पाकिस्तान की पार्टी ने भारत से मांगी मदद, मचा हंगामा
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पाकिस्तान में एमक्यूएम पार्टी की तरफ से भारत समेत 55 देशों के राजनयिकों को लिखे गए एक पत्र की मीडिया में खूब चर्चा हो रही है। अखबार ‘जसारत’ के संपादकीय का विषय है- 'अब खत पर विवाद।' अखबार के मुताबिक एमक्यूएम की तरफ से एक पत्र लिखा गया है जिसमें बाकायदा भारत से मदद मांगी गई है।
अखबार कहता है कि पत्र में पार्टी ने कराची में जारी अभियान के तहत अपने कार्यकर्ताओं के लापता होने और उनकी गिरफ्तारियों को मानवाधिकारों का हनन करार दिया गया है।
'जसारत' के अनुसार जिन पार्टियों और गुटों ने पाकिस्तान को 'दहशतगर्दी की आग में झोंका है, उसमें एमक्यूएम सबसे आगे है, बल्कि विडंबना तो ये है कि ये पार्टी आज अपने समर्थकों के लिए ही मुसीबत बन गई है।'
‘दुश्मन के दरवाजे पर दस्तक’
वहीं ‘नवा-ए-वक्त’ ने लिखा है कि एमक्यूएम कहता है कि पत्र सिर्फ भारत को नहीं बल्कि दूसरे कई देशों को भी लिखा गया है, लेकिन भारत को लिखे गए पत्र को ही सार्वजनिक करना, सरकार की बदनियती है।
अख़बार कहता है कि ये पहला मौक़ा नहीं है, जब एमक्यूएम ने भारत से मदद मांगी है। पार्टी के मुखिया अल्ताफ हुसैन न जाने कितनी बार भारत से मदद की गुहार लगा चुके हैं।
अखबार के मुताबिक, उन्होंने पिछले हफ्ते भी अपने एक भाषण में भारत को 'कायर होने का ताना दिया था कि वो मुहाजिरों के कत्ल-ए-आम पर चुप बैठा है।'
अखबार का आरोप है कि अल्ताफ़ हुसैन के ऐसे बयान इसलिए भी चिंता का कारण हैं क्योंकि कराची में पाकिस्तान रेंजर्स के अभियान में एमक्यूएम मुख्यालय पर छापे में भारत में बने हथियार मिले हैं।
अखबार के मुताबिक, कई गिरफ़्तार एमक्यूएम कार्यकर्ताओं ने भारतीय खुफिया एजेंसी ‘रॉ’ के अधिकारियों से अपने रिश्ते कबूले और भारत में ट्रेनिंग हासिल करने की बात भी मानी। ‘उम्मत’ लिखता है कि अपने मुल्क में हालात कैसे भी हों, लेकिन दुश्मन के दरवाजे पर दस्तक नहीं देनी चाहिए।
बलूचिस्तान को पैकेज
उधर रोजनामा ‘वक्त’ ने नाराज बलूचियों को मनाने के लिए प्रधानमंत्री नवाज़ शरीफ़ की तरफ़ से शुरू किए गए ‘पुरअमन बलूचिस्तान’ कार्यक्रम को स्वागतयोग्य कदम बताया है।
अख़बार लिखता है कि प्राकृतिक संसाधनों से मालामाल बलूचिस्तान पाकिस्तान का वो प्रांत है जिस पर न तो राजनीतिक सरकारों ने और न ही सैन्य सरकारों ने कोई ध्यान दिया जबकि पाकिस्तान का भविष्य खुशहाल तभी होगा, जब बलूचिस्तान शांतिपूर्ण और विकसित होगा।
रोज़नामा ‘एक्सप्रेस’ ने चरमपंथी मामलों से निपटने के लिए बनी सैन्य अदालतों को बरक़रार रखने के सुप्रीम कोर्ट के फैसले को सकारात्मक फ़ैसला बताया है।
अखबार लिखता है कि जब सामने असाधारण हालात हों तो उनसे निपटने के लिए असाधारण फैसले भी लेने पड़ते हैं। अखबार के मुताबिक सुप्रीम कोर्ट का फैसला इसलिए अहम है क्योंकि कुछ लोग इन अदालतों के गठन को संवैधानिक मानते थे।
‘जुर्म तो जुर्म है’
रुख भारत के उर्दू मीडिया का करें तो ललितगेट मामले में विदेश मंत्री सुषमा स्वराज की भूमिका पर 'हमारा समाज' संपादकीय लिखता है- जुर्म का बचाव। अखबार लिखता है कि जुर्म तो जुर्म होता है, चाहे वो इंसानियत की रौ में बहकर किया जाए या फिर उसके पीछे कोई और वजह हो।
संसद में गतिरोध का ज़िक्र करते हुए अखबार कहता है कि अड़ियल रवैये से न तो सरकारें चलती हैं और न ही मुल्क, इसलिए सरकार को मान लेना चाहिए कि सुषमा स्वराज ने जुर्म किया है।
भारतीय सुरक्षा बलों की गिरफ्त में आया कथित पाकिस्तानी चरमपंथी उस्मान। उधर ‘जदीद खबर’ ने एक कथित पाकिस्तानी चरमपंथी की गिरफ़्तारी पर लिखा है- सनसनीखेज गिरफ्तारी।
अख़बार के मुताबिक पाकिस्तान ने फिर ‘ना ना’ करने वाला रवैया अख्तियार कर लिया है और गिरफ्तार व्यक्ति को अपना नागरिक मानने से भी इनकार किया है।
अखबार लिखता है कि बेशक भारत पाकिस्तान को इस बारे में सबूत देगा, लेकिन पाकिस्तान तो मुंबई हमलों के सिलसिले में सबूत देने के बावजूद कहता रहा कि उसे ठोस सबूत नहीं मिले। अखबार के मुताबिक जरूरत इस बात की है कि पाकिस्तान टालमटोल की बजाय वास्तविकताओं पर ध्यान दे।