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हवा का रुख नहीं समझ पाए पंडित सिंह

लखनऊ/महेंद्र तिवारी Updated Sat, 13 Oct 2012 12:38 AM IST
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Pandit Singh could not assess changing condition
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इस्तीफा दे चुके राजस्व राज्यमंत्री विनोद कुमार सिंह उर्फ पंडित सिंह सूबे की सियासत की बदली हवा का रुख नहीं भांप सके। वह कभी सपा सुप्रीमो के खासमखास माने जाते थे और यही आत्मविश्वास उन्हें इस बात की ताकत देता रहा कि वे कुछ भी कर सकते हैं। इसी आत्मविश्वास की वजह से सपा सुप्रीमो की बार-बार हिदायत के मायने भी वह समझ नहीं पाए।
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मंत्रियों और पार्टी नेताओं-कार्यकर्ताओं से अच्छे आचरण की मुलायम सिंह यादव की बार-बार की अपील पर भी उन्होंने ध्यान नहीं दिया और अपनी पुरानी आदत के हिसाब से काम कर लालबत्ती गंवा बैठे। दुबारा राज्यमंत्री बनने के बाद से ही उनकी कार्यशैली पर उनकी पार्टी के भीतर से ही शिकायतें पहुंच रही थीं। नतीजा ये हुआ कि मुसीबत के समय इनके बगलगीर भी चुप्पी साधे रहे।

सपा मुखिया मुलायम सिंह यादव अखिलेश सरकार के गठन के बाद से ही पार्टी की अमूमन हर बैठक और आम कार्यक्रम में मंत्रियों को आचरण को लेकर आगाह करते रहे हैं। सपा युवजन सभा के राष्ट्रीय अध्यक्ष और मुख्यमंत्री अखिलेश यादव की टीम के खास सदस्य रहे संजय लाठर के खिलाफ कार्रवाई कर उन्होंने इसका संदेश भी दे दिया।

मगर पंडित सिंह ने इसका संज्ञान नहीं लिया। यही नहीं वह अपने खिलाफ बह रही हवा को भी वह नहीं भांप सके। पार्टी की एक विधायक खुलेआम उनकी कार्यशैली पर उंगली उठाती रहीं, वे हल्के में लेते रहे। दूसरे स्तर से भी यह चर्चा आम थी कि पंडित ने राज्यमंत्री के अपने पिछले कार्यकाल (मुलायम मंत्रिमण्डल) की तरह इस बार भी ‘खाता न बही, जौन पंडित कहें वहइ सही’, का नारा बुलंद करवा रखा है।

परिवारीजन के खाद्यान्न घोटाले में नाम आने से भी उनकी नस कमजोर हो चुकी थी। इतने सबके बावजूद पंडित ने अपने स्वभाव में तनिक भी बदलाव नहीं किया और पूरी दबंगई से सीएमओ से भिड़ गए। बसपा के कई मंत्रियों पर खराब छवि का आरोप लगाते हुए कटघरे में खड़ा करने वाली सपा और अखिलेश सरकार के पास अब अब न तो पंडित की सफाई सुनने का ज्:यादा मौका था और न ही विरोधियों को अपनी बात साबित करने के लिए कुछ ज्यादा कहने का।

मुलायम के बेहद खास रहे पंडित
विनोद कुमार सिंह उर्फ पण्डित सिंह अवध में मुलायम सिंह यादव के चुनिंदा बेहद करीबी लोगों में गिने जाते रहे हैं। बसपा के सत्ता में आने के बाद सपा जब सत्ता से दूर हुई तो मुलायम के दूसरे बड़े करीबी राजा आनन्द सिंह (इस समय कृषि मंत्री) का परिवार उनसे दूर छिटककर बसपा में चला गया था। राजा के बेटे कीर्तिवर्धन सिंह ने सपा केखिलाफ बसपा से लोकसभा चुनाव में ताल तक ठोकी।

तब कीर्तिवर्धन से दो-दो हाथ करने के लिए मुलायम ने पंडित को मैदान में उतारा था। नतीजा ये हुआ कि न कीर्तिवर्धन जीते और न ही पंडित, बाजी बेनी मार ले गए। विधानसभा चुनाव बाद पंडित को इस वफादारी का फायदा मिला और सपा सत्ता में लौटी तो अखिलेश मंत्रिमंडल में शामिल हुए। पार्टी छोड़ने के बावजूद राजा आनन्द सिंह अपनी वरिष्ठता और नेताजी से पुरानी नजदीकी की वजह से कैबिनेट मंत्री बने।

