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काले धन पर किरकिरी से बचाने को PMO ने संभाली कमान

विनोद अग्निहोत्री/अमर उजाला, दिल्ली Updated Thu, 06 Nov 2014 10:36 AM IST
pmo in action mood at black money
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काले धन को लेकर सुप्रीम कोर्ट की फटकार के बाद हो रही किरकिरी की धूल छांटने के लिए केंद्र सरकार अब बेहद सक्रिय हो गई है। अभी तक वित्त मंत्री अरुण जेटली ही इस मामले में सरकार का पक्ष रख रहे थे, पर इस मामले में विपक्ष के साथ-साथ अपनों के भी निशाने पर वित्त मंत्री जेटली के आने का बाद अब खुद प्रधानमंत्री कार्यालय ने कमान संभाली है।
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इस मामले में पीएमओ द्वारा तैयार एक नोट में काले धन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट के दो अलग आदेशों और कर संधियों के गोपनीयता प्रावधान की अदालत की परिभाषा और अंतर्राष्ट्रीय समझदारी में विरोधाभास का उल्लेख करते हुए कहा गया है कि सरकार सुप्रीम कोर्ट से यह अनुरोध करेगी वह अब तक काले धन के मामले में अपने विरोधाभासी आदेशों और विदेशों के साथ हुई कर संधियों के गोपनीयता प्रावधान अंतर्राष्ट्रीय समझदारी से अलग अपनी परिभाषा में संशोधन करे।

सरकार मानती है कि सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले पर दो अलग अलग विरोधाभासी आदेश दिए हैं और गोपनीयता प्रावधान की उसकी परिभाषा अंतर्राष्ट्रीय समझदारी और परिभाषा से मेल नहीं खाती है।

इस मामले में सरकार द्वारा तैयार एक विस्तृत नोट के मुताबिक 2011 में काले धन के मुद्दे पर सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में स्पष्ट कहा था कि विदेशी बैंकों में खाता रखने वाले ऐसे लोगों जिनके खिलाफ किसी वित्तीय अनियमितता के सबूत नहीं मिले हैं, के नामों को सार्वजनिक करना निजता के अधिकार का उल्लंघन है।

यह काला धन जैसी व्यवस्थागत समस्या के त्वरित निदान जैसा होगा जिससे खतरनाक परिस्थितियां पैदा हो सकती हैं। जबकि एक मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि उन आठ लोगों के नाम जिनके खिलाफ जांच पूरी हो चुकी है याचिकाकर्ता (राम जेठमलानी) को दे दिए जाएं, बावजूद इसके कि उनके खिलाफ किसी अनियमितता के सबूत नहीं मिले। सरकार के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट के अपने ही दोनों आदेशों में विरोधाभास है।

इस नोट के मुताबिक यह आठ नाम सार्वजनिक होने के बाद जर्मनी ने जून 2014 में भारत को पत्र लिखकर इस पर आश्चर्य जताते हुए स्पष्टीकरण मांगा कि यह जानकारी सार्वजनिक कैसे हो गई। क्योंकि मार्च 2009 में जब जर्मनी ने लिंचेस्टाईन बैंक खाता धारकों के बारे में भारत को जो जानकारी दी थी,वह कर संधि के गोपनीयता प्रावधान के तहत थी।
सरकार केमुताबिक सुप्रीम कोर्ट की भारत और जर्मनी जैसे दूसरे देशों के बीच हुई कर संधियों में गोपनीयता प्रावधान की परिभाषा और अंतर्राष्ट्रीय समझ में भी अंतर है।

सुप्रीम कोर्ट के मुताबिक विदेशों से प्राप्त की गई जानकारी का सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई के दौरान इस्तेमाल हो सकता है। यह कर संधियों के गोपनीयता प्रावधान की इस सामान्य अंतर्राष्ट्रीय समझदारी और परिभाषा के खिलाफ है जिसके मुताबिक संबंधित देशों से मिली सूचना का सिर्फ कर संबंधी और कर निर्धारण या कर वसूली केलिए ही इस्तेमाल हो सकता है। सरकार को लगता है कि इस विरोधाभास की वजह से वह देश जिनके साथ भारत की कर संधि या सूचना आदान प्रदान समझौता नहीं है या वह देश जिन्होंने भारत से कुछ सूचनाएं साझा की हैं, आगे के सहयोग को लेकर ठिठक गए हैं।

