'पाकिस्तान भी चाहता है कि बडे़ भाई हिंदुस्तान का कद बढ़े'
एहतेशाम उल हक (पाकिस्तान के वरिष्ठ पत्रकार) का कहना है:
ओबामा साहब का दौरा ऐसे वक्त में हुआ है, जब हिंदुस्तान और पाकिस्तान के रिश्तों पर बर्फ जमी हुई है। ओबामा के हिंदुस्तान में आने को पाकिस्तान में भी बेहतर नजरिए से देखा जा रहा है। वैसे भी यह दौरा हिंदुस्तान और अमेरिका दोनों मुल्कों के बीच के आपसी ताल्लुकात का मसला है। आखिर अमेरिका दुनिया का सुपर पावर है। इस दौरे में उसने भारत को तकनीक देने, परमाणु करार पर आगे बढ़ने और सुरक्षा परिषद में उसकी स्थायी सदस्यता का समर्थन करने की बात की है, जो कि अच्छी पहल है। इससे पाक में भी खुशी है। पाक भी चाहता है कि दुनिया में उसके बडे़ भाई का कद बढे़।
हालांकि, ओबामा साहब को यह भी पहल करनी चाहिए कि दोनों देशों के बीच बातचीत की फिर से शुरू हो सके। आखिर पाक भी तो अमेरिका का अरसे से दोस्त और सहयोगी रहा है। उसने अमेरिका का हर कदम पर साथ दिया है। रही बात हिंदुस्तान की तो पाक में आज जो सियासी हालात हैं, उनमें वह भारत से फिर से बातचीत शुरू करने को इच्छुक है। मगर, इतना जरूर है कि हिंदुस्तान को भी छोटी-छोटी बातों को दिल से नहीं लगाना चाहिए। हिंदुस्तान की सरकार को भी अपने रवैये में बदलाव करना चाहिए। हिंदुस्तान हमारा बड़ा भाई है और बड़ा मुल्क बन चुका है। आज इस हकीकत से कोई मुंह नहीं मोड़ सकता।
इसलिए क्षेत्र में अमनचैन कायम करने के लिए यह जरूरी है कि दोनों मुल्कों के बीच फिर से भरोसा कायम हो और बातचीत हो। आज इस क्षेत्र में रोजी-रोटी को तरस रही करोड़ों के आबादी को सियासी मसलों से कोई लेना-देना नहीं है। उसे तो फिक्र है कि दोनों मुल्क पास-पास आएं ताकि नए अवसर पैदा हों। इसी तरह सार्क आज भी कोई बड़ा संगठन का रूप अख्तियार नहीं कर पाया है। इसलिए ओबामा साहब को दोनों मुल्कों को पास लाने की कवायद तो जरूर करनी चाहिए। कुछ लोग भले ही यह चर्चा कर रहे हैं कि आखिर ओबामा भारत आए, मगर पाक नहीं आए। इसे अन्यथा नहीं लिया जाना चाहिए। अमेरिका भी आज अच्छी तरह जानता है कि दक्षिण एशिया में शांति और स्थिरता सिर्फ हिंदुस्तान या महज पाकिस्तान के साथ रिश्तों को आगे बढ़ाने से नहीं लाई जा सकती। इन दोनों के साथ-साथ दक्षिण एशिया के सभी मुल्कों को इसके लिए साथ लेकर चलना होगा। आज क्षेत्र के सियासी हालात बेहद नाजुक हैं। ऐसा नहीं कि आतंकवाद से जूझ रहा पाकिस्तान इस बारे में चिंतित नहीं है।
हाल में पेशावर के स्कूल में मासूमों पर हुए हमलों के बाद से पाक सरकार ने सख्त कदम उठाए हैं। तालिबान हो या फिर कोई और आतंकी संगठन किसी को बख्शा नहीं जा रहा है। हमें अभी संभलने में वक्त भले ही लगे, मगर, हम इस मसले पर गंभीर जरूर हैं। हिंदुस्तान को भी यह समझना होगा। अमेरिका ने भी इस बात को माना है। माना कि दोनों मुल्कों के बीच बहुत सी बाधाएं हैं, गफलत हैं और कुछ अहम सियासी मसले हैं, मगर दोनों को ही बातचीत के मामले में दरियादिली दिखानी होगी। ओबामा से फिलहाल इसी दिशा में उम्मीद है। (दिनेश मिश्र से बातचीत पर आधारित)
मायने रखता है ओबामा का भारत दौरा
