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पाकिस्तान के डॉक्टर भारत में बेच रहे जूते, क्या है मजबूरी?

Mon, 29 Jun 2015 09:06 AM IST
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली
टीम डिजिटल/अमर उजाला, दिल्ली Updated Mon, 29 Jun 2015 09:06 AM IST
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pakistani doctors selling shoes india

38 वर्षीय दशरथ केला गुजरात के मणिनगर में अपने चचेरे भाई की दुकान पर सेल्समैन का काम करते हैं। दुकान जूते की है और जूते बेचकर ही वह महीने में 15,000 रुपए कमा लेते हैं। इन्हीं रुपयों से वह अपने परिवार का पालन-पोषण करते हैं। लेकिन आज से नौ साल पहले ऐसा नहीं था। दशरथ के परिवार की हालत ऐसी नहीं थी।

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दशरथ केला वास्तव में पाकिस्तान से ताल्लुक रखते हैं। उन्होंने करांची यूनिवर्सिटी से एमबीबीएस किया है और पेशे से डॉक्टर हैं। पाकिस्तान के एक अस्पताल में 25000 महीने की वेतन पर काम करते थे। पर वक्त के साथ पाकिस्तान में महौल बदला और दशरथ के परिवार के लिए गुजर-बसर मुश्किल हो गई।
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वजह थी सुरक्षा, परिवार की सुरक्षा। पाकिस्तान में आए दिन हिंदुओं की बहू-बेटियों के साथ बदसलूकी होती थी। कई बार तो अपहरण भी किया गया। इन सबसे के बाद दशरथ और उनके जैसे कई परिवार दहशत में जीने लगे।
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परिवार का पेट पालने के लिए जूते बेचने लगे

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लेकिन इन सबके बावजूद दशरथ और उनके जैसे कई परिवार अपनी बच्चियों को एक सुरक्षित जीवन देने और खुली हवा में सांस लेते देखना चाहते थे। इसके लिए उन्होंने 2006 में रुख किया भारत का। भारत में अस्थाई वीजा के साथ दशरथ अपने परिवार सहित गुजरात पहुंचे।

भारत में सुरक्षा तो मिली पर कामकाज और पेट भरने के लिए एक अदद नौकरी ना जुटा सके। यहां तक की पाकिस्तान की डॉक्टरी की डिग्री भी काम नहीं आई क्योंकि भारत में मेडिकल की प्रैक्टिस के लिए मेडिकल कांउसिल ऑफ इंडिया से सर्टिफिकेट लेना जरुरी था और उसके लिए जरुरी थी भारतीय नागरिकता जो दशरथ केला के पास थी नहीं।

इसलिए परिवार का पेट पालने के लिए जूते बेचने लगे। ये कहानी अकेले दशरथ के परिवार की ही नहीं है। ऐसे लगभग 200 हिंदू परिवार पाकिस्तान में अपना घर-बार छोड़कर भारत में छोटी-मोटी नौकरी करके गुजर-बसर कर रहे हैं। डॉक्टरी की डिग्री के बावजूद कुछ फार्मसी में, तो कुछ मोबाईल रिपेयरिंग में लगे हैं।

पेट की भूख उनसे करा रही ये काम

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इसी तरह से पाकिस्तान के सिंध से आए 46 वर्षीय डॉ जयराम लोहाना का कहना है कि पाकिस्तान में लोग हमें भगवान की तरह पूजते थे पर अब हम यहां अपना पेट भरने के लिए भी अदद नौकरी की तलाश में दर-हदर भटकना पड़ता हैं।

2012 में भारत आए लोहाना पाकिस्तान में 1 लाख रुपए सालाना कमाते थे पर अब मोबाइल रिपेरिंग की दुकान पर काम करते हैं। लोहाना फिलहाल एक चैरिटेबल अस्पताल में 20,000 रुपए के वतन पर अपनी सेवाएं देते हैं। भारत में किसी भी विदेशी को डॉक्टरी के प्रैक्टिस के लिए भारतीय नागरिकता होना आवश्यक है। इसके अलावा एक जरुरी स्क्रीनिंग टेस्ट भी देना होता है।

एक पाकिस्तानी को कानूनी रुप से भारत की नागरिकता पाने के लिए 7 साल तक यहां रहना होता है इसके अलावा एमसीआई से सर्टीफिकेट के लिए 2 से 3 साल लग जाता है। इस तरह इन लोगों का काफी समय बर्बाद हो रहा है और ये सभी एक अदद उम्मीद की आस लगाए बैठे हैं।

वहीं 42 साल के डॉ गिरिधारी लाल सिनचानी 2001 में भारत आए थे और 1997 में इन्होंने कराची से एमबीबीएस किया था। 2014 में उन्हें भारत की नागरिकता तो मिल गई पर पिछले 14 महीनों से एमसीआई के सर्टीफिकेट का इंतजार कर रहे हैं।

ऐसे बहुत सारे किस्से आपको अहमदाबाद में पकिस्तानी शरणार्थियों के मिल जाएगें जो अपने परिवार की सुरक्षा के लिए अपने पेट की भूख और नौकरी से समझौता कर रहें हैं।

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