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पाक जेलों में नरक भोगते हैं भारतीय कैदी
लुधियाना/ब्यूरो
Updated Fri, 03 May 2013 01:21 AM IST
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पाक जेलों में भारतीय कैदी नरक का जीवन जीने को मजबूर हैं।
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केंद्र सरकार की ढुलमुल नीतियों के कारण ही सरबजीत आज इस दुनिया में नहीं रहा। यह कहना है डाबा लोहारा निवासी 78 साल के पुरषोत्तम सिंह का।
पुरषोत्तम भी पाकिस्तान की विभिन्न जेलों में 14 साल का कठिन वनवास काट चुके हैं। पाकिस्तान की जेल में हुए हमले के बाद सरबजीत की मौत ने 78 वर्षीय पुरषोत्तम के बरसों पुराने जख्म हरे कर दिए हैं।
पुरषोत्तम तीन माह तक कोट लखपत जेल में भी रहे हैं। पुरषोत्तम ने दो बार पाकिस्तान की सीमा पार की, लेकिन तीसरी बार पाक रेंजर के हत्थे चढ़ गए और उन्हें सजा हुई।
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1986 में वह पाकिस्तान की जेल से रिहा होकर वतन वापस आ गए, लेकिन तब तक उनके गम में उनकी पत्नी, बेटी और बेटा भगवान को प्यारे हो चुके थे। आज अपने एक बेटे के सहारे वह गुमनामी का जीवन जी रहे हैं।
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पुरषोत्तम का बचपन नवांशहर के गांव मल्लपुर अढ़का में बीता। 1973 में वे दो बार पाकिस्तान गए लेकिन तीसरी बार 1974 में वह पाकिस्तानी रेंजर के कब्जे में आ गए। रेंजर उनको पकड़ कर आरा बाजार लाहौर ले गए और वहां से मामला बना कर कोट लखपत जेल में डाल दिया।
तीन माह बाद उनको सेंट्रल मियां वाली जेल और फिर वहां से बहावलपुर सेंट्रल जेल में भेज दिया गया। जेल से वह अपने इंग्लैंड में रहने वाले चाचा को पत्रों के जरिए सूचना देते थे। 1986 में वह 109 कैदियों के जत्थे के साथ सजा काट कर वतन वापस आए थे।
उन्होंने कहा कि जेल में सुबह और शाम को दो रोटी के अलावा कुछ नहीं मिलता था। कैदियों से अमानवीय काम करवाए जाते थे। पुरषोत्तम का कहना है कि देशों के बीच कैदियों की आपस में अदला बदली को लेकर ट्रीटी बनी है तो सरबजीत को उस ट्रीटी के तहत रिहा क्यों नहीं कराया गया।
उन्होंने कहा कि सरकार की कमियों के कारण ही आज सरबजीत इस दुनिया में नहीं रहा। हालांकि सरबजीत की बहन ने काफी जद्दोजहद की, लेकिन सरकार ने ही उसका पूरी तरह साथ नहीं दिया, ऐसे में अब बड़ी बड़ी बातें करने और आंसू बहाने के अलावा सरकार के पास कुछ बचा नहीं है।