घड़ी बम क्या तोप भी बरामद हो जाती: पाक मीडिया
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पेशावर के एयरबेस पर हुए हमले और भारत-पाक तल्खी के अलावा अमरीकी बच्चे अहमद की पाकिस्तानी उर्दू मीडिया में बीते हफ्ते खासी चर्चा रही। ‘एक्सप्रेस’ अखबार का संपादकीय है, 'अमरीका में एक मुसलमान लडके की वाहवाही।'अखबार लिखता है कि 14 वर्षीय अहमद ने तो अपनी बनाई घडी ये सोचकर टीचर को दिखाई कि शाबाशी मिलेगी, लेकिन गोरे टीचर ने उसे बम समझकर अहमद को पुलिस के हवाले कर दिया।
अखबार के मुताबिक, जब जांच में पता चला कि वो बम नहीं, बल्कि नए तरीके की डिजिटल घडी है तो सोशल मीडिया पर अहमद की शोहरत हर तरफ फैल गई। अखबार लिखता है कि अब अहमद को व्हाइट हाउस से लेकर नासा और फेसबुक तक की तरफ से अपनी नायाब घडी के साथ आने के न्यौते मिल रहे हैं।रोजनामा ‘पाकिस्तान’ ने इस सिलसिले में पाकिस्तानी जांच एजेंसियों के तौर तरीकों पर सवाल उठाया है।
अखबार लिखता है कि अगर अहमद को पाकिस्तान में इस संदेह में गिरफ्तार किया जाता तो घडी बम तो छोडो एक तरफ, उससे तोप भी बरामद कर ली जाती।अखबार ने इस मामले को मिसाल बताते हुए पाकिस्तानी जांच एजेंसियों को इससे सबक लेने की नसीहत दी है।
शोहरत की बुलंदियों पर
वहीं ‘उम्मत’ ने अहमद को नासा की तरफ से स्कॉलरशिप दिए जाने की खबर को
प्रमुखता से छापा है।अखबार लिखता है कि अमरीकी टीचरों के नस्लवाद और नफरत
भरे सलूक ने अहमद को शोहरत की बुलंदियों पर पहुंचा दिया है। ‘नवा-ए-वक्त’ ने
पाकिस्तानी राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार सरताज अजीज के इस बयान को तवज्जो दी
है कि न्यूयॉर्क में पाकिस्तान और भारत के प्रधानमंत्रियों की मुलाकात तभी
हो सकती है, जब भारत इसके लिए दरख्वास्त करेगा।
रोजनामा ‘इंसाफ’ कहता है कि
अगर भारत मुलाकात की बात करता है तो पाकिस्तान को कश्मीर पर बातचीत की
शर्त रखनी चाहिए क्योंकि इसी तरह पाकिस्तान अपनी पक्ष को सही और मजबूती से
रख सकता है। दोनों देशों के बीच तनाव पर ‘जसारत’ लिखता है कि जब से भारत में
मोदी सरकार बनी है, उसकी पहली प्राथमिकता यही दिखती कि कश्मीर समस्या को
खत्म कर दिया जाए और नियंत्रण रेखा को ही अंतरराष्ट्रीय सीमा बना दिया
जाए।
दूसरी तरफ, पिछले दिनों पाकिस्तानी वायुसेना के एक ठिकाने पर हुए हमले
पर ‘मशरिक’ का संपादकीय है, 'पेशावर पर खौफ के साए।'अखबार लिखता है कि
पोलियो की दवा पिलाने वाली टीमों पर हमले तो आम बात बन गए हैं, बावजूद इसके
सैन्य बेस पर हमला बताता है कि जब तक रणनीति आला दर्जे की नहीं होगी, तब
तक कुछ नहीं, भले ही सडकों पर कितने भी पुतले खड कर लिए जाएं।
‘छोटी सोच’
रुख भारत का
करें तो बिहार के आगामी चुनाव पर ‘जदीद खबर’ का संपादकीय है, 'कांटे की
टक्कर।'अखबार लिखता है कि चुनावी लडाई में आरजेडी और कांग्रेस को साथ लेकर
नीतीश कुमार ने बीजेपी के कैंप में सनसनी फैला दी और इसीलिए प्रधानमंत्री
को बिहार के लिए बडे पैकेज का एलान करना पडा।
अखबार की टिप्पणी है कि ‘सबका
साथ सबका विकास’ का नारा देने वाले मोदी की छवि अब सिर्फ बात करने वाले
प्रधानमंत्री की रह गई है।अखबार लिखता है कि शुरुआती सर्वेक्षणों में तो
नीतीश को बीजेपी से आगे दिखाया जा रहा है, लेकिन देखना है कि आगे आगे बिहार
में कैसी चुनावी तस्वीर उभरती है।
वहीं ‘कौमी तंजीम’ ने बिहार के चुनाव को
कांग्रेस का इम्तिहान बताया है।अखबार ने आंकडों के साथ राज्य में कांग्रेस
की घटती ताकत का ब्यौरा देते हुए लिखा है कि इसके बाद या तो खात्मे का सफर
होगा या वापसी का।‘हमारा समाज’ ने मराठी बोलने वालों को ही ऑटो रिक्शा का
लाइसेंस देने के महाराष्ट्र सरकार के फैसले की ओलचना की है।
अखबार ने इसे
छोटी सोच बताते हुए लिखा है कि इसका मकसद यही है कि राज्य में मराठी न
बोलने वालों को काम न मिले।अखबार कहता है कि ये फैसला संविधान की उस
व्याख्या के विपरीत है जो लोगों को देश में कहीं भी जाकर बसने और काम करने
का हक देती है।