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सुप्रीम कोर्ट की नजर में बलात्कार के मायने

Sat, 15 Dec 2012 09:31 AM IST
नई दिल्ली/एजेंसी
नई दिल्ली/एजेंसी Updated Sat, 15 Dec 2012 09:31 AM IST
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penetration not necessary for establishing offence of rape says supreme court

सुप्रीम कोर्ट ने अपने एक आदेश में कहा है कि बलात्कार के अपराध को सिद्ध करने के लिए किसी महिला के जननांग में पुरुष के लिंग का प्रवेश कराया जाना जरूरी नहीं है।

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न्यायमूर्ति स्वतंत्र कुमार और न्यायमूर्ति ज्ञान सुधा मिश्रा की पीठ ने कहा कि महिला के जननांग में पुरुष के लिंग का प्रवेश करना अपने आप बलात्कार के अपराध को साबित करता है, लेकिन उसका विपरीत सही नहीं है। अगर पुरुष का लिंग महिला के जननांग में प्रवेश नहीं करता है तो भी यह जरूरी नहीं है कि बलात्कार न हुआ हो।
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शीर्ष अदालत ने यह फैसला 1997 में 11 वर्षीय लड़की से बलात्कार करने वाले एक व्यक्ति की दोषसिद्धि को बरकरार रखते हुए सुनाया। हालांकि इस मामले में पुरुष के लिंग के लड़की के योनि में प्रवेश करने का कोई सबूत नहीं था।
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पीठ ने कहा कि आईपीसी की धारा 375 (बलात्कार) के स्पष्टीकरण में विधायिका ने इस तरह से शब्द का इस्तेमाल किया है कि अगर पुरुष ने महिला के जननांग में अपने लिंग का प्रवेश कराया है तो यह बलात्कार के अपराध के लिए जरूरी यौन संबंध बनाए जाने को सिद्ध करता है।

पीठ ने कहा कि पुरुष का महिला के जननांग में अपने लिंग को प्रवेश कराने में हमेशा जरूरी नहीं है कि योनिच्छद टूटे। यह हमेशा दिए गए मामले के तथ्यों और परिस्थितियों पर निर्भर करेगा।

शीर्ष अदालत का यह फैसला आंध्रप्रदेश में 1997 में हुए एक रेप केस में आया है। आरोपी राधाकृष्ण नागेश तिरुपति स्थित एस वी यूनिवर्सिटी के टेनिस कोर्ट में बॉल बॉय था। उसने टेनिस कोर्ट के पास स्टोर रूम में एक 11 साल की लड़की से रेप किया था। स्थानीय अदालत ने मामले की सुनवाई के दौरान नागेश को इस आधार पर बरी कर दिया था उसने लड़की से संबंध स्थापित नहीं किया था।


जब पीड़िता ने हाईकोर्ट में अपील की तो स्थानीय अदालत के निर्णय को खारिज कर नागेश को 10 साल की सजा मिली। इस पर नागेश ने हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की थी। सुप्रीम कोर्ट ने नागेश की याचिका खारिज कर दी।       

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