट्रल रिकॉर्ड सेक्शन (सीआरएस) के मुताबिक, युवती 23 जुलाई को दोपहर एक बजे ओपीडी नंबर-13 में पहुंची। उसने गुरुद्वारा रोड स्थित गायनेकोलॉजिस्ट डॉ. सुनीता जयरथ का पर्चा और अल्ट्रा साउंड दिखाया। इस पर उसे भर्ती कर लिया गया। इसके बाद यहां के डॉक्टरों ने डेढ़ से ढाई बजे के बीच उसका ऑपरेशन भी कर दिया। इस संबंध में सीएमएस डॉ. सुभाष सिंह का कहना है कि उसे एक्टोपिक प्रेग्नेंसी (गर्भाशय की जगह फैलोपियन ट्यूब में गर्भ) थी। इस तरह के केस बहुत कम होते हैं।
उनके मुताबिक, जिस वक्त पीड़िता भर्ती हुई, उसकी फैलोपियन ट्यूब फट चुकी थी। इससे उसके शरीर में जहर फैल रहा था। इसे देखते हुए उसका तत्काल ऑपरेशन जरूरी थी। युवती को डॉ. शकुन के अंडर भर्ती किया गया। उन्होंने ही ऑपरेशन कर उसकी फैलोपियन ट्यूब निकाली।
वेरीफिकेशन क्यों नहीं?
मेडिकल प्रशासन जिन दावों के साथ खुद को सही बताने की कोशिश कर रहा है, हो सकता है कि वह सही हों। लेकिन वेरीफिकेशन की बात सामने आते ही उसकी भूमिका संदिग्ध हो जाती है। वजह यह कि पीड़िता के पति का नाम कलीम निवासी उलधन (खरखौदा) दर्ज किया गया, जो उसके समुदाय से नहीं जुड़ा था।
पीड़िता 23 से 27 जुलाई की सुबह 10 बजे तक मेडिकल कॉलेज में भर्ती रही, लेकिन मेडिकल कॉलेज ने वेरीफिकेशन की जरूरत तक नहीं समझी। न ही पुलिस को इसकी जानकारी दी। इतना ही नहीं, तीन अगस्त से मामला सुर्खियों में है, लेकिन मेडिकल उसे छिपाए बैठा रहा। यहां तर्क दिया जा रहा है कि मोबाइल लोकेशन के आधार पर केस का खुलासा हुआ है।
उधर, पीसीपीएनडी एक्ट भी कहता है कि प्रेग्नेंसी के केस में आपात स्थिति में ऑपरेशन करना पड़े तो वेरीफिकेशन जरूर किया जाए।
ट्रीटमेंट फाइल में सच्चाई
पुलिस ने पीड़िता के पेट पर लगे टांकों का राज जरूर खोल दिया है। अब सवाल यह उठता है कि पुलिस पीड़िता की ट्रीटमेंट फाइल की दोबारा जांच क्यों नहीं करा रही है? क्योंकि इस फाइल और अल्टासाउंड रिपोर्ट की जांच से स्पष्ट हो जाएगा कि उसे तत्काल ऑपरेशन की जरूरत थी या नहीं? दरअसल, ट्रीटमेंट फाइल बताती है कि युवती का इलाज पहले डॉ. सुनीता जयरथ के यहां चल रहा था। वह खुद भी इमरजेंसी में ऑपरेशन करने में सक्षम थीं। ऐसे में मेडिकल कॉलेज ले जाने की जरूरत क्यों पड़ी?
डॉक्टर पर्दे के पीछे क्यों:
मेडिकल प्रशासन और पुलिस ने उन डॉक्टरों (डॉ. सुनीता जयरथ और डॉ. शकुन) को सामने नहीं किया, जिन्होंने पीड़िता का केस हैंडल किया। दोनों ही डॉक्टरों के फोन किसी और ने उठाए। यानी दोनों को पर्दे के पीछे ही रखा जा रहा है, जो मामले के खुलासे पर सवाल खड़ा करता है।
मेरठ मेडिकल के प्राचार्य डॉ. प्रदीप भारती गुप्ता ने बताया कि तत्काल ऑपरेशन की जरूरत थी, क्योंकि जिस वक्त वह मेडिकल कॉलेज आई थी उसके शरीर में जहर फैलने का खतरा बढ़ रहा था। इस कारण डॉक्टर ने तत्काल ऑपरेशन किया। मेडिकल कॉलेज ने अपनी तरफ से नियमानुसार काम किया।
पीड़िता के वकीलों ने पुलिस के खुलासे पर उठाए सवाल
गैंगरेप और धर्मांतरण मामले में पुलिस कानून से खिलवाड़ कर गई। विवेचना के नियमों का पालन नहीं किया और जांच पूरी होने से पहले ही पीड़िता को झूठा साबित करने वाला निष्कर्ष निकाल लिया गया।
