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'वन रैंक-वन पेंशन' लागू करने में कैसा डर?

Tue, 25 Aug 2015 10:25 PM IST
नितिन ए गोखले/रक्षा विशेषज्ञ, बीबीसी
नितिन ए गोखले/रक्षा विशेषज्ञ, बीबीसी Updated Tue, 25 Aug 2015 10:25 PM IST
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OROP issue and its importence to the nation

‘एक रैंक, एक पेंशन’ का मतलब है उन सभी पूर्व सैनिकों को एक समान पेंशन का भुगतान जो समान अवधि की सेवा के बाद एक ही रैंक से रिटायर हुए हों। इस मुद्दे को तमाम सरकारें टालती रहीं, लेकिन 2008 में दो संगठनों के बडे प्रदर्शन करने से ये मुद्दा फिर सुर्खियों में आया है।

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यूपीए सरकार ने एक दशक के अपने शासन में इस मुद्दे से मुंह मोडे़ रखा, लेकिन अपने दूसरे कार्यकाल के आखिर साल 2014 में इस मद में 500 करोड़ रुपए डालने का ऐलान कर दिया।
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तभी भाजपा के प्रधानमंत्री पद के उम्मीदवार नरेंद्र मोदी ने इस मुद्दे को लपका और पूर्व सैनिकों को भी ये सौदा अच्छा लगा। मोदी को प्रधानमंत्री बने हुए लगभग 15 महीने हो गए हैं, लेकिन ‘वन रैंक, वन पेंशन’ का वादा वो पूरा नहीं कर पाए हैं।
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इसलिए भारत के 25 लाख से अधिक पूर्व सैनिक चिंतित और नाराज हैं क्योंकि लगभग एक दशक से उन्हें कहा जा रहा है कि ‘एक रैंक, एक पेंशन’ की उनकी मांग मान ली जाएगी।

मोदी ने भी सार्वजनिक तौर पर कहा है कि उनकी सरकार ने ‘एक रैंक, एक पेंशन’ को सैंद्धांतिक रूप से मंजूर कर लिया है, लेकिन अभी तक इसे लागू नहीं कर सके हैं।

इस देरी की वजह है इस मुद्दे पर रक्षा मंत्रालय और वित्त मंत्रालय की अलग-अलग राय।

मंत्रालयों के बीच खींचतान

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वित्त मंत्रालय का आकलन है कि 'एक रैंक, एक पेंशन' लागू करने पर सालाना 7500 करोड़ से लेकर 10,000 करोड़ रुपए का खर्च आएगा।

रक्षा मंत्री मनोहर पर्रिकर ने भी अपने विभाग से इस योजना से खजाने पर पडने वाले बोझ का सही-सही आकलन करने को कहा है।

लेकिन वित्त मंत्री अरुण जेटली और उनके नौकरशाह अभी तक हर तरह के फॉर्मूले को ठुकराते रहे हैं और प्रधानमंत्री को इसमें दखल देने के लिए मजबूर होना पडा़ है।

मोदी के प्रमुख सचिव नृपेंद्र मिश्रा ने हाल ही में प्रदर्शनकारी पूर्व सैनिकों से मुलाकात कर इस मुद्दे का जल्द समाधान का वादा किया। पर्रिकर के भी इसी सप्ताह पूर्व सैनिकों से मिलने की उम्मीद है और इसके बाद वे उन्हें लेकर प्रधानमंत्री से मिल सकते हैं ताकि इस मुद्दे पर चले आ रहे गतिरोध को खत्म किया जा सके।

सेना बाकी फोर्सों से अलग कैसे है?

OROP issue and its importence to the nation

सवाल ये है कि अर्धसैनिक या नागरिक पुलिस बल के मुकाबले पूर्व सैनिकों की तादाद अधिक क्यों है। इसका सीधा जवाब ये है कि देश को युवा सेना की जरूरत है और इसलिए युवाओं को कम उम्र में सेना में भर्ती किया जाता है और 34-37 साल की उम्र तक ये रिटायर भी हो जाते हैं।

इसके विपरीत अर्धसैनिक और नागरिक पुलिस के जवान 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं।

इस तरह सेना के पेंशनभोगी और कार्यरत कर्मचारियों का अनुपात 17:10 का है जबकि अर्धसैनिक और पुलिस में ये अनुपात 56:100 का है। लेकिन देश की सेना को जवान और जोशीला बनाए रखने के लिए देश को ये कीमत चुकाने की आवश्यकता है।

इसलिए ये तर्क कि पूर्व सैनिकों की ‘एक रैंक, एक पेंशन’ की मांग मान लेने के बाद दूसरे सरकारी कर्मचारी भी इस तरह की मांग करने लगेंगे, तथ्यों पर आधारित नहीं है।

अर्द्धसैनिकों से ज्यादा हैं रिटायर्ड फौजी

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सवाल ये है कि अर्धसैनिक या नागरिक पुलिस बल के मुकाबले पूर्व सैनिकों की तादाद अधिक क्यों है। इसका सीधा जवाब ये है कि देश को युवा सेना की जरूरत है और इसलिए युवाओं को कम उम्र में सेना में भर्ती किया जाता है और 34-37 साल की उम्र तक ये रिटायर भी हो जाते हैं।

इसके विपरीत अर्धसैनिक और नागरिक पुलिस के जवान 60 साल की उम्र में रिटायर होते हैं।

इस तरह सेना के पेंशनभोगी और कार्यरत कर्मचारियों का अनुपात 17:10 का है जबकि अर्धसैनिक और पुलिस में ये अनुपात 56:100 का है। लेकिन देश की सेना को जवान और जोशीला बनाए रखने के लिए देश को ये कीमत चुकाने की आवश्यकता है।

इसलिए ये तर्क कि पूर्व सैनिकों की ‘एक रैंक, एक पेंशन’ की मांग मान लेने के बाद दूसरे सरकारी कर्मचारी भी इस तरह की मांग करने लगेंगे, तथ्यों पर आधारित नहीं है।

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