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'बालकृष्णन के खिलाफ याचिका एक गंभीर मामला'
अमर उजाला, दिल्ली
Updated Fri, 18 Oct 2013 08:53 AM IST
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पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया केजी बालकृष्णन को राष्ट्रीय मानवाधिकार आयोग (एनएचआरसी) के अध्यक्ष पद से हटाने के लिए दायर याचिका को सुप्रीम कोर्ट ने काफी गंभीर मामला करार दिया है।
बालकृष्णन पर कथित तौर पर कदाचार और बेनामी संपत्ति के आरोप हैं।
जस्टिस बीएस चौहान और एसए बोबड़े की पीठ ने इस मामले पर फैसला लेने में सुरक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि कोई भी फैसला लेने से पहले उसे सभी पक्षों को सुनना होगा। पीठ ने कहा, ‘यह एक गंभीर मामला है। हम कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं लेना चाहते।’
सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हमें इस बात की जांच करनी होगी कि दुर्व्यवहार का जो मामला हुआ है, वह चीफ जस्टिस (सीजेआई) के रूप में किया गया या फिर एनएचआरसी अध्यक्ष के रूप में।
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पीठ ने विस्तृत सुनवाई को 30 अक्तूबर तक टालते हुए पूछा, ‘हम यहां दोहरी भूमिका में हैं और एक जांचकर्ता होने के नाते क्या हम संदर्भ के लिए सरकार की मदद ले सकते हैं। क्या एक जज के कथित दुर्व्यवहार या कदाचार के आधार पर उन्हें एनएचआरसी प्रमुख के पद से हटाया जा सकता है।’
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन ने कहा, ‘एनएचआरसी अध्यक्ष का ऑफिस जज के ऑफिस का विस्तार नहीं है और एनएचआरसी प्रमुख की ड्यूटी पूरी तरह से अलग है।’
उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह मामला कानून मंत्रालय के पास जा चुका है और उसे एनएचआरसी प्रमुख के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला है। हालांकि याचिका दायर करने वाले एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट से करानी चाहिए क्योंकि केंद्र इस मामले की हास्यास्पद व्याख्या कर रहा है।
उन्होंने कहा कि जब यह तथ्य सामने आया, उस समय बालकृष्णन एनएचआरसी अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे और पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ही इस पद पर नियुक्त हो सकता है।
प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि बालकृष्णन ने चीफ जस्टिस के पद पर रहते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई की थी, जबकि उन पर लगे दुर्व्यवहार के आरोप जज बनने से पहले के थे।
महाभियोग की प्रक्रिया जज और एनएचआरसी प्रमुख के लिए लगभग एक सी ही है। केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि बालकृष्णन और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ बेनामी संपत्ति के मामले आयकर जांच में कोई सुबूत नहीं मिले हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि सीजेआई के कार्यकाल के व्यवहार के आधार पर बालकृष्णन को एनएचआरसी प्रमुख के पद से नहीं हटाया जा सकता।
क्या है मामला
एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन को एनएचआरसी अध्यक्ष पद से हटाने की अपील की है। बालकृष्णन पर दुर्व्यवहार और चीफ जस्टिस रहते हुए बेनामी संपत्ति बनाने के आरोप हैं।
सरकार का तर्क
सरकार की दलील है कि बालकृष्णन के खिलाफ जांच में आयकर विभाग को कोई सुबूत नहीं मिला है। इसके अलावा चीफ जस्टिस कार्यकाल के दौरान किए गए व्यवहार के आधार पर उन्हें एनएचआरसी प्रमुख के पद से नहीं हटाया जा सकता।
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बालकृष्णन पर कथित तौर पर कदाचार और बेनामी संपत्ति के आरोप हैं।
जस्टिस बीएस चौहान और एसए बोबड़े की पीठ ने इस मामले पर फैसला लेने में सुरक्षात्मक रुख अपनाते हुए कहा कि कोई भी फैसला लेने से पहले उसे सभी पक्षों को सुनना होगा। पीठ ने कहा, ‘यह एक गंभीर मामला है। हम कोई भी फैसला जल्दबाजी में नहीं लेना चाहते।’
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सर्वोच्च अदालत ने कहा कि हमें इस बात की जांच करनी होगी कि दुर्व्यवहार का जो मामला हुआ है, वह चीफ जस्टिस (सीजेआई) के रूप में किया गया या फिर एनएचआरसी अध्यक्ष के रूप में।
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पीठ ने विस्तृत सुनवाई को 30 अक्तूबर तक टालते हुए पूछा, ‘हम यहां दोहरी भूमिका में हैं और एक जांचकर्ता होने के नाते क्या हम संदर्भ के लिए सरकार की मदद ले सकते हैं। क्या एक जज के कथित दुर्व्यवहार या कदाचार के आधार पर उन्हें एनएचआरसी प्रमुख के पद से हटाया जा सकता है।’
केंद्र सरकार की ओर से पेश सॉलिसिटर जनरल मोहन परासरन ने कहा, ‘एनएचआरसी अध्यक्ष का ऑफिस जज के ऑफिस का विस्तार नहीं है और एनएचआरसी प्रमुख की ड्यूटी पूरी तरह से अलग है।’
उन्होंने कोर्ट को बताया कि यह मामला कानून मंत्रालय के पास जा चुका है और उसे एनएचआरसी प्रमुख के खिलाफ कोई सुबूत नहीं मिला है। हालांकि याचिका दायर करने वाले एनजीओ कॉमन कॉज की ओर से पेश हुए एडवोकेट प्रशांत भूषण ने कहा कि इस मामले की जांच सुप्रीम कोर्ट से करानी चाहिए क्योंकि केंद्र इस मामले की हास्यास्पद व्याख्या कर रहा है।
उन्होंने कहा कि जब यह तथ्य सामने आया, उस समय बालकृष्णन एनएचआरसी अध्यक्ष के पद पर कार्यरत थे और पूर्व चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया ही इस पद पर नियुक्त हो सकता है।
प्रशांत भूषण ने तर्क दिया कि बालकृष्णन ने चीफ जस्टिस के पद पर रहते हुए कलकत्ता हाई कोर्ट के पूर्व जज सौमित्र सेन के खिलाफ महाभियोग की कार्रवाई की थी, जबकि उन पर लगे दुर्व्यवहार के आरोप जज बनने से पहले के थे।
महाभियोग की प्रक्रिया जज और एनएचआरसी प्रमुख के लिए लगभग एक सी ही है। केंद्र ने अपने हलफनामे में कहा है कि बालकृष्णन और उनके रिश्तेदारों के खिलाफ बेनामी संपत्ति के मामले आयकर जांच में कोई सुबूत नहीं मिले हैं। सरकार ने यह भी कहा है कि सीजेआई के कार्यकाल के व्यवहार के आधार पर बालकृष्णन को एनएचआरसी प्रमुख के पद से नहीं हटाया जा सकता।
क्या है मामला
एनजीओ कॉमन कॉज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर पूर्व चीफ जस्टिस केजी बालकृष्णन को एनएचआरसी अध्यक्ष पद से हटाने की अपील की है। बालकृष्णन पर दुर्व्यवहार और चीफ जस्टिस रहते हुए बेनामी संपत्ति बनाने के आरोप हैं।
सरकार का तर्क
सरकार की दलील है कि बालकृष्णन के खिलाफ जांच में आयकर विभाग को कोई सुबूत नहीं मिला है। इसके अलावा चीफ जस्टिस कार्यकाल के दौरान किए गए व्यवहार के आधार पर उन्हें एनएचआरसी प्रमुख के पद से नहीं हटाया जा सकता।