कहीं आपकी चाय में भी तो नहीं मिले कीटनाशक?
ग्रीनपीस इंडिया ने चाय उद्योग के ऊपर तैयार की अपनी रिपोर्ट ''ट्रवल ब्रीविंग'' में चौंकाने वाले खुलासे किए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक जो चाय में कीटनाशक पाए गए हैं। शोध में खुलासा किया गया है कि जिन चाय में कीटनाशक पाए गए हैं वे राष्ट्रीय और अंतराष्ट्रीय स्तर के ब्रांड हैं।
चाय उत्पादन में कीटनाशक का इस्तेमाल
रिपोर्ट से इस बात का भी खुलासा हुआ है कि भारत में चाय उत्पादन में उस कीटनाशक का भी इस्तेमाल होता है जिसके इस्तेमाल की इजाजत ही नहीं है।
ग्रीनपीस इंडिया की सीनियर कंपैनर नेहा सहगल ने कहा, "भारतीय चाय देश की शान है इसलिए इसका जुड़ाव किसी भी रूप में जहरीले रसायन से नहीं होना चाहिए जिसका असर स्वास्थ्य और पर्यावरण पर पड़ता हो। चाय उत्पादन में लगे सभी व्यक्तियों को आगे आकर हमारे देश के पेय की इज्जत की रक्षा करनी चाहिए।"
कई बड़े ब्रांडों में मिला कीटनाशक
जून 2013 से मई 2014 तक ग्रीनपीस इंडिया ने 49 चाय ब्रांड का परीक्षण किया जिसमें देश के टॉप 11 डिब्बाबंद ब्रांड में से 8 ब्रांड शामिल थे, जिसका भारतीय चाय बाजार में दबदबा है। ये वैसे ब्रांड हैं जो रूस, अमरीका, इंग्लैंड, यूनाइटेड अरब अमीरात (यूएई) और इरान में चाय का निर्यात करते हैं।
विश्व स्वास्थ्य संगठन के परिभाषा के अनुसार चाय के परीक्षण में दोनों तरह के वर्गीकृत-काफी खतरनाक (क्लास 1 बी) और खतरनाक (क्लास 2) कीटनाशक मिले हैं। जिन ब्रांडों की जांच की गई उसमें से अधिकतर ब्रांड में जहरीली कीटनाशक की मात्रा पाई गई।
67 फीसदी मिली डीडीटी की मात्रा
डीडीटी की मात्रा 67 फीसदी चाय में पाई गई, जबकि डीडीटी के कृषि कार्य में इस्तेमाल पर वर्ष 1989 में ही प्रतिबंध लगा दिया गया था(हालांकि इसका इस्तेमाल आजकल दूसरी तरह की बीमारी की रोकथाम के लिए किया जाता है और यह भी हो सकता है कि वह किसी और कीटनाशक में मौजूद रहे हों)।
कई चाय के नमूने में मोनोक्रोटोफॉस पोजेटिव पाया गया जो खतरनाक ऑर्गनोफोस्फोरस कीटनाशक है। गौरतलब है कि पिछले साल जब 23 स्कूली बच्चे की मौत खाने में मोनोक्रोटोफॉस कीटनाशक के मिलावट होने से हुई थी तो फूड एवं एग्रीकल्चर आर्गनाइजेशन (एफएओ) ने विकसित देशों से अपील की थी कि इन कीटनाशकों का इस्तेमाल धीरे-धीरे बंद कर दे। इसके अलावा निओनिकोटिन और इमीडेक्लोप्रिड नामक कीटनाशक भी पाई गई जिससे पशुओं के प्रजनन क्षमता पर असर पड़ता है और मधुमक्खी और अन्य दूसरे लाभदायक कीट-पतंगों को नुकसान पहुंचाता है।
चाय सेक्टर फंस गया है इस जाल में
ग्रीनपीस का शोध निष्कर्ष इस बात की तरफ इशारा करता है कि चाय सेक्टर कीटनाशक के जाल में फंस गया है और इससे बाहर निकलने का एक मात्र रास्ता पारिस्थितिकीय खेती है। ग्रीनपीस इंडिया चाय कंपनियों से अपील करती है कि वे इस परिवर्तन का समर्थन करे। जिन चाय कंपनियों के नाम का उल्लेख हमारी इस रिपोर्ट में है, उनसे हमने संपर्क किया है और पिछले कई महीनों से हमारी उन कंपनियों बातचीत हो रही है।
हमने अपने नमूने के परीक्षण का परिणाम उन कंपनियों के साथ साझा भी किया है। हमने चाय कंपनियों से यह भी आग्रह किया है कि वे कीटनाशक का प्रयोग न करने के लिए एक समय सीमा निर्धारित करें और उस पद्धति को न अपनाकर पारिस्थितिकीय कृषि पद्धति-उदाहरण के लिए गैर कीटनाशक प्रबंधन, नॉन पेस्टेडियल मैनेजमेंट (एन पी एम) की तरफ कदम बढ़ाएं। हम उनसे यह भी मांग करते हैं कि वे उन जगहों और बगीचों के बारे में हमें बताएं जहां चाय उपजाई जाती है और चाय उपजाने वालों के लिए बिना कीटनाशक का इस्तेमाल किए चाय उपजाने का लक्ष्य निर्धारित करे।
कीटनाशक फ्री चाय मिल पाएगी आपको
ज्यादातर कंपनियों ने हमारे सवालों का जवाब दिया है। एक बड़ी कंपनी ने घोषणा की है कि वह कीटनाशक का प्रयोग किए बगैर कैसे बेहतर चाय उगाई जा सकती है इससे पारिस्थितिकी को कैसे लाभ पहुंचे, इसके लिए रिसर्च शुरू करेगा। यह एक सकारात्मक कदम है और ग्रीनपीस आनेवाले दिनों में इस कंपनी के काम की प्रक्रिया पर नजर भी रखेगा।
एक अन्य कंपनी ने बयान जारी करके कहा कि वह अभी भी परपंरागत तरीके -जैविक माध्यम से रासायनिक कीटनाशक का ही प्रयोग करता है। हम उनसे अपेक्षा करते हैं कि वे भी नई सोच की जरूरत को समझेगें और गैर कीटनाशक मैनजमेंट को स्वीकार कर पूरी तरह कीटनाशक फ्री चाय का निर्माण शुरू कर देगें।