आखिर उपचुनावों में क्यों नहीं चली मोदी की लहर?
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दो लोकसभा और 33 विधानसभा सीटों के उपचुनाव के नतीजों को सिर्फ केंद्र की मोदी सरकार और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की लोकप्रियता के ग्राफ को गिरने का संकेत मानना जल्दबाजी होगी।
लेकिन इन नतीजों के कुछ अहम सबक भाजपा, कांग्रेस और सपा तीनों के लिए हैं। इस उप जनादेश से मतदाताओं ने भाजपा को उग्र हिंदुत्व से बाज आकर विकास की राजनीति करने, कांग्रेस को लोकसभा की हार के सदमें से बाहर निकलकर जमीन पर काम करने और सपा को अपनी कार्यशैली में सुधार करने का संदेश दिया है।
इन नतीजों से महाराष्ट्र में अब भाजपा का शिवसेना केप्रति रुख लचीला होने और हरियाणा और महाराष्ट्र में कांग्रेस कार्यकर्ताओं के टूटे मनोबल के संभलने की संभावना बढ़ गई है।
अपने बचाव में भाजपा नेताओं का यह कहना गलत नहीं है कि उपचुनावों में जनता ने केंद्र सरकार और प्रधानमंत्री मोदी के लिए नहीं बल्कि स्थानीय समीकरणों और उम्मीदवारों के हिसाब से मतदान किया। लेकिन अगर नतीजे भाजपा के पक्ष में होते तब जीत का पूरा श्रेय मोदी सरकार के सौ दिनों के कामकाज और लोकसभा चुनावों की मोदी लहर को ही दिया जाता।
दिल्ली विश्वविद्यालय में एबीवीपी की जीत
दिल्ली विश्वविद्यालय छात्र संघ के चुनावों की जीत का भाजपा नेताओं ने यही विश्लेषण किया है। गुजरात में विधानसभा उपचुनावों में कांग्रेस की वापसी का सिलसिला दरअसल लोकसभा चुनावों के दौरान ही शुरु हो गया था, जब लोकसभा के साथ हुए सात विधानसभा सीटों के उपचुनाव में कांग्रेस ने तीन पर जीत हासिल की थी लेकिन कांग्रेस की यह कामयाबी भाजपा की सुनामी के आगे दब गई थी।
अब जब कांग्रेस ने भाजपा की नौ विधानसभा सीटों में से तीन छीन ली हैं तब गुजरात भाजपा की वह गुटबाजी जो नरेंद्र मोदी के दबदबे की वजह से पिछले एक दशक से दबी हुई थी, फिर तेज हो सकती है। क्योंकि मुख्यमंत्री आनंदी बेन पटेल और भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के असहज रिश्ते छिपे नहीं हैं।
अमित शाह नहीं थे मोदी से सहमत
गुजरात प्रदेश भाजपा नेता तो यह भी कहते हैं कि जब मोदी अपने उत्तराधिकारी के रूप में अपनी बेहद भरोसेमंद आनंदी बेन पटेल को मुख्यमंत्री बना रहे थे, तब अमित शाह सहमत नहीं थे।
अब शाह पार्टी अध्यक्ष हैं और उपचुनाव के नतीजे आनंदी बेन की मुश्किलें बढ़ा सकते हैं। राजस्थान में कांग्रेस ने विधानसभा की चार में से तीन सीटें जीतकर न सिर्फ मुख्यमंत्री वसुंधरा राजे और भाजपा को झटका दिया है, बल्कि प्रदेश कांग्रेस की राजनीति में पूर्व मुख्यमंत्री अशोक गहलौत और पार्टी महासचिव सी.पी.जोशी से प्रदेश अध्यक्ष सचिन पायलट का कद भारी हो गया है। गहलौत और जोशी की सियासी जंग राजस्थान में कांग्रेस की बर्बादी की जिम्मेदार है।
राजस्थान में सचिन पायलट का रुतबा बढ़ेगा
लेकिन पूर्व केंद्रीय मंत्री सचिन पायलट ने लोकसभा चुनावों की हार के बाद दिल्ली को छोड़कर जयपुर में अपना स्थाई ठिकाना बनाया और लगातार प्रदेश में घूमघूम कर वसुंधरा सरकार के कामकाज को लेकर जनता को गोलबंद किया, उससे न सिर्फ पार्टी की गुटबाजी पर लगाम लगी बल्कि कार्यकर्ताओं का टूटा मनोबल भी लौटा।
यही वजह थी कि अपनी चारो सीटें बचाने के लिए वसुंधरा राजे ने मंत्रियों और विधायकों की फौज उतार दी, लेकिन फिर भी तीन सीटों पर हार हुई, जबकि आम चुनावों के दौरान भाजपा ने यह सीटें भारी मतों के अंतर से जीती थीं, और लोकसभा चुनावों में भी इन पर भाजपा उम्मीदवारों को खासी बढ़त मिली थी। वसुंधरा को लगे इस झटके के बाद भाजपा केकुछ केंद्रीय नेता उन्हें दिल्ली बुलाए जाने की अटकलें भी लगाने लगे हैं।
उत्तर प्रदेश में मिली भाजपा को हार
उत्तर प्रदेश भाजपा अपनी 11 विधानसभा सीटों में सिर्फ तीन लखनऊ, सहारनपुर और नोएडा ही बचा सकी। सहारनपुर में भी भाजपा को सपा से कड़ी चुनौती मिली।
शेष आठ सीटें जिनमें कांठ के लाउडस्पीकर विवाद वाले मुरादाबाद जिले की ठाकुरद्वारा, उमा भारती की चरखारी, प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के संसदीय क्षेत्र वाराणसी से सटी रोहनिया, इलाहाबाद की सिराथू, बलहा, निघासन और बिजनौर जैसी सीटें भी शामिल हैं जहां भाजपा को अपनी जीत की पक्की गारंटी थी।
लेकिन जिस तरह जीती हुई सीटों पर सपा को लंबी बढ़त मिली है, उससे दो बातें साफ हैं कि बसपा के मैदान में न होने और कांग्रेस के कमजोर होने से सपा को गैरभाजपा मतों का पूरा लाभ मिला, दूसरे बहुसंख्यक हिंदू समाज ने भाजपा के स्टार प्रचारकर योगी आदित्यनाथ की लव जेहाद और उग्र हिंदुत्व की राजनीति को नकार दिया।
लव जेहाद को दिखाया ठेंगा
आदित्यनाथ को भाजपा उत्तर प्रदेश में अपना फायर ब्रांड चेहरा बनाना चाहती थी,अब उसकी इस रणनीति पर ब्रेक लग गया है। भाजपा अध्यक्ष अमित शाह के लिए भी इन नतीजों से यह साफ संदेश है कि राष्ट्रीय अध्यक्ष की जिम्मेदारी संभालने के बाद उन्हें भाजपा को विकास राजनीति के उस रास्ते पर ले जाना होगा जिसकी घोषणा प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी लगातार अपने संबोधनों में कर रहे हैं। लेकिन इसके लिए पार्टी को योगी आदित्यनाथ और साक्षी महाराज ब्रांड हिंदुत्व से बाहर निकलना होगा।