सरकार को लगता है कि अगर गोपनीयता प्रावधान को लेकर सुप्रीम कोर्ट की परिभाषा सामान्य अंतर्राष्ट्रीय समझ से इसी तरह अलग रही तो भारत औरअमेरिका के बीच सूचना के स्वत आदान प्रदान के लिए होने वाले इंटर गर्वन्मेंटल एग्रीमेंट (आईजीए) में देरी हो सकती है। इसका भारत केवित्तीय संस्थानों पर विपरीत प्रभाव पड़ सकता है। क्योंकि अमेरिका ने करीब सौ देशों के साथ यह समझौता किया है,इसलिए इसकी भाषा बदलने की कोई संभावना नहीं है।

29 अक्टूबर 2014 को भारत को मल्टीलेटरल कॉम्पीटेंट अथॉरिटी एग्रीमेंट पर दस्तखत करने के लिए बर्लिन जाना था,जिसमें उसे अंतर्राष्ट्रीय सूचनाएं प्राप्त करने के मामलों में अंतर्राष्ट्रीय मानदंडों का पालन करने का वैश्विक वचन देना था। लेकिन भारत इसमें नहीं जा सका। क्योंकि वह सभी देश जिन्होंने भारत के साथ कानूनी रूप से सूचनाओं को साझा किया है,किसी न किसी ऐसी संधि से बंधे हुए हैं जिनमें गोपनीयता का प्रावधान है।

सूचनाएं पाने का कोई और दूसरा रास्ता नहीं है। अब सरकार के पास दो ही रास्ते हैं। एक तो यह कि सरकार कहकर कि सुप्रीम कोर्ट केआदेश और विदेशों केआग्रह के बीच विरोधाभास है, हाथ पर हाथ धर कर बैठ जाए। दूसरा यह कि सरकार के प्रति गलत धारणा का जोखिम उठाते हुए सुप्रीम कोर्ट से अपने विरोधाभासी फैसलों और गोपनीयता प्रावधानों की अंतर्राष्ट्रीय समझदारी से इतर परिभाषा को संशोधित करने का अनुरोध करे। सरकार ने जोखिम उठाते हुए दूसरा रास्ता अपनाने का फैसला किया है ताकि विदेशी बैंकों में जमा काले धन का पता लगाया जा सके।

केंद्र सरकार के इस नोट में सरकार द्वारा उठाए गए कदमों का ब्यौरा देते हुए कहा गया है कि नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में भाजपा नीत एनडीए सरकार बनते ही सबसे पहला फैसला सुप्रीम कोर्ट के आदेश का अनुपालन करते हुए काले धन की जांच के लिए विशेष जांच दल (एसआईटी) का गठन किया गया।

27 जून 2014 को एसआईटी को काले धन और विदेशी बैंको में खाता धारकों केबारे में जो जानकारी फ्रांस और जर्मनी से मिली थी, उसे सौंप दिया गया। वित्त मंत्रालय लगातार एसआईटी से संवाद करते हुए उसे जांच से संबंधित सभी आïवश्यक सूचनाएं उपलब्ध करा रहा है। एसआईटी के अध्यक्ष न्यायमूर्ति एम बी शाह ने स्वयं कहा है कि काले धन के खुलासे से संबंधित सभी तथ्य उनकी जानकारी में हैं और सरकार किसी को बचाने का प्रयास नहीं कर रही है।

नोट में केंद्र सरकार यह भी बता रही है कि यूपीए सरकार ने 2011 में एसआईटी गठन के सुप्रीम कोर्ट केआदेश का न सिर्फ विरोध किया बल्कि अपने कार्यकाल में गठित भी नहीं किया। नवंबर 2013 में यूपीए सरकार ने सुप्रीम कोर्ट को आवेदन देकर एसआईटी गठन के अपने आदेश को संशोधित करने की मांग की। जिसे अदालत ने खारिज कर दिया। यूपीए सरकार के कार्यकाल के आखिरी वक्त में आठ मई 2014 को सुप्रीम कोर्ट में केंद्र द्वारा दायर पुनर्विचार याचिका में अन्य कुछ बातों के साथ एसआईटी गठन के आदेश को रद्द करने का मुद्दा भी शामिल था।
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