पाकिस्तान के प्रमुख अखबारों ने ओबामा के गणतंत्र दिवस के मौके पर आने को काफी महत्वपूर्ण बताया है। अखबारों ने सराहना करते हुए लिखा है कि यह दौरा काफी मायने रखता है। भारत-अमेरिका के रिश्तों के नए युग की शुरुआत से फिलहाल इस्लामबाद को कोई दिक्कत नहीं है। द डेली टाइम्स अपने संपादकीय में लिखता है, ‘ओबामा का गणतंत्र दिवस के मौके पर भारत आना बड़ी महत्वपूर्ण घटना है।’ अखबार लिखता है कि भारत, अमेरिका और पाकिस्तान के आपसी रिश्तों में असमंजस की स्थिति है। अमेरिका की हमेशा से भारत और पाकिस्तान के साथ दोस्ताना रिश्ते कायम करने की नीति रही है। हालांकि वह यह रिश्ते एकदूसरे की कीमत पर नहीं बनाना चाहता है। मंदी के दौर से उबरने में भारतीय अर्थव्यवस्था ने अमेरिका के लिए टॉनिक का काम किया है।
अखबार कहता है कि हिंदुस्तान अमेरिका के लिए बड़ा बाजार बनने की क्षमता है। खास तौर पर अमेरिकी हथियारों की बिक्री के लिए तो यह और भी फायदेमंद है। यही नहीं अमेरिका चीन से संतुलन साधने के लिए हिंदुस्तान से अपने रिश्ते और बढ़ा रहा है। बीते वर्षों में पाक की दोहरी नीतियों की वजह से पाक-अमेरिका रिश्तों में भरोसे की कमी आई है। खास तौर पर आतंकियों के खिलाफ कड़ी कार्रवाई करने में देर से कदम उठाने पर आपसी संदेह बढ़ा है। पाक सरकार को अभी भी यही नहीं मालूम है कि उसे तालिबान समेत आतंकी तत्वों से कैसे निपटना है।
हालांकि अमेरिका पाक की मुश्किलें समझता है। वह यह भी जानता है कि तालिबान को महज सैन्य कार्रवाई से नेस्तनाबूद नहीं किया जा सकता। यही वजह से पाक को मिलने वाली मदद पाक ने अभी तक नहीं रोकी है। वहीं, एक अन्य अखबार द न्यूज कहता है, ‘भारत और चीन के बीच क्षेत्र में पकड़ बनाए रखने की होड़ मची है और ओबामा के यहां आने से फिलहाल बीजिंग पर हिंदुस्तान को निर्णायक बढ़त मिली है।’ और भी कई अखबार लिखते हैं कि ओबामा भले ही भारत आए हों, मगर हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बीच बातचीत फिर से शुरू होनी ही चाहिए।
26/11 के गुनहगारों को सजा दिलाए पाक
भारत और अमेरिका ने आतंकवाद से मिलकर लड़ने की प्रतिबद्धता जताई है। दोनों देशों ने लश्कर-ए-ताइबा, डी कंपनी और हक्कानी नेटवर्क जैसे आतंकवादियों को ध्वस्त करने के लिए मिलकर और लगातार कोशिश की जरूरत पर जोर दिया। साथ ही पाकिस्तान से 26/11 के मुंबई हमले के गुनहगारों को सजा देने के लिए कहा है।
अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा से बातचीत के बाद प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने एक संयुक्त प्रेस बयान में कहा कि आतंकवादी गुटों के बीच कोई अंतर नहीं किया जा सकता है। बयान में आतंकवादी गुटों को पनाह देने वाले देशों से आतंकी ठिकानों को खत्म करने और आतंकवादियों को सजा देने की अपील की गई है। मोदी ने कहा कि भारत और अमेरिका दोनों का यह मानना है कि आतंकवाद के खिलाफ लड़ने के लिए एक समग्र अंतरराष्ट्रीय नीति और नजरिये की जरूरत है।
भारत और अमेरिका ने होमलैंड सिक्यूरिटी डायलॉग और इस साल के अंत में होने वाले अमेरिका-भारत संयुक्त कार्य दल की बैठक के जरिये आतंकवाद के खिलाफ पहल करने की प्रतिबद्धता जताई। दोनों इन समझौते के तहत कार्रवाई करने वाले प्रावधान तैयार करने पर सहमत थे। दोनों पक्षों ने डी कंपनी के तीन सहयोगी संगठनों के खिलाफ अमेरिकी प्रतिबंधों के महत्व को मंजूर किया। दोनों पक्ष मुंबई में हुए आतंकी हमलों की साजिश रचने वालों के खिलाफ कार्रवाई करने को प्रतिबद्ध दिखे।
प्रणब भी बोले, आतंकवाद से मिलकर निपटें
ओबामा के स्वागत में दिए गए राष्ट्रपति प्रणब मुखर्जी के रात्रिभोज में भी आतंकवाद का मुद्दा छाया रहा। रात्रिभोज से पहले ओबामा से मुलाकात के दौरान मुखर्जी ने कहा कि भारत और अमेरिका को आतंकवाद से मिलकर लड़ना चाहिए क्योंकि आज कोई भी देश इस समस्या से मुक्त नहीं है।