{"_id":"c6f04c3a-d189-11e2-8462-d4ae52bc57c2","slug":"pm-post-is-still-difficult-for-modi","type":"story","status":"publish","title_hn":"अभी दूर है मोदी के लिए दिल्ली: पाँच वजहें ","category":{"title":"India News Archives","title_hn":"इंडिया न्यूज़ आर्काइव","slug":"india-news-archives"}}
अभी दूर है मोदी के लिए दिल्ली: पाँच वजहें
विनीता वशिष्ठ
Updated Mon, 10 Jun 2013 10:51 AM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
'कभी हसरत थी आसमां को छूने की, अब तमन्ना है आसमां के पार जाने की'। भाजपा की केंद्रीय चुनाव समिति का अध्यक्ष बनने के बाद नरेंद्र मोदी के लिए ये जुमला बिलकुल सही बैठता है।
लेकिन क्या वाकई इस बार मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं? क्या ये वक्त और राजनीति की जो बिसात उन्होंने बिछाई है, वह उन्हें अगला पीएम बनाने के लिए सही है?
समूचे देश में भले ही एक सफल रणनीतिकार और अच्छे वक्ता के रूप में मोदी सराहे जा रहे हों लेकिन समीकरण बताते हैं कि इस बार पीएम बनना उनके लिए आसान नहीं है। दरअसल ऐसी एक नहीं बल्कि पांच बाधाएं हैं जिनके चलते पीएम पद मोदी के लिए दूर की कौड़ी दिखता है।
विज्ञापन
जितनी लोकप्रियता उतना विरोध
एक तरफ मोदी की लोकप्रियता बढ़ी रही है तो उत्तरोत्तर उनका विरोध भी आदमकद हुआ है। उनका तेजी से बढ़ता राजनीतिक कद भारतीय जनता पार्टी के मंझले नेतृत्व को रास नहीं आ रहा। मोदी पर भले ही संघ का आशीर्वाद हो लेकिन ये जगजाहिर है कि किसी भी पार्टी में मंझले नेतृत्व से पंगा लेने वाला नेता बड़े पद पर स्वीकार्य नहीं हो पाता।
खासकर भाजपा जैसी पार्टी में जहां सर्वोच्च कमान किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है। आलम ये है कि हर दूसरे तीसरे दिन भाजपा के भीतर से ही कोई ऐसा बयान आ जाता है जिससे पता चलता है कि वे अभी पार्टी में ही सर्वमान्य नहीं है। यहाँ तक कि लालकृष्ण आडवाणी भी उनकी लकीर मिटाने में लगे दिखते हैं।
राष्ट्रीय फार्मूले की कमी
मोदी गुजरात का सफल नेतृत्व करके भले ही देश की जनता के सामने नायक बन कर खड़े हो गए हों लेकिन उनके भीतर केंद्रीय नेतृत्व देने की क्षमता कितनी है, इसका जवाब भविष्य की राजनीतिक धुँध में छिपा है।
मोदी के पिछले कई वक्तव्य और भाषण उठा कर देख लीजिए। लगभग हर भाषण में गुजरात का सफल संचालन, गुजरात का विकास और औरतों का सम्मान संबंधी बयानों के अलावा कुछ भी नया नहीं।
मोदी को समझना होगा कि पीएम बनना है तो गुजरात की रट छोड़नी होगी। पहले से ही विकसित गुजरात का कथित विकास तो वो दिखा चुके, देश के विकास के लिए उनके पास क्या फार्मूला है, ये वक्त उस फार्मूले को जाहिर करने का है। गुजरात का फार्मूला समझाने के लिए जरूरी नहीं कि दूसरे राज्यों की कमजोरियों का बखान किया जाए।
एक राज्य का मुख्यमंत्री होना अलग बात है, प्रधानमंत्री बनकर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को साथ लेकर विकास की राह पर चलना एकदम अलग। अभी मोदी जी को सभी को साथ लेकर चलना सीखना होगा।
कट्टरपंथी छवि है कि टूटती ही नहीं
गुजरात दंगों का जख्म भले ही जनता के जेहन में कुछ धुंधला गया हो लेकिन विरोधी समय-समय पर इसे कुरेदते रहते हैं। अल्पसंख्यक आबादी के मन में उन्हें लेकर अभी भी संशय की स्थिति है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में ये छवि उनकी राह का बड़ा रोड़ा है।
अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश भले ही अपना प्रतिनिधिमंडल मोदी से मिलने के लिए भेजते हैं लेकिन अमेरिका ने अभी तक उनको वीज़ा नहीं दिया है और वे वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग तक सीमित है। कुल मिलाकर मोदी अभी भी विदेश में अछूत हैं। उन्हें पीएम बनने से पहले इस छवि से बाहर निकलना होगा और देश के सभी वर्गों और विदेशों में भी स्वीकार्यता पानी होगी।
आत्मप्रचार का मोह
मोदी आत्मप्रचार का मोह नहीं छोड़ पाते। 'वन मैन आर्मी' की तरह मोदी अपनी लोकप्रियता का खासा ख्याल रखते हैं लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि एक केंद्रीय लीडर को रणनीति बनाने वालों के अलावा हर घड़ी में साथ देने वालों की भी जरूरत होगी।
यह जरूर है कि मोदी के पास इस समय प्रचार और प्रसार करने के लिए एक योग्य और कुशल टीम मौजूद है। वो तो कोई प्रोफ़ेशनल पीआर एजेंसी भी हो सकती है। लेकिन वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इस प्रचार से उनके साथ लोग नहीं आने वाले।
इस समय मोदी के पास ऐसा कोई गुट नहीं है जो उनकी बात को पत्थर की लकीर की तरह मान ले।
मोदी ने गुजरात में भी किसी नेता को उभरने नहीं दिया। हर बड़े समारोह, शिलान्यास और उदघाटन में मोदी ही नजर आते हैं। उन्हें नेशनल लीडर बनना है तो ऐसी टीम तैयार करनी होगी जो प्रोफेशनल न होकर खांटी राजनीतिक हो।
गठबंधन राजनीति बनी विलेन
सबसे आखिरी लेकिन सबसे बड़ी बाधा है गठबंधन की मजबूरी। फ़िलहाल तो दिखता है कि अकेले केंद्र में सरकार बनाना भाजपा के बूते के बाहर की बात है और गठबंधन में मोदी के नाम पर सहयोगी राजी नहीं हैं।
एनडीए अब वो एनडीए नहीं रहा जो अटल बिहारी वाजपेयी के समय था। अब इसमें गिनती की पार्टियाँ हैं और उनमें से जो सबसे बड़ा सहयोगी दल है उसके नेता नीतीश कुमार को मोदी फूटी आँख नहीं भाते।
शिवसेना को भी मोदी खास पसंद नहीं। ऐसा कतई नहीं लगता कि चुनाव 2014 में मोदी कोई जादुई छड़ी घुमाएंगे और गठबंधन के सहयोगी सांप्रदायिक मुद्दा भूलकर पीएम पद के लिए मोदी का नाम जपने लगेंगे।
दूसरा 272 का जादुई आँकड़ा पाने के लिए नए सहयोगी चाहिए होंगे। मुसलमानों के वोट की वजह से न ममता बनर्जी साथ आएँगी न चंद्रबाबू नायडू। चौटाला आ भी जाएँ तो वो तो इस समय जेल में हैं. तो ये आँकड़ा पूरा कहाँ से होगा?
विज्ञापन
लेकिन क्या वाकई इस बार मोदी देश के अगले प्रधानमंत्री बनने जा रहे हैं? क्या ये वक्त और राजनीति की जो बिसात उन्होंने बिछाई है, वह उन्हें अगला पीएम बनाने के लिए सही है?
विज्ञापन
समूचे देश में भले ही एक सफल रणनीतिकार और अच्छे वक्ता के रूप में मोदी सराहे जा रहे हों लेकिन समीकरण बताते हैं कि इस बार पीएम बनना उनके लिए आसान नहीं है। दरअसल ऐसी एक नहीं बल्कि पांच बाधाएं हैं जिनके चलते पीएम पद मोदी के लिए दूर की कौड़ी दिखता है।
विज्ञापन
जितनी लोकप्रियता उतना विरोध
एक तरफ मोदी की लोकप्रियता बढ़ी रही है तो उत्तरोत्तर उनका विरोध भी आदमकद हुआ है। उनका तेजी से बढ़ता राजनीतिक कद भारतीय जनता पार्टी के मंझले नेतृत्व को रास नहीं आ रहा। मोदी पर भले ही संघ का आशीर्वाद हो लेकिन ये जगजाहिर है कि किसी भी पार्टी में मंझले नेतृत्व से पंगा लेने वाला नेता बड़े पद पर स्वीकार्य नहीं हो पाता।
खासकर भाजपा जैसी पार्टी में जहां सर्वोच्च कमान किसी एक व्यक्ति के हाथ में नहीं है। आलम ये है कि हर दूसरे तीसरे दिन भाजपा के भीतर से ही कोई ऐसा बयान आ जाता है जिससे पता चलता है कि वे अभी पार्टी में ही सर्वमान्य नहीं है। यहाँ तक कि लालकृष्ण आडवाणी भी उनकी लकीर मिटाने में लगे दिखते हैं।
राष्ट्रीय फार्मूले की कमी
