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मिलिए, देश के लखपति-करोड़पति कबूतरों से

Tue, 10 Mar 2015 06:14 PM IST
Updated Tue, 10 Mar 2015 06:14 PM IST
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pigeon of india who are millionaire

राजस्थान के बहुत से हिस्सों में कबूतरों को दाना-चुग्गा डालने की परंपरा है लेकिन मारवाड़ के कबूतर कई लोगों के लिए रहने-खाने का इंतज़ाम करते हैं।

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यहां कबूतरों के नाम ज़मीन, बैंक बैलेंस, मकान, दुकान हैं और इनके बाकायदा पैन नंबर भी हैं। कबूतरों के किराएदार भी हैं और उनके किराए और ज़मीन की आय से धर्म-कर्म से जुड़े कार्य होते हैं।
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तो क्या है इन लखपति-करोड़पति कबूतरों की कहानी।

जोधपुर से 90 किलोमीटर दूर असोप में कबूतरों का बैंक बैलेंस करीब 30 लाख है और उनके नाम है 364 बीघा ज़मीन। इस ज़मीन पर खेती के लिए बोली लगती है और आमदनी कबूतरों के खाते में जाती है।
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उधर सरहदी शहर बाड़मेर के कबूतरों की संपत्ति भी कुछ कम नहीं। उनके नाम दस दुकानें और एक करोड़ कीमत की तिमंजिला इमारत 'व्हाइट हाउस' है। बैंक में करीब 10-12 लाख के फिक्स्ड डिपाज़िट भी हैं।

असोप में इन मूक पंछियों की ओर से काम करती है 100 साल से भी ज्यादा पुरानी कबूतरान कमेटी। इसके अध्यक्ष नन्द किशोर कसाट ने बीबीसी को बताया कि कस्बे में 21 चबूतरे हैं जहां असंख्य कबूतर दाना चुगते हैं।

बिना कबूतर के कबूतरखाना

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पुराने भामाशाहों द्वारा यह ज़मीन दान दी गई थीं। उनका कहना है कि कबूतर भोला पक्षी है, हिंसक नहीं है इसलिए लोग कबूतरों के लिए दान करना पुण्य मानते हैं।

बाड़मेर के कबूतर धर्मार्थ ट्रस्ट के अध्यक्ष मदन सिंघल ने बीबीसी को बताया कि पुराने समय में गांव की पंचायतों द्वारा दोषी व्यक्तियों को आर्थिक दंड के रूप में कबूतरों के लिए दो बोरी-पांच बोरी चुग्गा डालने की सजा दी जाती थी।

इसीलिए संभवतः किसी जागीरदार ने एक चबूतरा और कुछ दुकानें बनवाईं जहां कबूतरों को दाना डाला जा सके। करीब 15 साल पहले कुछ लोगों ने सहयोग कर तीन मंज़िला इमारत बनवा दी जिसे कम आय वाले लोगों को किराए पर दिया जाता है।

अब यह संस्था रजिस्टर्ड है और संस्थान को प्राप्त आय से गरीबों की सहायता, नेत्र चिकित्सा शिविर जैसे काम करवाए जाते हैं। कबूतरों के नियमित दाने की व्यवस्था के लिए अनाज भंडार है।

स्थानीय नागरिक पारस मेहता बताते हैं कि कबूतरों को धान बाजरा डालने की परंपरा तो बहुत पुरानी है लेकिन कबूतरों के नाम से इकट्ठा हुई राशि का निस्वार्थ भाव से सदुपयोग करना, ख़ास बात है।

पर राज्य के कुछ स्थान ऐसे भी हैं जिनकी पहचान तो कबूतरों से है पर अब कबूतरों की गुंटर-गूं से महरूम हैं। जैसे जोधपुर शहर का 'कबूतरों का चौक' और शेखावाटी के चिड़ावा का 'कबूतरखाना'।

इसके विपरीत जयपुर के अल्बर्ट हॉल म्यूजियम के पते में कबूतरों का कोई जिक्र तो नहीं पर फिर भी इसकी खूबसूरती कबूतरों के बिना अधूरी है।

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