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सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है...

Wed, 19 Dec 2012 07:52 AM IST
चंदन जायसवाल/नई दिल्ली
चंदन जायसवाल/नई दिल्ली Updated Wed, 19 Dec 2012 07:52 AM IST
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pandit ram prasad bismil sacrificed his life for india

सरफ़रोशी की तमन्ना अब हमारे दिल में है, देखना है ज़ोर कितना बाज़ू-ए-क़ातिल में है...। इन क्रांतिकारी पंक्तियों की बदौलत भारत के इतिहास को एक नया मोड़ देने वाले अमर शहीद पंडित रामप्रसाद 'बिस्मिल' का आज शहादत दिवस है। भारत की आजादी के लिए सिर पर कफ़न बांधकर चलने वाले 'बिस्मिल' ने ब्रिटिश हुक़ूमत के खिलाफ जो क्रांति की चिनग़ारी भड़काई, उसने ज्वाला का रूप लेकर ब्रिटिश शासन के भवन को लाक्षागृह में परिवर्तित कर दिया था।

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आंदोलन से ज्यादा कलम की थी खौफ
ब्रिटिश सरकार जितना उनके क्रांतिकारी आंदोलन से डरती थी उससे कही ज्यादा उनकी कलम उसे डरती थी। क्योंकि बिस्मिल क्रांतिकारी के साथ-साथ एक उच्च कोटि के कवि, शायर, अनुवादक और साहित्यकार भी थे। पंडित रामप्रसाद बिस्मिल का जन्म यूपी के शाहजहांपुर ज़िले में 1897 को हुआ। उनके पिता का नाम मुरलीधर उपाध्याय था। यह वह समय था जब देश में राष्ट्रीय आन्दोलन ज़ोरों पर था।
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बचपन से ही ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ नफऱत
देश में ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ एक ऐसी लहर उठने लगी थी जो पूरे अंग्रेज़ी शासन को लीलने के लिए बेताब हो चली थी। बिस्मिल में भी बचपन से ही ब्रिटिश हुक़ूमत के ख़िलाफ़ एक गहरी नफऱत घर कर गई। अशफ़ाक़ुल्लाह ख़ान, चन्द्रशेखर आज़ाद, भगतसिंह, राजगुरु, सुखदेव और ठाकुर रोशनसिंह जैसे क्रांतिकारियों के सम्पर्क में आने के बाद 'बिस्मिल' ने अंग्रेजों की नाक में दम करना शुरू कर दिया।
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काकोरी कांड
इसी दौरान ब्रिटिश साम्राज्य को दहला देने वाले काकोरी कांड को 'बिस्मिल' ने ही अंजाम दिया था। बिस्मिल के नेतृत्व में 10 लोगों ने सुनियोजित कार्रवाई के तहत यह कार्य करने की योजना बनाई। 9 अगस्त, 1925 को बिस्मिल के नेतृत्व में लखनऊ के काकोरी नामक स्थान पर देशभक्तों ने रेल विभाग की ले जाई जा रही संगृहीत धनराशि को लूट लिया। इस डकैती में बिस्मिल के साथी अशफाकउल्ला, चन्द्रशेखर आज़ाद, राजेन्द्र लाहिड़ी, सचीन्द्र सान्याल, मन्मथनाथ गुप्त आदि भी शामिल थे।

'बिस्मिल' अंग्रेजों के लिए मुसीबत बन गए
'बिस्मिल' ने अपने हाथों से बम बनाए और क्रांतिकारियों को पनाह दी। अंग्रेजी हुकूमत के लिए बिस्मिल लगातार सिरदर्द बने रहे। ब्रिटिश सरकार की दृष्टि में काकोरी की घटना मात्र एक डकैती नही थी वरन अंग्रेजी हुकूमत के विरूद्ध एक सशस्त्र क्रांति थी जिसका उदेश्य ब्रिटिश सरकार को हटाना था। काकोरी ट्रेन डकैती और पंजाब असेंबली में बम फेंकने की वजह से 'बिस्मिल' अंग्रेजों की मुसीबत बन गए थे।


जेल में लिखी आत्मकथा
'बिस्मिल' ने बिस्मिल अज़ीमाबादी के नाम से भी काफ़ी शायरी की। जीवन के अंतिम सफ़र में जब उन्हें गोरखपुर जेल भेजा गया तो उन्होंने आत्मकथा भी लिखी। 19 दिसंबर 1927 को ब्रिटिश सरकार ने गोरखपुर जेल में उन्हें फांसी पर लटका दिया। जिस वक्त उन्हें फंदे की तरफ ले जाया जा रहा था वे निडर थे। उनके चेहरे पर खौफ का कोई भाव न था। वे 'वंदे मातरम' और 'भारत माता की जय' के नारे ऊंची आवाज में लगा रहे थे। बिस्मिल के हौसले और नारों की बदौलत अंग्रेज सरकार को अपने पतन की आहट सुनाई देने लगी थी।       

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