अचानक मोदी की मोहब्बत क्यों जागी: पाक मीडिया
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के अचानक लाहौर दौरे पर पहुंचने का अधिकतर पाकिस्तानी उर्दू अखबारों ने स्वागत किया है, लेकिन कई जगह इसके पीछे की मंशा पर सवाल भी उठाए गए हैं।
अखबार 'एक्सप्रेस' लिखता है कि मोदी अचानक लाहौर पहुंचे लेकिन राजनयिक तकाजों और संवेदनशीलताओं को समझने वाले जानते हैं कि ऐसी मुलाकातें कैसे होती हैं।
अखबार मोदी के इस दौरे को पाकिस्तान के प्रति उनके रवैये में बदलाव का संकेत मानता है, जो उसके मुताबिक अब तक पाकिस्तान को निशाना बनाने का कोई मौका नहीं चूकते थे। रोजनामा 'दुनिया' ने भी मोदी के दौरे का स्वागत किया है लेकिन इसके पीछे की वजह तलाशने की कोशिश भी की है।
अखबार कहता है कि पहले कारगिल का बहाना था और फिर मुंबई हमलों का, जिसके चलते 'हम बार-बार दावत देते रहे, लेकिन न मनमोहन आए और न ही इससे पहले मोदी ऐसी जुर्रत कर सके।'
उसकी राय है कि अब पाकिस्तान के प्रति मोदी की मोहब्बत अचानक जाग पड़ी और वो खुद फोन करके और खुद ही यहां आए तो ज़ाहिर है इससे पीछे कोई न कोई दबाव तो होगा ही या फिर दूसरे हित होंगे।
वहीं 'नवा-ए-वक्त' लिखता है कि अमरीका और यूरोप की तरफ से मोदी सरकार पर पाकिस्तान के साथ बातचीत की मेज पर बैठकर दोतरफा मुद्दों को हल करने का दवाब है। अखबार के मुताबिक यही दबाव था कि पेरिस में मोदी खुद नवाज शरीफ के पास गए और फिर पाकिस्तान के साथ बातचीत को लेकर बर्फ पिघलनी शुरू हो गई।
लेकिन अखबार को इस पूरे घटनाक्रम से कोई ज्यादा उम्मीद नहीं है। वो कहता है कि अतीत के अनुभवों को देखते हुए बातचीत की इस पहल को अंतरराष्ट्रीय दबाव कम करने के लिए भारत की चाल ही कहा जा सकता है।
अखबार 'जंग' का दावा, भारत अपना फायदा देख रहा है
अखबार 'जंग' लिखता है कि भारत के रवैये में सकारात्मक तब्दीली के पीछे वैश्विक माहौल और क्षेत्रीय सच्चाइयों का भी बड़ा रोल है। अखबार के मुताबिक जहां अफगानिस्तान में शांति कायम करने में पाकिस्तान की अहम भूमिका है, वहीं ताजिकिस्तान से आने वाली तापी गैस पाइप लाइन भारत और पाकिस्तान दोनों के लिए बराबर फायदेमंद है। अखबार यहां तक कहता है कि भारत अपने निर्यात को मध्य पूर्व तक ले जाने के लिए पाकिस्तान से जमीनी रास्ता हासिल करना चाहता है।
रोजनामा 'पाकिस्तान' ने अतीत को टटोलते हुए लिखा है कि जब पाकिस्तान बनने के बाद भारत के पहले प्रधानमंत्री पंडित जवाहर लाल नेहरू पाकिस्तान दौरे पर आए थे तो वो भी लाहौर ही आए थे और उस वक्त जनरल अयूब खान की सरकार ने उनका जोरदार स्वागत किया था।
अखबार लिखता है कि इसके बाद राजीव गांधी बतौर प्रधानमंत्री पाकिस्तान आए लेकिन लाहौर नहीं जा सके जबकि 1999 में अटल बिहारी वाजपेयी ऐतिहासिक बस यात्रा के जरिए लाहौर पहुंचे थे। अब अचानक मोदी के लाहौर दौरे को लेकर अखबार की राय है कि इसे नकारात्मक नजरिए से नहीं देखना चाहिए।
अखबार लिखता है कि भारत और पाकिस्तान के टीवी चैनलों पर बैठे विश्लेषकों को सामान्य से हट कर होने वाली किसी भी घटना में साजिश नजर आने लगी है। अखबार की टिप्पणी है कि अब मोदी वापस जाते वक्त कुछ घंटे लाहौर में रुक गए तो कुछ विश्लेषक इसमें भी साजिश की कड़ियां तलाश रहे हैं, ऐसे में रिश्तों को सामान्य बनाने की कोशिशें भला कैसे कामयाब होंगी?
वहीं 'औसाफ' लिखता है कि मोदी का अचानक आना हालांकि कई सवाल छोड़ गया है लेकिन इस मुलाकात के असर बाद में जाहिर होंगे और आने वाले दिनों में भारत का रवैया देख कर पता चलेगा कि उसमें कोई बदलाव हुआ या नहीं।
अखबार लिखता है कि भारत को अपने व्यापार को बढ़ावा देने के लिए पाकिस्तान के रास्तों की जरूरत है और अफ़ग़ानिस्तान में भारत के हित भी इन्हीं रास्तों से जुड़े हैं। उसके मुताबिक, भारत ये भी चाहता है कि सुरक्षा परिषद में स्थायी सदस्यता के उसके दावे का पाकिस्तान विरोध न करे।