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मानसून सत्र में अनचाहा 'रिकॉर्ड' बनाएगी संसद

Mon, 05 Aug 2013 12:04 AM IST
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा
नई दिल्ली/हरीश लखेड़ा Updated Mon, 05 Aug 2013 12:04 AM IST
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parliament meeting political parties not interested

संसद के मानसून सत्र के दौरान मात्र 16 बैठकें होंगी। संभवत: संसद के एक सत्र में सबसे कम बैठकों के मामले में यह एक रिकॉर्ड होगा। इसलिए भाजपा, लेफ्ट समेत लगभग सभी विपक्षी दल सरकार पर संसद का सामना करने से भागने का आरोप लगा रहे हैं।

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संसद के रिकॉर्ड गवाह हैं कि पंडित जवाहर लाल नेहरू के जमाने में साल में 100 से ज्यादा बैठकें होती थीं। यह सिलसिला लाल बहादुर शास्त्री और इंदिरा गांधी के कार्यकाल के शुरुआती वर्षों तक जारी रहा, लेकिन वर्ष 1975 से इसमें कमी आने लगी।
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मोरारजी देसाई व राजीव गांधी के कार्यकाल में कई बार सौ बैठकें हुईं, लेकिन पिछले तीन दशकों के दौरान एक साल में एक बार भी संसद की सौ बैठकें नहीं हुईं।

अखिल भारतीय स्पीकर्स फोरम की सिफारिश रही है कि संसद और बड़े राज्यों में विधानसभाओं की साल में कम से कम 100 तथा छोटे राज्यों में 60 बैठकें होनी चाहिए।

लोकसभा के पूर्व महासचिव सुभाष कश्यप कहते हैं कि अब नेहरू का जमाना नहीं है। नेता बदल गए हैं, राजनीति बदल गई है। जब भी सरकार खुद को आश्वस्त नहीं मानती है, वह संसद अथवा विधानसभा का सामना करने से भागती है।
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सरकार अपनी आलोचना से भी डरती है। इसके अलावा गठबंधन की राजनीति के चलते ब्लैकमेल की राजनीति शुरू हुई है और इसका सीधा असर संसद पर पड़ा है।

खास बात यह है कि संसद की बैठकें बुलाने के मामले में यूपीए और एनडीए का रिकार्ड एक जैसा रहा है। यूपीए की पहली पारी में 2008 के दौरान साल में मात्र 46 बैठकें हुईं, जो कि आजादी के बाद एक साल में सबसे कम बैठकों का रिकॉर्ड है।


एनडीए के शासन में अधिकतम 87 व न्यूनतम 51 बैठकें हुईं थीं। यूपीए की पहली पारी में 53 से 82 तक बैठकें हुईं, जबकि दूसरी पारी में यह औसत मात्र 52 बैठकों का है।

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