पीड़िता के वकील कृष्ण पहल और प्रमोद त्यागी का कहना है कि पुलिस को पहले तो केस की विवेचना करनी चाहिए। एफआईआर दर्ज होने के बाद 161 और 164 के बयानों में पीड़िता ने जो आरोप लगाए हैं, उनसे जुड़े साक्ष्य जुटाए जाएं। अभी तक पुलिस ने पीड़िता के बयान के आधार पर हापुड़, गढ़मुक्तेश्वर और मुजफ्फरनगर के मदरसों में जाकर सुबूत इकट्ठा नहीं किए। हापुड़ के जिस मदरसे में पीड़िता से गैंगरेप किया गया, उसका नक्शा नजरी नहीं बनाया गया, जो विवेचना के नियमों के लिहाज से बेहद जरूरी है। केस डायरी में पीड़िता के बयान के साथ ही गवाहों के बयान लिए जाते हैं, जो अभी तक दर्ज नहीं किए गए। बावजूद इसके पुलिस ने जल्दबाजी में पीड़िता के ऑपरेशन संबंधी साक्ष्य जुटाने का दावा किया और पीड़िता को ही झुठलाने की दलील पेश कर दी।
वकील कृष्ण पहल और प्रमोद त्यागी का कहना है कि पुलिस लीपापोती कर रही है। पीड़िता के बयान के आधार पर घटनास्थल देखने चाहिए। नक्शा बनाकर साक्ष्य केस डायरी में शामिल करें। विवेचना पूरी हुए बगैर जल्दबाजी में ऐसा बयान नहीं देना चाहिए। ये सिर्फ पुलिस पर दबाव का असर है।
‘दिखाने पर पहचान लेगी अस्पताल’
खरखौदा कांड पर पुलिस द्वारा शुक्रवार शाम की गई प्रेस कांफ्रेंस की कई बातों को पीड़ित परिजनों ने नकार दिया है। गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल में भर्ती पीड़िता की देखरेख के लिए मौजूद उसके जीजा का कहना था कि इस पूरे प्रकरण की सीबीआई जांच होनी चाहिए।
उनका कहना था कि लड़की को नहीं पता कि उसका ऑपरेशन कहां हुआ है। वह सिर्फ इतना जानती है कि अगर अस्पताल को बाहर से दिखाया जाए तो वह पहचान लेगी। अस्पताल में ऑपरेशन के दौरान उसे किसकी पत्नी बताकर भर्ती कराया गया, उसकी जानकारी नहीं है। पुलिस कलीम नामक जिस व्यक्ति की बात की जा रही है, वह मदरसे में रहता था और उसे वह अच्छी तरह जानती थी।
उनका यह भी कहना था कि अगर पुलिस ने इस मामले में लापरवाही बरती तो पीड़िता को भी मीडिया के सामने लाया जाएगा।
कांग्रेसी करते रहे इंतजार, नहीं आए राहुल गांधी
खरखौदा कांड की पीड़िता से मिलने गाजियाबाद के यशोदा अस्पताल में राहुल गांधी के आने की सूचना पर शुक्रवार को पुलिस, कांग्रेसी नेताओं और मीडियाकर्मियों का खूब जमावड़ा रहा। कांग्रेसी नेताओं ने सुबह साढ़े छह बजे ही अस्पताल पहुंच गये थे। करीब साढ़े 10 बजे उनके संसद में पहुंचने की जानकारी मिलने पर पुलिस, कांग्रेसी नेता और मीडियाकर्मी लौट गए। इस दौरान चार घंटे तक पूरा अस्पताल प्रबंधन भी अलर्ट रहा।
शुक्रवार को अफवाह फैली कि भट्ठा-पारसौल की तरह कांग्रेस उपाध्यक्ष राहुल गांधी गुपचुप यशोदा अस्पताल में भर्ती खरखौदा कांड की पीड़िता से मिलने पहुंचेंगे। इस पर कांग्रेस के पूर्व मंत्री सतीश शर्मा, प्रदेश सचिव नरेंद्र राठी समेत कई नेता वहां पहुंच गए। अस्पताल प्रबंधन भी अलर्ट हो गया। इसकी भनक लगते ही अस्पताल में मीडियाकर्मियों का जमावड़ा लग गया। कांग्रेसी नेताओं और मीडिया की मौजूदगी की सूचना पर पुलिस और एलआईयू के अधिकारी भी मौके पर पहुंच गए।
राहुल गांधी की सुरक्षा के लिए पुलिस बल और एस्कार्ट के लिए कई पीसीआर वैन बुला ली गईं। सूचना पर कांग्रेस के निवर्तमान जिलाध्यक्ष बिजेंद्र यादव, महानगर अध्यक्ष ओमप्रकाश शर्मा और पूर्व विधायक सुरेंद्र कुमार मुन्नी भी पहुंच गए। करीब साढ़े 10 बजे सूचना मिली कि राहुल गांधी संसद पहुंच गए तो पुलिस, नेता और मीडियाकर्मी लौटे। उन्होंने पीड़िता के परिजनों को न्याय दिलाने का आश्वासन दिया।