गुटबंदी की भी रही भूमिका
लोकसभा चुनाव में राजघराने और पंडित सिंह के बीच चली जुबानी जंग दोनों ही खेमों के मन में धरी रही और जिले में पार्टी दो खेमों में बंटी हुई है। समीकरण इतने बदले कि एक जमाने में एक दूसरे के धुर विरोधी रहे पंडित सिंह और कैंसरगंज के सांसद बृजभूषण शरण सिंह व तरबगंज के विधायक अवधेश कुमार सिंह उर्फमंजू भी एक साथ हो लिए।

एक समय था, पंडित सिंह ने बृजभूषण सिंह की पत्नी पूर्व सांसद केतकी सिंह का जिला पंचायत सदस्य का पर्चा तक खारिज करवा दिया था। दूसरी ओर राजा आनंद सिंह के दरबार में करनैलगंज के विधायक योगेश प्रताप सिंह, मेहनौन की विधायक नंदिता शुक्ला और मनकापुर के विधायक बाबूलाल माने जाते हैं। चर्चा है कि सीएमओ प्रकरण में इस धड़ेबंदी ने भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

नंदिता ने कार्यशैली पर उठाई थी उंगली
विधायक नंदिता शुक्ला ने पिछले दिनों बिना नाम लिए हुए पंडित सिंह की कार्यशैली पर उंगली उठाई थी। उनका कहना था कि उनकेक्षेत्र के मामलों में बिना वजह अड़ंगा लगाया जाता है। उन्होंने इसकी शिकायत पार्टी में ऊपर तक करने की बात कही थी। राज्यमंत्री ने कुछ दिन बाद ही बिना नाम लिए इन आरोपों का जवाब दिया था। उनका कहना था कि वे मुख्यालय पर हैं और उनकेपास जो भी आएगा उसकी वह सुनेंगे। इस जुबानी जंग के बीच नंदिता ने क्षेत्र में कार्यकर्ता सम्मेलन किया तो जिले के मंत्री होने के बावजूद पंडित नजर नहीं आए।

पहले से चल रहा था विरोध
गोंडा में खाद्यान्न घोटाले में पंडित सिंह के परिवारीजनों पर उंगली उठती रही है। इस आधार पर उनको मंत्री पद से हटवाने की कोशिश पहले से चल रही थी। जानकार बताते हैं कि चूंकि राज्यमंत्री का सीधे नाम नहीं था, लिहाजा पार्टी ने इस बात को तवज्जो नहीं दिया। सीएमओ मामले में सीधे राज्यमंत्री का नाम आया तो न  सिर्फ विरोधियों को अपनी बात को हवा देने का मौका मिला बल्कि सरकार को भी यह समझते देर नहीं लगी कि पंडित की कार्यशैली कम से कम नेतृत्व की कसौटी पर खरी नहीं है।

अपनों ने भी साध ली चुप्पी
जानकार बताते हैं कि पार्टी ने पंडित सिंह के खिलाफ कार्रवाई करने के पहले यह भी जानने की कोशिश की कि जिस मुद्दे को लेकर इतना हंगामा बरपा है, उस पर वहां के स्थानीय लोग क्या सोचते हैं? सूत्र बताते हैं कि जो लोग एक दिन पहले तक पंडित सिंह के साथ जोड़े जाते थे वे भी गोलमाल बात करते नजर आए।

तो शायद न होती किरकिरी
भर्ती केजिस प्रकरण में सरकार को सात महीने के भीतर ही राज्यमंत्री की कुर्सी छीन कर अपनी किरकिरी करानी पड़ी है, गोंडा का प्रशासन सजग होता तो शायद यह नौबत न आती। यदि प्रशासन की भूमिका साफ होती तो वह राज्यमंत्री और सीएमओ के आमने-सामने होने के बाद मामले में हीलाहवाली करता नजर नहीं आता और कम से कम चयन समिति के अध्यक्ष वहां के सीडीओ और डीएम को तो पूरे तथ्य सार्वजनिक करने चाहिए थे।
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