मोदी गुजरात का सफल नेतृत्व करके भले ही देश की जनता के सामने नायक बन कर खड़े हो गए हों लेकिन उनके भीतर केंद्रीय नेतृत्व देने की क्षमता कितनी है, इसका जवाब भविष्य की राजनीतिक धुँध में छिपा है।
मोदी के पिछले कई वक्तव्य और भाषण उठा कर देख लीजिए। लगभग हर भाषण में गुजरात का सफल संचालन, गुजरात का विकास और औरतों का सम्मान संबंधी बयानों के अलावा कुछ भी नया नहीं।
मोदी को समझना होगा कि पीएम बनना है तो गुजरात की रट छोड़नी होगी। पहले से ही विकसित गुजरात का कथित विकास तो वो दिखा चुके, देश के विकास के लिए उनके पास क्या फार्मूला है, ये वक्त उस फार्मूले को जाहिर करने का है। गुजरात का फार्मूला समझाने के लिए जरूरी नहीं कि दूसरे राज्यों की कमजोरियों का बखान किया जाए।
एक राज्य का मुख्यमंत्री होना अलग बात है, प्रधानमंत्री बनकर कई राज्यों के मुख्यमंत्रियों को साथ लेकर विकास की राह पर चलना एकदम अलग। अभी मोदी जी को सभी को साथ लेकर चलना सीखना होगा।
कट्टरपंथी छवि है कि टूटती ही नहीं
गुजरात दंगों का जख्म भले ही जनता के जेहन में कुछ धुंधला गया हो लेकिन विरोधी समय-समय पर इसे कुरेदते रहते हैं। अल्पसंख्यक आबादी के मन में उन्हें लेकर अभी भी संशय की स्थिति है। भारत जैसे धर्मनिरपेक्ष देश में ये छवि उनकी राह का बड़ा रोड़ा है।
अमेरिका और ब्रिटेन जैसे देश भले ही अपना प्रतिनिधिमंडल मोदी से मिलने के लिए भेजते हैं लेकिन अमेरिका ने अभी तक उनको वीज़ा नहीं दिया है और वे वीडियो कॉन्फ़्रेंसिंग तक सीमित है। कुल मिलाकर मोदी अभी भी विदेश में अछूत हैं। उन्हें पीएम बनने से पहले इस छवि से बाहर निकलना होगा और देश के सभी वर्गों और विदेशों में भी स्वीकार्यता पानी होगी।
आत्मप्रचार का मोह
मोदी आत्मप्रचार का मोह नहीं छोड़ पाते। 'वन मैन आर्मी' की तरह मोदी अपनी लोकप्रियता का खासा ख्याल रखते हैं लेकिन उन्हें यह समझना होगा कि एक केंद्रीय लीडर को रणनीति बनाने वालों के अलावा हर घड़ी में साथ देने वालों की भी जरूरत होगी।
यह जरूर है कि मोदी के पास इस समय प्रचार और प्रसार करने के लिए एक योग्य और कुशल टीम मौजूद है। वो तो कोई प्रोफ़ेशनल पीआर एजेंसी भी हो सकती है। लेकिन वे समझ नहीं पा रहे हैं कि इस प्रचार से उनके साथ लोग नहीं आने वाले।
इस समय मोदी के पास ऐसा कोई गुट नहीं है जो उनकी बात को पत्थर की लकीर की तरह मान ले।
मोदी ने गुजरात में भी किसी नेता को उभरने नहीं दिया। हर बड़े समारोह, शिलान्यास और उदघाटन में मोदी ही नजर आते हैं। उन्हें नेशनल लीडर बनना है तो ऐसी टीम तैयार करनी होगी जो प्रोफेशनल न होकर खांटी राजनीतिक हो।
गठबंधन राजनीति बनी विलेन
सबसे आखिरी लेकिन सबसे बड़ी बाधा है गठबंधन की मजबूरी। फ़िलहाल तो दिखता है कि अकेले केंद्र में सरकार बनाना भाजपा के बूते के बाहर की बात है और गठबंधन में मोदी के नाम पर सहयोगी राजी नहीं हैं।
एनडीए अब वो एनडीए नहीं रहा जो अटल बिहारी वाजपेयी के समय था। अब इसमें गिनती की पार्टियाँ हैं और उनमें से जो सबसे बड़ा सहयोगी दल है उसके नेता नीतीश कुमार को मोदी फूटी आँख नहीं भाते।
शिवसेना को भी मोदी खास पसंद नहीं। ऐसा कतई नहीं लगता कि चुनाव 2014 में मोदी कोई जादुई छड़ी घुमाएंगे और गठबंधन के सहयोगी सांप्रदायिक मुद्दा भूलकर पीएम पद के लिए मोदी का नाम जपने लगेंगे।
दूसरा 272 का जादुई आँकड़ा पाने के लिए नए सहयोगी चाहिए होंगे। मुसलमानों के वोट की वजह से न ममता बनर्जी साथ आएँगी न चंद्रबाबू नायडू। चौटाला आ भी जाएँ तो वो तो इस समय जेल में हैं. तो ये आँकड़ा पूरा कहाँ से होगा?